घोसी का रिजल्ट मायावती के लिए सबसे झटका, अखिलेश और शिवपाल का पीडीए फार्मूला हुआ हिट

घोसी का रिजल्ट मायावती के लिए सबसे झटका, अखिलेश और शिवपाल का पीडीए फार्मूला हुआ हिट

लखनऊ, सितंबर 9 (TNA) उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती के लिए एक बड़ा झटका है. घोसी सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की धार्मिक और कडक सीएम की इमेज का जादू जनता पर नहीं चला. और बसपा मुखिया मायावती की अपील पर घोसी की जनता ने ध्यान दिया. परिणाम स्वरूप इस सीट से चुनाव लड़ने वाले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी पूर्व मंत्री दारा सिंह चौहान चुनाव हार गए.

उन्हे समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवार सुधाकर सिंह ने 42 हजार से अधिक वोटों से चुनाव हरा दिया है. सपा के सुधाकर सिंह के सामने योगी-मोदी और मायावती का फैक्टर भी फेल हो गया. सपा नेताओं ने सुधाकर सिंह की जीत को इंडिया गठबंधन की जीत बताया है. फिलहाल घोसी के चुनाव परिणाम यह बता रहे हैं कि यूपी में इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इन्क्लूसिव अलयांस (इंडिया) की पहली लैंडिंग सफल रही है. ऐसे में अब बसपा सुप्रीमो मायावती को इस चुनाव परिणाम से सबक लेना चाहिए क्योंकि मायावती के चुनावी प्रयोग से बसपा के वोट बैंक में सपा ने सेंध लगा दी है.

घोसी में बसपा के मतदाताओं ने सुधाकर सिंह के पक्ष में मतदान किया है. बसपा का दलित वोट भाजपा को नहीं गया और गेस्ट हाउस कांड का मुद्दा उठाकर सपा को दलितविरोधी बताने की भाजपा नेताओं की योजना घोसी में फेल हो गई. इसलिए भाजपा को भी अब अपनी चुनावी रणनीति की खामियों पर ध्यान देना होगा, अन्यथा लोकसभा चुनाव में यूपी से सबसे अधिक सीटें जीतने का उनका मिशन फेल हो जाएगा.

मायावती की अपील के बाद नोटा में दो हजार से भी कम वोटों का पड़ना यह दर्शाता है कि घोसी में उनके समर्थकों ने उनकी अपील पर ध्यान नहीं दिया. जबकि इसी घोसी में वर्ष 2017 में बसपा के अब्बास अंसारी को लगभग 81 हजार वोट मिले थे.

मायावती का दांव हुआ फेल

घोसी विधानसभा चुनावों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते हुए लखनऊ के सीनियर जर्नलिस्ट कुमार भावेश कहते हैं कि घोसी की जनता ने सूबे के लोगों के मूड को बताया है. यह चुनाव भाजपा और बसपा दोनों के लिए अलार्म है. इन दोनों ही दलों को अपनी चुनावी रणनीति के बारे में अब सोचना चाहिए. घोसी की जनता ने इन दोनों दलों पर अपना अविश्वास जता दिया है. जनता ने बता दिया है कि मोदी-योगी किसी भी दलबदलू को चुनाव मैदान में उतार देंगे तो वह उन्हे वोट देने के बारे में आँख मूँद कर फैसला नहीं लेगी.

इसी प्रकार घोसी के लोगों ने मायावती को यह संदेश दिया है कि वह दलित समाज को वोट बैंक के रूप में प्रयोग करने की राजनीति बंद करे. दलित समाज किसे वोट दे किसे नहीं यह बताना बंद किया जाए. मायावती ने घोसी में बसपा समर्थकों से नोटा पर वोट देने की अपील की थी. इसके साथ ही उन्होंने एनडीए और इंडिया गठबंधन से दूरी बनाने का ऐलान किया था. लेकिन घोसी में बसपा मतदाताओं ने मायावती की अपील पर ध्यान नहीं दिया.

भावेश कहते हैं कि घोसी में सबसे ज्यादा वोटर दलित है और फिर मुसलमान. इस वोट बैंक के भरोसे ही कम्युनिस्टों की धरती रहे घोसी में बसपा चुनाव जीतती रही है. वर्ष 1993 में भी बसपा यहां से जीती थी. इसके बाद भाजपा से बसपा में आए फागू चौहान इस सीट चुनाव जीते थे. परन्तु बसपा के लिए अब घोसी पहले जैसा नहीं रहा है. यहां भी बसपा के वोट बैंक में सेंध लग रही है और इंडिया गठबंधन ने इस चुनाव में बसपा के वोटों में सेंध लगाई दी है.

मायावती की अपील के बाद नोटा में दो हजार से भी कम वोटों का पड़ना यह दर्शाता है कि घोसी में उनके समर्थकों ने उनकी अपील पर ध्यान नहीं दिया. जबकि इसी घोसी में वर्ष 2017 में बसपा के अब्बास अंसारी को लगभग 81 हजार वोट मिले थे. इसके बाद वर्ष 2019 के उपचुनाव में 50000 और बीते साल विधानसभा के चुनाव में बसपा के वसीम इकबाल को 54 हजार वोट मिले थे. ऐसे में अब मायावती को तय करना होगा कि कि वह एनडीए के साथ रहेंगी या या इंडिया गठबंधन के. इसलिए मायावती को अगर देश की राजनीति में प्रासंगिक रहना है तो इधर या उधर जाना ही होगा.

सफल रही अखिलेश की रणनीति

भावेश कहते हैं कि मायावती की अपील के बाद भी दलित समाज का वोट सपा के उम्मीदवार को गया. दलित समाज का वोट मिले बिना सुधाकर सिंह का जीत हासिल करना मुश्किल था. दलित और मुस्लिम समाज का वोट सपा को मिला तो जिसके चलते योगी सरकार के पूरी ताकत लगाने के बाद भी दारा सिंह चौहान चुनाव जीत नहीं सके. भावेश के अनुसार, घोसी में अखिलेश का पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (पीडीए) सफल रहा है. इसकी दो वजह रही हैं: पहली वजह सपा की चुनावी रणनीति रही. जिसके चलते शिवपाल सिंह यादव ने घोसी के चुनाव प्रचार को लीड किया. सपा के नेता और पदाधिकारी लोगों के घर घर गए, भाषा पर संयम रखा, वही दूसरी तरफ ओम प्रकाश राजभर जैसे नेताओं ने अखिलेश यादव तथा यादव समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी की.

सरकार के मंत्रियों ने क्षेत्र में कैंप कर सत्ता की ताकत दिखाई और चुनाव से पहले सीएम योगी और पार्टी के बड़े नेताओं ने गेस्ट हाउस कांड का मुद्दा उठाकर सपा को दलितविरोधी बताया. भाजपा नेताओं की यह सारी कवायद महंगाई जैसे तमाम मुद्दों से परेशान जनता पर असर नहीं डाला सकी. यहीं नहीं घोसी में भाजपा का पसमांदा समाज को जोड़ने का मिशन भी नाकाम रहा. यहीं वजह है कि राज्यसभा और लोकसभा में सांसद रहे घोसी में दारा सिंह चौहान बुरी तरह हार गए. तो साफ है दलित और मुसलमान वोट भाजपा अखिलेश ही रणनीति के चलते नहीं मिला.

भाजपा के सहयोगियों की ताकत की पोल भी खुली

भावेश कहते हैं कि घोसी के चुनाव परिणाम ने बसपा मुखिया मायावती की राजनीतिक खामियों को उजागर करने के साथ ही भाजपा के सहयोगी दलों सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) की राजनीतिक ताकत की भी पोल खोल दी है.

सुभासपा के मुखिया ओम प्रकाश राजभर जो बीते विधान सभा चुनावों में भाजपा की आलोचना करते हुए सपा के साथ चुनाव लड़ने पहुँच गए थे, वह अपने को पूर्वाञ्चल का बड़ा नेता कहते है. उनके इसी दावे से प्रभावित होकर भाजपा ने उन्हे अपने साथ फिर जोड़ा है, लेकिन घोसी में ओम प्रकाश राजभर अपनी बिरादरी का वोट भी पूरा दारा सिंह चौहान को दिला नहीं सके.

घोसी उपचुनाव परिणाम से पता चलता है कि ओमप्रकाश राजभर का पॉलिटिकल शेयर प्राइस हवा में ज्यादा है, जमीन पर कम. अगर राजभर, नाई, कुम्हार, कोईरी और निषादों ने वोट किया होता तो दारा सिंह चौहान इतने बड़े अंतर से चुनाव नहीं हारते. यहीं हाल अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के नेताओं का भी रहा है, इन दोनों दलों के मुखिया घोसी में चुनाव प्रचार तो खूब किए लेकिन उनके समर्थकों ने इतना वोट भाजपा के दारा सिंह चौहान को नहीं दिया कि वह चुनाव जीते सके.

— राजेंद्र कुमार

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