यूपी में विपक्ष की मौसमी सियासत बनी भाजपा की ताकत

यूपी में विपक्ष की मौसमी सियासत बनी भाजपा की ताकत

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में विपक्ष की मौसमी सियासत ही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है। योगी सरकार के साढ़े चार वर्ष पूरे होने जा रहे है और 2022 विधानसभा चुनाव को लेकर रैलियां, रथयात्रा एवं जातीय सम्मेलन शुरू हो गए है। विपक्ष की सभी गतिविधियां मौसमी सियासत हैं। विधानसभा चुनाव आने वाला है, सक्रिय हो गए हैं जबकि पिछले साढ़े चार वर्षों में विशेषकर कोरोना संकट में प्रदेश की जनता त्राहिमाम कर रही थी उस समय भी विपक्ष दिखाई नहीं दिया।

विपक्ष केवल ट्विटर तक सीमित रहा और जनता के बीच जाने से कतराता रहा जबकि इसके उलटे तमाम प्रशासनिक अराजकता स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और अनेकों समस्याओं के अम्बार के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा संगठन निरंतर जनसंपर्क में जुटा रहा।

यह अलग बात है कि कोरोना संकट में सरकार पूरी तरह असफल रही लोग ऑक्सीजन के बिना इलाज के बिना तड़प तड़प के मरे। कब्रिस्तान और श्मशान में दफनाने व जलाने के लिए 18 से 20 घंटों का इंतजार करना पड़ रहा था। ऐसी भयंकर त्रासदी जिससे प्रदेश का हर परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पीड़ित दुखी और आक्रोशित रहा लेकिन सरकार के खिलाफ जनभावनाओं को विपक्ष अपने पक्ष में करने में सफल नहीं रहा।

महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं, पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतें सहित तमाम जनता से जुड़े मुद्दे जिसे लेकर विपक्ष सरकार के खिलाफ माहौल बना सकता था लेकिन जनभावनाओं के अनुरूप विपक्ष गायब है। यह अलग बात है कि सत्ता के नाराज जनता विपक्ष के पास ही जाएगी चुकि जो भी मौजूदा भाजपा का विकल्प है सपा, बसपा, कांग्रेस नाराज मतदाता मजबूरी में इन्हीं में से विकल्प चुनेंगे।

सबसे बड़े विपक्ष अखिलेश यादव जो भाजपा के विकल्प के प्रबल दावेदार हैं कोरोना संकट और जनता की परेशानियों से रूबरू नहीं हुए। ट्विटर तक सीमित रहे। जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तमाम आरोपों प्रत्यारोपों के बीच भयंकर कोरोना काल में भी बहादुरी के साथ जनता से रूबरू होते रहे। चुनाव के कुछ महीने बचे हैं। अखिलेश यादव की रथयात्रा, बसपा का ब्राह्मण सम्मेलन, प्रियंका का लखनऊ दौरा शुरू गया है। जिसे मौसमी सियासत कह सकते है।

प्रदेश में जितनी समस्याएं है अगर विपक्ष वास्तविक रूप से जनभावनाओं के अनुरूप उनके दुःख दर्द में शामिल होकर विपक्ष की असली भूमिका का निर्वहन करता तो निश्चित रूप से प्रदेश का राजनीतिक माहौल योगी सरकार के खिलाफ एकतरफ़ा दिखाई देता। लेकिन तमाम असफलताओं के बाद भी योगी ईमानदारी और निरंतर कड़ी मेहनत भाजपा संगठन की सक्रियता जनता की नाराज़गी को भांपने और कम करने में काफी हद तक सफल दिखाई दे रही है। इस सफलता का क्रेडिट भाजपा से ज्यादा विपक्ष की नकारात्मक मौसमी सियासत है।

चुनाव आया दुःख दर्द जानने के लिए अखिलेश यादव रथ से निकल पड़े, बसपा के सतीश मिश्रा को ब्राह्मण याद आये , राम और अयोध्या याद आयी और ब्राह्मण सम्मेलन में जुट गए। प्रदेश के राजनीतिक क्षितिज से गायब हो चुकी कांग्रेस को, 2022 विधानसभा चुनाव को लेकर प्रियंका भी सक्रिय हो गयी।

हम यह कह सकते है कि आज भाजपा की ताकत विपक्ष की ट्विटर और जनता से दूरी बनाने का सबसे बड़ा आधार माना जाता है। जनता भी जानती है लेकिन जाति धर्म में बटे मतदाता की सोच को राजनीतिक दलों ने बहुत संकीर्ण बना दिया है। इसलिए चुनाव में जाति धर्म में बंट कर निजी लाभ से प्रभावित होकर जनप्रतिनिधियों का चयन कर रहे हैं।

(लेखक उत्तर प्रदेश के नामचीन राजनैतिक विश्लेषक हैं और पूर्व में सहारा समय उत्तर प्रदेश के स्टेट हेड रहे हैं, विचार उनके निजी हैं)

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