जब मेरे टूटे हाथ का प्लास्टर गुलज़ार साहेब के दस्तख़त से बन गया था ख़ास!

जब मेरे टूटे हाथ का प्लास्टर गुलज़ार साहेब के दस्तख़त से बन गया था ख़ास!

आज से करीब 15 साल पहले एक दौर था जब हमारे मित्र सलीम आरिफ मुंबई से आते थे तो हमसे मिलते थे। उस दौर में सलीम आरिफ के साथ गुलजार साहब, जिनका अगस्त १८ को जन्मदिन था, कई यादगार मुलाकातें हुई। गुलजार साहब से मिलना उनको सुनना और उनके साथ वक्त गुजरने का मौका मिला।

मुझे याद है गुलजार साहब ने माचिस फिल्म बनाई थी उसका एक स्पेशल शो लखनऊ में आयोजित किया गया था। गुलजार साहब की फिल्म उनके साथ देखने का तजुर्बा बिलकुल अलग था। गुलजार साहब से माचिस फिल्म पर विस्तार से बात भी हुई जिससे फिल्म की पृष्ठ भूमि समझने में आसानी हुई। मेरे लिए वो बहुत खुशी का दिन था जब गुलजार साहब ने मेरा निमंत्रण स्वीकार किया किया और सलीम आरिफ के साथ मेरे घर आए।

करीब डेढ़ घंटे हमारे घर रुक कर गुलजार साहब ने बहुत से किस्से सुनाए। मेहमूद गजनवी के सोमनाथ पर हमलों से लेकर उनका चर्चित चड्डी पहनकर फूल किला जंगल जंगल तक के बारे में गुलजार साहब ने अपने तजुर्बे सुनाए जिनको सुनना का मौका सबको नहीं मिलता है। गुलजार ज्ञान के भंडार है जितना भी सुना जाए वो कम है।

हमारे घर से निकलने पर गुलजार साहब ने लखनऊ घूमने का प्रोग्राम बनाया। लेकिन घर से निकलने पहले उन्होंने जो बात कही वो आज भी दिमाग में गूंजती है। गुलजार साहब ने कहा की किसी शहर को घूमने से पहले वहां की सबसे अच्छी किताबों की दुकान जाना चाहिए। वे मन बना कर आए थे की राम आडवाणी जी की दुकान पर जाना है। गुलजार साहब ने कहा कि डा सलीम अली की किताब खरीदनी है।

जन हम तीनो लोग राम आडवाणी जी दुकान पर गए तो वे घर खाने जा चुके थे। लेकिन गुलजार साहब को डा सलीम अली की किताब चिड़ियों के बारे में मिल गई थी। साथ अचानक एक किताब फिल्मों के बारे में मिल गई जिसमें उनके बारे में विस्तार से लिखा था। गुलजार बहुत खुश हुए और आवाज दे कर हम दोनो को बुलाया और किताब दिखाई फिर बोले की अब यह भी खरीदनी पड़ेगी। राम आडवाणी जी दुकान पर विजिटर बुक में बहुत अच्छा कॉमेंट लिख कर गुलजार साहब के साथ हम लोग बाहर आए।

फिर गुलजार साहब और सलीम आरिफ के साथ हम पुराने लखनऊ में बड़े इमामबाड़े छोटे इमामबाड़े शाही मस्जिद और लौटे हुए सिटी स्टेशन के पास मीर तकी मीर की मजार देखते हुए वापस होटल लौटे।

वैसे तो बचपन से इन ऐतिहासिक इमारतों के चक्कर लगा रहे थे लेकिन गुलजार साहब के साथ जाने का और उनके बातें सुनने का तजुर्बा बिल्कुल ही अलग था। गुलजार साहब दुनिया भर की तमाम ऐतिहासिक इमारतों के बारे भी बता रहे थे। गुलजार साहब का मानना था लखनऊ की पहचान मैं मीर तकी मीर का भी अहम जगह होना चाहिए।

इस तरह से एक बार गुलजार साहब लखनऊ आए हुए थे डा निशी पांडे ने इंदिरानगर मैं नात्यग्राम मैं एक समारोह आयोजित किया था जिसमें गुलजार साहब और सलीम भी मौजूद थे। उस ज़माने में हमारे हाथ में प्लास्टर लगा हुए जिसको देखकर गुलज़ार साहब चिंतित हुए। फिर गुलजार साहब ने हमारे प्लास्टर पर पहले लिखा साबुत हाथ के लिए और साथ ही अपने मशहूर शेर के साथ अपने हस्ताक्षर किए।

गुलजार साहब तो चले गए लेकिन पूरे शहर और खासतौर से पत्रकार जगत में हमारे प्लास्टर की चर्चा हो गई।सब लोग देखना चाहते की गुलजार साहब ने क्या लिखा। अब हम किसी प्रेस कांफ्रेंस में जाएं और बाद में बरसात होने लगे तो सब पत्रकार मित्रों को हमसे ज्यादा हमारे प्लास्टर की चिंता होने लगती तो लोग कहते कपूर साहब आप भीग जाओ कोई बात नहीं लेकिन प्लास्टर और गुलजार साहब का लिखा नहीं भीगना चाहिए। लीजिए हमसे ज्यादा उस प्लास्टर की ज्यादा चिंता थी जिस पर गुलजार साहब ने अपना मकबूल शेर लिख कर हस्ताक्षर किए थे।

हाथ ठीक हो गया लेकिन हमने कई साल प्लास्टर बचा कर रखा था गुलजार साहब की खातिर।

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