आदिवासी समाज को आंदोलन से जोड़ने की किसानों की ऐतिहासिक पहल, देशभर में आज मना रहे “हूल क्रांति” दिवस

आदिवासी समाज को आंदोलन से जोड़ने की किसानों की ऐतिहासिक पहल, देशभर में आज मना रहे “हूल क्रांति” दिवस

तीन कृषि कानून के खिलाफ दिल्ली की सीमा पर डटे किसान अपने आंदोलन को विस्तार देने के लिए आज देश भर में “हूल क्रांति” दिवस मना रहे हैं। अंग्रेजों के दास्ता के खिलाफ आज ही के दिन 30 जून 1855 को देश में आदिवासियों ने बड़े विद्रोह की आवाज उठाई थी ।

जिसमें अंग्रेजों से लड़ते हुए 20,000 लोगों ने शहादत दी। क्रांतिकारियों को याद करने व आदिवासी समाज से एकता स्थापित करने के लिए इस “हूल क्रांति” दिवस के आयोजन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के आह्वान पर किसान संगठनों ने दिल्ली की सीमा के अलावा उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उप्र व बंगाल के और इलाकों में विभिन्न आयोजन किए।

अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा की केंद्रीय कार्यकारिणी ने संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा 30 जून को “हूल क्रांति” दिवस मनाये जाने का स्वागत करते हुए अपनी सभी इकाइयों को जन गोलबंदी के साथ इसे मनाने का निर्देश दिया था। अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा महासचिव डॉ आशीष मित्तल ने कहा कि आदिवासियों का संघर्ष किसानों के संघर्ष का अभिन्न हिस्सा है। संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने चल रहे किसान आंदोलन की, आदिवासियों के जमीन, वन उत्पाद, संस्कृति तथा राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए चल रहे संघर्षों के साथ एकजुटता जताई है।

हूल क्रांति दिवस की पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुये बताया है कि 30 जून 1855 को कोलकाता की ओर कुछ के साथ शुरू हुए इस संथाल विद्रोह को तत्काल औपनिवेशिक शासकों ने हूल क्रांति का नाम दिया। यह शानदार संघर्ष, अंग्रेज उपनिदेशक शासकों और उनके अधीनस्थ स्थानीय जमींदारों के शोषण व उत्पीड़न के खिलाफ आदिवासियों ने लड़ा था। अंग्रेजों ने इस संघर्ष को कुचलने के लिए अपनी अपनी उपनिवेशिक फौज को भेजा और इस संघर्ष में 15000 आदिवासियों ने अपनी जान की कुर्बानी दी। इसका हथियारबंद दौर जनवरी 1956 तक चला।

बहराइच में चांद और भैरव को अंग्रेजों ने मौत की नींद सुला दिया, तो दूसरी तरफ सिदो और कान्हू को पकड़ कर भोगनाडीह गांव में ही पेड़ से लटका कर 26 जुलाई, 1855 को फांसी दे दी गयी। इन्हीं शहीदों की याद में हर साल 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है। इस महान क्रांति में लगभग 20,000 लोगों को मौत के घाट उतारा गया।

यह संघर्ष राजमहल पहाड़ियों के संथाल आदिवासियों का हथियारबंद संघर्ष था, जो इलाका अब झारखंड में है। यह औपनिवेशिक शासकों और जमींदारों द्वारा जमीन तथा वन उत्पाद पर कब्जा करने और जबरन मुफ्त में मजदूरी कराने के विरुद्ध लड़ा गया था। उस समय अंग्रेज वहां पर रेल लाइन बिचवा रहे थे और इस काम के लिए वे आदिवासियों व संसाधनों का क्रूर शोषण कर रहे थे।

अपने अधिकारों के लिए आज भी संघर्षरत है आदिवासी समाज

आदिवासी अपनी जमीन व जीविका की रक्षा करने के लिए लड़ रहे हैं। हालांकि उनके अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कई कानून बनाए गए हैं, जैसे संथाल परगना टेनेंसी कानून, छोटानागपुर टेनेंसी कानून, संयुक्त आंध्र प्रदेश का 1/1970 कानून और उड़ीसा का 1958 का रेगुलेशन 2 कानून, आदिवासियों और गैर आदिवासी गरीबों को बुनियादी अधिकारों से वंचित करने की प्रक्रिया तेजी से जारी है। वन अधिकार कानून 2006, आदिवासियों के संघर्षों के दबाव में बनाया गया था।

परंतु इसका अमल बहुत ही कमजोर है और किसी भी राज्य सरकार ने कानून के अनुसार उन्हें जमीन के पट्टे नहीं दिए गये हैं। यही नहीं, आदिवासियों को उनकी जमीन व वनों से भारी मात्रा में बेदखल कर इन्हें विदेशी व घरेलू बड़े कारपोरेट घरानों को सौंपा जा रहा है।

आदिवासी लोग सुरक्षाबलों द्वारा भारी दमन का शिकार हैं और हजारों की संख्या में वे यूएपीए जैसे काले कानूनों के तहत जेलों में बंद हैं। उनकी बस्तियों पर सुरक्षा बलों ने नियंत्रण जमाया हुआ है।

क्या है हूल क्रांति दिवस

30 जून को मनाये जाने वाले हूल दिवस को क्रांति दिवस को संथाल विद्रोह भी कहा जाता है। यह अंग्रेजों के ख़िलाफ़ आज़ादी की पहली लड़ाई थी। इस लड़ाई का नेतृत्व सर्वप्रथम संथाल परगना के भोगनाडीह में सिदो-कान्हू ने किया था।

अंग्रेजों के जुल्म, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति वर्गों ने बिगुल फूंका और इस चिंगारी की लपटें पूरे हजारीबाग, बड़कागांव, टंडवा , चतरा, रामगढ़, रांची तक पहुंच गया था।

हजारीबाग में हूल क्रांति का नेतृत्व लुबिया मांझी, बैस मांझी और अर्जुन मांझी ने किया था। गोला, चास, कुजू, बगोदर आदि इलाकों में जनता ने खुल कर विद्रोहियों का साथ दिया। विद्रोहियों ने हजारीबाग जेल तक में आग लगा दी थी। विद्रोह में संताल और अन्य जातियों के हजारों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी। उस विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेज सेना को एड़ी-चोटी एक करना पड़ा। संथाल विद्रोह के बाद ही संथाल बहुल क्षेत्रों को अंग्रेजी हुकूमत द्वारा भागलपुर और वीरभूम से अलग किया गया और उसे ‘संथाल परगना’ नाम से वैधानिक जिला बनाया गया।

हूल दिवस का ऐतिहासिक महत्व

संथाली भाषा में हूल का अर्थ होता है विद्रोह। 30 जून, 1855 को झारखंड के आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका और 400 गांवों के 50,000 से अधिक लोगों ने भोगनाडीह गांव पहुंचकर जंग का एलान कर दिया। यहां आदिवासी भाई सिदो-कान्‍हू की अगुआई में संथालों ने मालगुजारी नहीं देने के साथ ही अंग्रेज हमारी माटी छोड़ों का एलान किया। इससे घबरा कर अंग्रेजों ने विद्रोहियों का दमन प्रारंभ किया।

अंग्रेजी सरकार की ओर से आये ज़मींदारों और सिपाहियों को संथालों ने मौत के घाट उतार दिया। इस बीच विद्रोहियों को साधने के लिए अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। बहराइच में चांद और भैरव को अंग्रेजों ने मौत की नींद सुला दिया, तो दूसरी तरफ सिदो और कान्हू को पकड़ कर भोगनाडीह गांव में ही पेड़ से लटका कर 26 जुलाई, 1855 को फांसी दे दी गयी। इन्हीं शहीदों की याद में हर साल 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है। इस महान क्रांति में लगभग 20,000 लोगों को मौत के घाट उतारा गया।

(लेखक उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता करते हैं, विचार उनके निजी हैं)

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