एक दिन यह ऊंची इमारतें ढह जाएंगी..

एक दिन यह ऊंची इमारतें ढह जाएंगी..

एक दिन यह ऊंची इमारतें ढह जाएंगी..

यह दीवारें गिर जाएंगी

खिड़की ,दरवाज़े सब मुँह छिपाए बैठी रहेंगी

पर्दे अपने ही फंदे से लटक कर मर जाएंगे

फिर सभ्यता नग्न खड़ी रहेगी बीच चौराहे

और उस बिटिया की चीखें

रेंगती हुई जाएंगी तुम्हारे कानों तक

जब भाग कर छिपने के लिए,

नहीं होगा कोई साधन

स्वयं को सभ्य कहलाने वाले लोग

तब अपना काला मुँह लेकर कहाँ जाओगे?

- सौम्या महान्ति

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