पंचायतों में हो रही लूट को रोक पाएंगे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ?

पंचायतों में हो रही लूट को रोक पाएंगे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ?

उत्तर प्रदेश में 25 एवं 26 मई को पंचायतों के चुने हुए प्रधानों का शपथ ग्रहण होने जा रहा है और 27 मई को पंचायतों का छठवीं बार अधिकृत रूप से गठन हो जाएगा। 1995 में पंचायती राज व्यवस्था नए सिरे से लागू की गई जिसमें पहली बार हर तबके अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई।

इस व्यवस्था में 21% अनुसूचित जाति, 27% पिछड़ी जाति और कुल पदों का एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया। आरक्षण 50% से अधिक ना हो इसलिए महिलाओं के आरक्षण में अनुसूचित जाति की महिलाओं को एक तिहाई, अनुसूचित जाति कोटे से और पिछड़ी जाति की महिलाओं को पिछड़ी जाति के 27% कोटे से तथा सामान्य वर्ग के एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए।

आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश गांधीजी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना को पूरा करना था। जिसमें गांधी जी मानते थे कि गांव का विकास होगा, तो देश का विकास होगा और गांव के विकास के लिए समाज के अंतिम व्यक्ति का विकास होना चाहिए। गांधी जी के इसी अवधारणा के तहत 1994 में 73वां और 74वां संविधान संशोधन ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्रों दोनों के लिए किया गया।

त्रिस्तरीय पंचायतें और शहरी निकायों का गठन किया गया। इस संशोधन के बाद पहली बार 1995 में चुनाव हुए और उस समय मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे जो ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े हुए थे।

उन्होंने पंचायतों को अपने हिसाब से चलाया। मुलायम के बाद मायावती ने भी पंचायतों में लूट की परंपरा को जारी रखा। कल्याण सिंह के समय ईमानदारी से पंचायतों को मजबूत करने का कार्य शुरू हुआ था और एक अभियान चला कर के पंचायतों को सत्ता विकेंद्रीकरण के तहत 29 विभागों का अधिकार त्रिस्तरीय पंचायतों को दिया गया।

कल्याण सिंह चाहते थे कि पंचायतों को सही रूप में मूल रूप मिले और इसी के तहत उन्होंने त्रिस्तरीय पंचायतों को व्यापक अधिकार दिया और चुने हुए प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देकर ग्राम स्वराज की स्थापना करने का प्रयास किया लेकिन कल्याण सिंह के हटने के बाद भाजपा के मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह किसी ने भी पंचायतों की तरफ ध्यान नहीं दिया।

भाजपा और मायावती के गठबंधन ने पंचायतों को लूट के लिए छोड़ दिया और मुलायम सिंह यादव फिर मुख्यमंत्री बने, उनके समय 2005 में पंचायत चुनाव हुए लेकिन कोई बदलाव नहीं हुआ। पंचायत लूट का अड्डा बनी रही। 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव ने भी पंचायतों को पूर्व सरकारों की भांति ही लूट को छूट जारी रखा।

अब तक 1995, 2000, 2005, 2010, 2015 पांच चुनाव हो चुके है और कोरोना संकट के कारण 2020 में चुनाव नहीं हो सके थे। 6 महीने बाद चुनाव प्रक्रिया 2021 अप्रैल-मई में पूरी की गयी और 25-26 मई को नव-निर्वाचित प्रधानों को शपत दिलान के साथ 27 मई को पंचायतों का 6वां विधिवत गठन हो जायेगा । इन 25 वर्षों में केवल कल्याण सिंह को छोड़कर सभी सरकारों का रुख एक जैसे रहा।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 4 वर्षों के कार्यकाल में लूट पूर्व सरकारों की तरह यथावत जारी रही। फिलहाल अभी तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पंचायतों को मजबूत करने और त्रिस्तरीय पंचायतों में लूट के किसी भी संभावनाओं को रोकने के लिए कोई प्रयास करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। संविधान संशोधन के बाद राज्यों को अधिकार दिए गए थे जो पंचायतों के चुनाव और नियमावली अपने तरीके से बनाये।

उत्तर प्रदेश में शहरी निकायों के मेयर, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायत अध्यक्ष सीधे जनता द्वारा चुने जाने लगे लेकिन त्रिस्तरीय पंचायत में प्रधान को छोड़कर ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का सीधे जनता द्वारा चुनाव कराने की हिम्मत किसी भी सरकार में नहीं रही। योगी आदित्यनाथ बहुत विलपावर वाले ईमानदार मुख्यमंत्री माने जाते हैं लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुखों का चुनाव सीधे कराने की हिम्मत नहीं हुई।

कहने का मतलब यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पंचायतों में लूट की वही छुट दी जो अखिलेश और मायावती की सरकार में होता रहा है।

जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव के लिए बोली लगती है। जिला पंचायत सदस्य की बिक्री जनपदवार औसत 50 लाख से 1 करोड़ तक और क्षेत्र पंचायत सदस्य की बिक्री 5 लाख से लेकर 15 लाख और कहीं-कहीं दो पैसेवाले प्रत्याशी दावेदार हो जाते हैं तो यह कीमत लाख-करोड़ में पहुंच जाती है। जहां तक प्रधानों का सवाल है, प्रधानों को लूट के लिए पूरी छूट दे दी गई है और इसमें नौकरशाही का पूरा संरक्षण है।

किसी भी सरकार ने चुने हुए प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित करने का प्रयास नहीं किया। जबकि प्रशिक्षण के नाम पर भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा 400 से 500 करोड़ हर चुनाव के बाद अधिकृत रूप से जारी किए जाते हैं। प्रशिक्षण की मंशा होती है कि चुने हुए प्रतिनिधि अधिक से अधिक जानकारी रखें और जनहित में कार्य करें। ऐसा हो नहीं रहा है सबसे पहले हम गठित होने जा रहे ग्राम पंचायतों के बारे में जानकारी दे रहे हैं।

प्रधान के साथ-साथ ग्राम पंचायत सदस्यों का चुनाव होता है और किसी भी ग्रामसभा गठन के लिए प्रधान के साथ-साथ दो तिहाई ग्राम पंचायत सदस्यों का चुना जाना जरूरी है। जब तक दो तिहाई ग्राम पंचायत सदस्य नहीं चुने जायेंगे, ग्राम पंचायतों का विधिवत गठन नहीं होगा। जो प्रधान प्रत्याशी होशियार होते है वह पंचायतों के गठन के लिए दो तिहाई सदस्य का चुनाव करा लेते है लेकिन चुने हुए सदस्यों का महत्व जानकारी के आभाव में केवल पंचायतों के गठन तक ही सीमित माना जाता है।

प्रदेश में 8 हजार ग्राम पंचायत में दो तिहाई सदस्य का कोरम न पूरा होने के कारण पंचायतों का गठन नहीं हो रहा है। अगर गत 25 वर्षों में ग्राम पंचायत सदस्ययों के महत्व को बताया गया होता और उन्हें विकास कार्यों की भागीदारी दी गयी होती तो निश्चित रूप ग्राम पंचायत सदस्यों का महत्व बढ़ता और इन 8000 पंचायतों में पंचायत सदस्यों के कारण कोरम अधूरा न रहता।

पंचायत अधिनियम में ग्राम पंचायतों के गठन और सदस्यों के महत्वपूर्ण अधिकार का उल्लेख है लेकिन नौकरशाहों ने सुनियोजित तरीके से पंचायत जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षित नहीं होने दिया । ग्राम पंचायत का मतलब केवल प्रधान ही नहीं होता। ग्राम पंचायत सदस्यों की भी अहम् भूमिका होती है। पंचायतों को सुचारू रूप से चलाने के लिए 6 समितियों के गठन का प्रावधान किया गया है।

3 समितियों– नियोजन एवं विकास समिति , शिक्षा समिति तथा प्रशासनिक समिति का सभापति प्रधान तथा 3 अन्य महत्वपूर्ण - निर्माण कार्य समिति, स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति तथा जल प्रबंधन समिति का सभापति ग्राम पंचायत द्वारा नामित सदस्य होता है और सभी समितियों में आरक्षित वर्ग के चुने हुए एक एक सदस्य शामिल होते हैं। 7 सदस्यों वाली समिति में सभापति के अलावा अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और महिला के एक सदस्य शामिल होते हैं। जिससे की सभी वर्ग को प्रतिनिधित्व मिले।

अधिनियम में प्रधान पर अंकुश लगाने के लिए सदस्यों को विकास जैसी समिति का सभापति बनाया गया है, लेकिन सदस्यों को प्रशिक्षित नहीं किया जाता। उन्हें अधिकार नहीं दिए जाते इसीलिए ग्राम पंचायत का मतलब सिर्फ प्रधान होता है जबकि वास्तविक स्थिति में अधिनियम में सत्ता का विकेंद्रीकरण है। और सदस्यों को अधिकार भी दिया गया है। ये समितियां सुचारू रूप से कार्य करे तो प्रधान के लूट पर अंकुश लग सकता है। यही स्थिति जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत में भी है। जिनमे 6 समितियां बनाई गयी है।

लेकिन देखा यही जा रहा है कि त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों का महत्व, ग्राम पंचायत सदस्यों का पंचायत गठन और जिला पंचायत सदस्यों और क्षेत्र पंचायत सदस्यों का महत्व जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष चुने जाने तक ही रहता है। इसलिए पिछले 25 वर्षों में कल्याण सिंह को छोड़कर किसी ने भी पंचायतों पर विशेष ध्यान नहीं दिया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जो कार्य शैली है और जिस तरह से नौकरशाहों से घिरे हैं उसे देखते हुए पंचायतों में गत 25 वर्षों से हो रही लूट के सिस्टम को रोक पाएंगे, ऐसी उम्मीद कम ही लग रही है। कोरोना संकट से ग्राम पंचायतों में त्राहिमाम मची हुई है। स्वास्थ्य सेवायें ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत कमजोर है या ना के बराबर हैं। पंचायतें कोरोना संकट में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है लेकिन इसके लिए योगी आदित्यनाथ को कल्याण सिंह सरकार के द्वारा पंचायतों को अधिकार देने के लिए अपनाई गयी पारदर्शीता और व्यापक प्रशिक्षण के रास्ते को अपनाना पड़ेगा।

जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत चुनाव में खरीद फरोख्त में रोक लगाने के लिए प्रयास करना होगा क्योकि जो राजनीतिक परिस्थितियां दिखाई दे रही हैं इसमें ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष पद के दावेदार खरीद फरोख्त के प्रक्रिया में जुटे हैं। ब्लाक प्रमुख सदस्य की बोली 10 से 20 लाख और जिला पंचायत की सदस्य की बोली 1 करोड़ तक चर्चा में बनी हुई है। यही नहीं जहाँ पर प्रत्याशी अधिक पैसे वाले हैं उन जनपदों में बोली करोड़ में भी हो सकती है।

वर्तमान कोरोना संकट में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए नव-निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका बहुत महतवपूर्ण है और इनको भरोसे में लेकर व्यापक प्रशिक्षण देते हुए पारदर्शीता के साथ अधिकार और जिम्मेदारी दे तो निश्चित रूप से कोरोना संकट से लड़ने के लिए बहुत बड़े हथियार के रूप में नव-निर्वाचित पंचायत समितियों के जन प्रतिनिधी कारगार साबित हो सकते है। जिसमे सबसे महत्वपूर्ण यह है कि त्रिस्तरीय चुनाव दलगत नहीं होता इसलिए चुने हुए प्रतिनिधी निष्पक्षता पूर्वक दलगत राजनीति से हटकर जनहित के लिए कार्य करते हैं।

गत 25 वर्षों के कर्मचारी, अधिकारी, प्रधान, प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के लूट के तरीको को बदलने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कल्याण सिंह की पंचायती राज व्यवस्था के सिस्टम को लागू करते हुए व्यापक रूप से प्रशिक्षण और जागरूकता लाने का कार्य करना होगा। इसके लिए प्रधानों के साथ साथ ग्राम पंचायत सदस्यों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत सदस्यों को उनकी समितियों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिले यह सुनिश्चित करना होगा।

और सबसे बड़ा कार्य इन नव-निर्वाचित सदस्यों को प्रशिक्षित करके कोरोना संकट की चुनौतियों से निपटने के लिए काफी संख्या में किसी डॉक्टर द्वारा बनाई गई गाइडलाइन और सरकार की कोविड गाइडलाइन के पंपलेट प्रधान के अलावा सदस्यों तक सीधे पहुंचाया जाना चाहिए। इनमे सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका साढ़े तीन लाख से अधिक चुनी गई जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायत की महिला सदस्य है। जिस तरह से तीसरे लहर में बच्चों के प्रभावित होने की बात हो रही है अगर इन चुने गए साढ़े तीन लाख अधिक महिला सदस्यों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भरोसे में लेकर अभियान चलाकर प्रशिक्षित करने के साथ संसाधन उपलब्ध करा दे तो निश्चित रूप से कोरोना की आंच गाव में बच्चो तक नहीं पहुच पायेगी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इसके लिए नौकरशाहों के चंगुल से बचना होगा क्योकि शासन से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक एक बहुत बड़ा नेताओं, अधिकारियों और कर्मचारियों का काकस है जो पंचायतों के अरबों रूपये लूटते हैं। लूट को रोकने के लिए 25 वर्षों से चली आ रही व्यवस्था है उसमे बदलाव लाकर सदस्यों की भागीदारी को अधिक से अधिक बढ़ाना होगा।

क्या यह कार्य मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ बड़े काकस को तोड़कर कर पाएंगे ? यही सबसे बड़ा सवाल है। अगर योगी आदित्यनाथ कल्याण सिंह के पंचायती राज व्यवस्था के मॉडल को अपना कर पंचायतों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की हिम्मत जुटा सके तभी 25 वर्षों से चला आ रहे लूट पर रोक लगाई जा सकती है।

क्या यह कार्य मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ बड़े काकस को तोड़कर कर पाएंगे ? यही सबसे बड़ा सवाल है। अगर योगी आदित्यनाथ कल्याण सिंह के पंचायती राज व्यवस्था के मॉडल को अपना कर पंचायतों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की हिम्मत जुटा सके तभी 25 वर्षों से चला आ रहे लूट पर रोक लगाई जा सकती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 4 वर्षों के कार्यकाल में लूट पूर्व सरकारों की तरह यथावत जारी रही। फिलहाल अभी तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पंचायतों को मजबूत करने और त्रिस्तरीय पंचायतों में लूट के किसी भी संभावनाओं को रोकने के लिए कोई प्रयास करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। संविधान संशोधन के बाद राज्यों को अधिकार दिए गए थे जो पंचायतों के चुनाव और नियमावली अपने तरीके से बनाये।

उत्तर प्रदेश में शहरी निकायों के मेयर, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायत अध्यक्ष सीधे जनता द्वारा चुने जाने लगे लेकिन त्रिस्तरीय पंचायत में प्रधान को छोड़कर ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का सीधे जनता द्वारा चुनाव कराने की हिम्मत किसी भी सरकार में नहीं रही। योगी आदित्यनाथ बहुत विलपावर वाले ईमानदार मुख्यमंत्री माने जाते हैं लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुखों का चुनाव सीधे कराने की हिम्मत नहीं हुई।

कहने का मतलब यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पंचायतों में लूट की वही छुट दी जो अखिलेश और मायावती की सरकार में होता रहा है।

जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव के लिए बोली लगती है। जिला पंचायत सदस्य की बिक्री जनपदवार औसत 50 लाख से 1 करोड़ तक और क्षेत्र पंचायत सदस्य की बिक्री 5 लाख से लेकर 15 लाख और कहीं-कहीं दो पैसेवाले प्रत्याशी दावेदार हो जाते हैं तो यह कीमत लाख-करोड़ में पहुंच जाती है। जहां तक प्रधानों का सवाल है, प्रधानों को लूट के लिए पूरी छूट दे दी गई है और इसमें नौकरशाही का पूरा संरक्षण है।

किसी भी सरकार ने चुने हुए प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित करने का प्रयास नहीं किया। जबकि प्रशिक्षण के नाम पर भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा 400 से 500 करोड़ हर चुनाव के बाद अधिकृत रूप से जारी किए जाते हैं। प्रशिक्षण की मंशा होती है कि चुने हुए प्रतिनिधि अधिक से अधिक जानकारी रखें और जनहित में कार्य करें। ऐसा हो नहीं रहा है सबसे पहले हम गठित होने जा रहे ग्राम पंचायतों के बारे में जानकारी दे रहे हैं।

प्रधान के साथ-साथ ग्राम पंचायत सदस्यों का चुनाव होता है और किसी भी ग्रामसभा गठन के लिए प्रधान के साथ-साथ दो तिहाई ग्राम पंचायत सदस्यों का चुना जाना जरूरी है। जब तक दो तिहाई ग्राम पंचायत सदस्य नहीं चुने जायेंगे, ग्राम पंचायतों का विधिवत गठन नहीं होगा। जो प्रधान प्रत्याशी होशियार होते है वह पंचायतों के गठन के लिए दो तिहाई सदस्य का चुनाव करा लेते है लेकिन चुने हुए सदस्यों का महत्व जानकारी के आभाव में केवल पंचायतों के गठन तक ही सीमित माना जाता है।

प्रदेश में 8 हजार ग्राम पंचायत में दो तिहाई सदस्य का कोरम न पूरा होने के कारण पंचायतों का गठन नहीं हो रहा है। अगर गत 25 वर्षों में ग्राम पंचायत सदस्ययों के महत्व को बताया गया होता और उन्हें विकास कार्यों की भागीदारी दी गयी होती तो निश्चित रूप ग्राम पंचायत सदस्यों का महत्व बढ़ता और इन 8000 पंचायतों में पंचायत सदस्यों के कारण कोरम अधूरा न रहता।

पंचायत अधिनियम में ग्राम पंचायतों के गठन और सदस्यों के महत्वपूर्ण अधिकार का उल्लेख है लेकिन नौकरशाहों ने सुनियोजित तरीके से पंचायत जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षित नहीं होने दिया । ग्राम पंचायत का मतलब केवल प्रधान ही नहीं होता। ग्राम पंचायत सदस्यों की भी अहम् भूमिका होती है। पंचायतों को सुचारू रूप से चलाने के लिए 6 समितियों के गठन का प्रावधान किया गया है।

3 समितियों– नियोजन एवं विकास समिति , शिक्षा समिति तथा प्रशासनिक समिति का सभापति प्रधान तथा 3 अन्य महत्वपूर्ण - निर्माण कार्य समिति, स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति तथा जल प्रबंधन समिति का सभापति ग्राम पंचायत द्वारा नामित सदस्य होता है और सभी समितियों में आरक्षित वर्ग के चुने हुए एक एक सदस्य शामिल होते हैं। 7 सदस्यों वाली समिति में सभापति के अलावा अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और महिला के एक सदस्य शामिल होते हैं। जिससे की सभी वर्ग को प्रतिनिधित्व मिले।

अधिनियम में प्रधान पर अंकुश लगाने के लिए सदस्यों को विकास जैसी समिति का सभापति बनाया गया है, लेकिन सदस्यों को प्रशिक्षित नहीं किया जाता। उन्हें अधिकार नहीं दिए जाते इसीलिए ग्राम पंचायत का मतलब सिर्फ प्रधान होता है जबकि वास्तविक स्थिति में अधिनियम में सत्ता का विकेंद्रीकरण है। और सदस्यों को अधिकार भी दिया गया है। ये समितियां सुचारू रूप से कार्य करे तो प्रधान के लूट पर अंकुश लग सकता है। यही स्थिति जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत में भी है। जिनमे 6 समितियां बनाई गयी है।

लेकिन देखा यही जा रहा है कि त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों का महत्व, ग्राम पंचायत सदस्यों का पंचायत गठन और जिला पंचायत सदस्यों और क्षेत्र पंचायत सदस्यों का महत्व जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष चुने जाने तक ही रहता है। इसलिए पिछले 25 वर्षों में कल्याण सिंह को छोड़कर किसी ने भी पंचायतों पर विशेष ध्यान नहीं दिया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जो कार्य शैली है और जिस तरह से नौकरशाहों से घिरे हैं उसे देखते हुए पंचायतों में गत 25 वर्षों से हो रही लूट के सिस्टम को रोक पाएंगे, ऐसी उम्मीद कम ही लग रही है। कोरोना संकट से ग्राम पंचायतों में त्राहिमाम मची हुई है। स्वास्थ्य सेवायें ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत कमजोर है या ना के बराबर हैं। पंचायतें कोरोना संकट में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है लेकिन इसके लिए योगी आदित्यनाथ को कल्याण सिंह सरकार के द्वारा पंचायतों को अधिकार देने के लिए अपनाई गयी पारदर्शीता और व्यापक प्रशिक्षण के रास्ते को अपनाना पड़ेगा।

जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत चुनाव में खरीद फरोख्त में रोक लगाने के लिए प्रयास करना होगा क्योकि जो राजनीतिक परिस्थितियां दिखाई दे रही हैं इसमें ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष पद के दावेदार खरीद फरोख्त के प्रक्रिया में जुटे हैं। ब्लाक प्रमुख सदस्य की बोली 10 से 20 लाख और जिला पंचायत की सदस्य की बोली 1 करोड़ तक चर्चा में बनी हुई है। यही नहीं जहाँ पर प्रत्याशी अधिक पैसे वाले हैं उन जनपदों में बोली करोड़ में भी हो सकती है।

वर्तमान कोरोना संकट में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए नव-निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका बहुत महतवपूर्ण है और इनको भरोसे में लेकर व्यापक प्रशिक्षण देते हुए पारदर्शीता के साथ अधिकार और जिम्मेदारी दे तो निश्चित रूप से कोरोना संकट से लड़ने के लिए बहुत बड़े हथियार के रूप में नव-निर्वाचित पंचायत समितियों के जन प्रतिनिधी कारगार साबित हो सकते है। जिसमे सबसे महत्वपूर्ण यह है कि त्रिस्तरीय चुनाव दलगत नहीं होता इसलिए चुने हुए प्रतिनिधी निष्पक्षता पूर्वक दलगत राजनीति से हटकर जनहित के लिए कार्य करते हैं।

गत 25 वर्षों के कर्मचारी, अधिकारी, प्रधान, प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के लूट के तरीको को बदलने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कल्याण सिंह की पंचायती राज व्यवस्था के सिस्टम को लागू करते हुए व्यापक रूप से प्रशिक्षण और जागरूकता लाने का कार्य करना होगा। इसके लिए प्रधानों के साथ साथ ग्राम पंचायत सदस्यों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत सदस्यों को उनकी समितियों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिले यह सुनिश्चित करना होगा।

और सबसे बड़ा कार्य इन नव-निर्वाचित सदस्यों को प्रशिक्षित करके कोरोना संकट की चुनौतियों से निपटने के लिए काफी संख्या में किसी डॉक्टर द्वारा बनाई गई गाइडलाइन और सरकार की कोविड गाइडलाइन के पंपलेट प्रधान के अलावा सदस्यों तक सीधे पहुंचाया जाना चाहिए। इनमे सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका साढ़े तीन लाख से अधिक चुनी गई जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायत की महिला सदस्य है। जिस तरह से तीसरे लहर में बच्चों के प्रभावित होने की बात हो रही है अगर इन चुने गए साढ़े तीन लाख अधिक महिला सदस्यों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भरोसे में लेकर अभियान चलाकर प्रशिक्षित करने के साथ संसाधन उपलब्ध करा दे तो निश्चित रूप से कोरोना की आंच गाव में बच्चो तक नहीं पहुच पायेगी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इसके लिए नौकरशाहों के चंगुल से बचना होगा क्योकि शासन से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक एक बहुत बड़ा नेताओं, अधिकारियों और कर्मचारियों का काकस है जो पंचायतों के अरबों रूपये लूटते हैं। लूट को रोकने के लिए 25 वर्षों से चली आ रही व्यवस्था है उसमे बदलाव लाकर सदस्यों की भागीदारी को अधिक से अधिक बढ़ाना होगा।

क्या यह कार्य मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ बड़े काकस को तोड़कर कर पाएंगे ? यही सबसे बड़ा सवाल है। अगर योगी आदित्यनाथ कल्याण सिंह के पंचायती राज व्यवस्था के मॉडल को अपना कर पंचायतों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की हिम्मत जुटा सके तभी 25 वर्षों से चला आ रहे लूट पर रोक लगाई जा सकती है।

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