जनसेवा, विकास और जनविश्वास के अमर प्रतीक: कुंवर दिवाकर विक्रम सिंह ‘बच्चा साहब’ की प्रेरणादायी विरासत

जनसेवा, विकास और जनविश्वास के अमर प्रतीक: कुंवर दिवाकर विक्रम सिंह ‘बच्चा साहब’ की प्रेरणादायी विरासत

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लखनऊ, अप्रैल 10 (TNA) लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा सत्ता के भोग में नहीं, बल्कि सेवा के समर्पण में निहित होती है। इतिहास गवाह है कि जिन नेताओं ने राजनीति को निजी स्वार्थ का माध्यम नहीं, बल्कि जनकल्याण का पथ बनाया, वे समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होते चले गए। स्वर्गीय कुंवर दिवाकर विक्रम सिंह ‘बच्चा साहब’ ऐसे ही विरले जननायक थे, जिनका संपूर्ण जीवन जनसेवा की ज्योति से आलोकित रहा।

8 मार्च 1937 को बस्ती जनपद के अठदमा राजपरिवार में जन्मे बच्चा साहब ने बी.एससी. और एल.एल.बी. की उच्च शिक्षा प्राप्त की। परंतु उनकी असली पहचान उनकी डिग्रियों से नहीं, बल्कि समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के प्रति उनकी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता से बनी। उन्होंने राजनीति को सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज के वंचित, गरीब और किसानों के उत्थान का माध्यम बनाया।

साल 1977 से 1993 तक लगातार पांच बार विधायक निर्वाचित होना और उसके बाद 1996 से 2002 तक छठी बार जनता की सेवा करना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि क्षेत्र की जनता उन्हें केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि अपने अभिभावक के रूप में देखती थी। उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में खाद्य, रसद एवं नागरिक आपूर्ति तथा कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने अपनी प्रशासनिक दक्षता और दूरदर्शी सोच का परिचय दिया।

बच्चा साहब की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल नीति-निर्माता नहीं, बल्कि धरातल पर विकास को साकार करने वाले कर्मयोगी थे। रुधौली तहसील का गठन, बजाज हिंदुस्तान शुगर फैक्ट्री की स्थापना और किसान उत्पादन उपमंडी का निर्माण उनके विकासवादी दृष्टिकोण के सशक्त उदाहरण हैं। इन पहलों ने न केवल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति दी, बल्कि किसानों को उनके श्रम का उचित मूल्य दिलाने की दिशा भी प्रशस्त की।

शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान भी उतना ही प्रेरणादायक रहा। राजकीय महाविद्यालय, रामेन्द्र विक्रम कृषि इंटर कॉलेज और लक्ष्मी देवी इंटर कॉलेज जैसे संस्थानों की स्थापना कर उन्होंने शिक्षा के माध्यम से समाज को सशक्त बनाने का कार्य किया। इन संस्थानों ने हजारों युवाओं को आत्मनिर्भरता और प्रगति का मार्ग दिखाया।

12 अप्रैल 2008 को उनका भौतिक जीवन भले ही समाप्त हो गया, किंतु उनके द्वारा स्थापित मूल्य, संस्थाएं और आदर्श आज भी जीवंत हैं। उनका जीवन इस सत्य का साक्षात प्रमाण है कि जनसेवा के मार्ग पर चलने वाले व्यक्तित्व कभी कालजयी हो जाते हैं।

आज जब राजनीति में मूल्यों और प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, तब बच्चा साहब का जीवन एक प्रेरणास्त्रोत बनकर सामने आता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो सत्ता को सेवा में रूपांतरित कर सके और समाज के उत्थान को अपना सर्वोच्च उद्देश्य बनाए।

कुंवर दिवाकर विक्रम सिंह ‘बच्चा साहब’ केवल एक जनप्रतिनिधि नहीं थे, बल्कि जनविश्वास, समर्पण और विकास के ऐसे अमिट प्रतीक थे, जिनकी स्मृति आने वाली पीढ़ियों को सदैव लोकसेवा और कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देती रहेगी।

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