कहाँ गए अल्लाह और गॉड? मध्य पूर्व के युद्ध में मारे जा रहे निर्दोषों की चीख
मध्य पूर्व की धरती एक बार फिर खून से लाल हो रही है। 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध ने अब अपने 10वें दिन में प्रवेश कर लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले किए गए, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई और उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया लीडर बनाया गया।
ईरान ने जवाब में इजरायल पर मिसाइलें दागीं, जिसमें तेल अवीव और पेटाह टिकवा जैसे शहरों में नागरिक घायल हुए।युद्ध अब लेबनान, यूएई और कतर तक फैल चुका है, जहां ईरानी मिसाइलों को रोका जा रहा है। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की धमकियों से वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगा रही है।
लेकिन इन सबके बीच सबसे दर्दनाक सवाल यह है कि 'कहाँ गए अल्लाह और गॉड? क्यों नहीं रक्षा कर पा रहे अपने मासूम, निरीह भक्तों की, जो इस युद्ध की भेंट चढ़ रहे हैं?' ईरान में, जहाँ इस्लामिक रिपब्लिक की नींव अल्लाह के नाम पर रखी गई है, हजारों निर्दोष नागरिक अमेरिकी और इजरायली हमलों में मारे जा चुके हैं। तेहरान के दक्षिण-पूर्वी इलाकों में बमबारी से पूरा आवासीय कॉम्प्लेक्स तबाह हो गया, जहाँ महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग रहते थे। ये वे लोग हैं जो रोज नमाज पढ़ते हैं, अल्लाह से दुआ मांगते हैं।
फिर अल्लाह कहाँ हैं? क्या वे इन मिसाइलों और ड्रोनों के आगे असहाय हो गए हैं? ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने कहा कि अमेरिका से कोई बातचीत नहीं होगी, क्योंकि "कड़वे अनुभवों ने उन्हें सिखाया है।" लेकिन क्या यह अल्लाह की इच्छा है कि उनके भक्त ऐसे मरें? या यह सिर्फ राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का खेल है, जहाँ धर्म को ढाल बनाया जाता है?
दूसरी तरफ, इजरायल और अमेरिका में ईसाई भक्त गॉड के नाम पर युद्ध लड़ रहे हैं। ट्रंप ने ईरान को "बीस गुना ज्यादा कड़ा" हमला करने की धमकी दी है, अगर वह तेल की आपूर्ति रोकेगा। इजरायल ने ईरान के तीन हिस्सों पर हमले किए, और लेबनान में हिजबुल्लाह के साथ लड़ाई तेज हो गई है। लेकिन इजरायल के शहरों में ईरानी मिसाइलों से घायल होने वाले नागरिक – वे जो टोरा पढ़ते हैं, गॉड से प्रार्थना करते हैं – उनकी रक्षा गॉड क्यों नहीं कर रहे? 4 मार्च को ईरान ने इजरायल पर दो मिसाइल बैरेज किए, जिसमें नागरिक प्रभावित हुए। क्या गॉड ने उन्हें छोड़ दिया है? या यह सच्चाई है कि युद्ध के मैदान में कोई दैवीय हस्तक्षेप नहीं होता, सिर्फ मानव निर्मित हथियार और महत्वाकांक्षाएं?
यह युद्ध सिर्फ सैन्य टकराव नहीं है; यह धार्मिक विश्वास की परीक्षा भी है। ईरान में मुसलमान अल्लाह को पुकार रहे हैं, इजरायल में यहूदी गॉड को, और अमेरिका में ईसाई जीसस को। लेकिन बम गिरते रहते हैं, निर्दोष मरते रहते हैं। इतिहास गवाह है कि ऐसे युद्धों में धर्म अक्सर बहाना बनता है। वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, गाजा – हर जगह निर्दोषों की मौत हुई, और हर बार सवाल उठा: भगवान कहाँ हैं?
शायद जवाब यह है कि भगवान मनुष्यों ने बनाए हैं, और उनकी रक्षा भी मनुष्यों को ही करनी है। ट्रंप ने ईरान से "बिना शर्त सरेंडर" मांगा है, लेकिन क्या यह गॉड की इच्छा है, या सिर्फ शक्ति का खेल? इस युद्ध में मारे जा रहे आम लोग – ईरान के बाजारों में खरीदारी करने वाले, इजरायल के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे, अमेरिकी सैनिकों के परिवार – वे किसी की महत्वाकांक्षा की कीमत चुका रहे हैं।
अल्लाह और गॉड, अगर वे हैं, तो क्यों चुप हैं? क्यों नहीं रोकते इस नरसंहार को? या शायद यह समय है कि हम धर्म की आड़ छोड़कर मानवता पर विश्वास करें। शांति की अपील करें, बातचीत शुरू करें, क्योंकि युद्ध में जीत किसी की नहीं होती – सिर्फ हार होती है सबकी। ईरान ने कहा है कि वह अमेरिकी ग्राउंड इनवेजन के लिए तैयार है, लेकिन क्या इससे निर्दोषों की जान बचेगी? नहीं। इसलिए, सवाल फिर वही: कहाँ गए अल्लाह और गॉड? क्यों नहीं अवतरित होकर बचा लेते हैं इन युद्धोमादी शैतानों से....!
--राजीव तिवारी बाबा (स्वतंत्र पत्रकार)
