सैन्य साहित्य एवं सांस्कृतिक समारोह  लखनऊ में प्रारंभ

सैन्य साहित्य एवं सांस्कृतिक समारोह लखनऊ में प्रारंभ

आजादी की 75 वीं वर्षगांठ पर सैन्य साहित्य एवं सांस्कृतिक समारोह का आरंभ, लखनऊ में आभासी दुनिया (वर्चुअल )के माध्यम से हुआ। इसके उद्घाटन सत्र में तिरंगे झंडे का इतिहास, उद्गम ,एवं वर्तमान रूप की प्रासंगिकता पर विषय के विद्वानों डॉ सदन झा और श्री शेखर चक्रवर्ती ने कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। यह जानना अभिरुचि का विषय होगा कि संविधान सभा में 22 जुलाई 1947 को अनेक सदस्यों ने तिरंगे झंडे के अनेक पहलुओं पर विस्तार से अपना वक्तव्य दिया परंतु एक राष्ट्र के रूप में भारत ने ध्वज के रंगों को कोई एक अर्थ नहीं दिया है।

1916 से 1931 तक, स्वराज आंदोलन में एकता के प्रतीक के रूप में एक ध्वज की आवश्यकता महसूस की गई और काफी मंथन के पश्चात, "स्वराज -ध्वज" के रूप में वर्तमान तिरंगे को स्वीकार। प्रारंभ में, इसके मध्य में चरखा ,आत्मनिर्भरता और सरलता का प्रतीक बना। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज नामक पुस्तक के लेखक डॉ सदन झा ने, आभासी माध्यम से सूरत से जुड़ कर, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि समय एवं समाज की सोच के साथ झंडे के रंग -रूप की व्याख्या भी बदलती रही है ı 1931 में इसके तीन रंगों को धर्म से जोड़ा गया जिसे कालांतर में शौर्य, समृद्धि और शांति का प्रतीक माना गया। इसी प्रकार चक्र को सम्राट अशोक से प्रतिबिंबित करते हुए कालांतर में इसे सतत गतिशील या विकास की अवधारणा से जोड़ा गया ।

राष्ट्रीय ध्वज निशब्द होते हुए भी स्वयं में संपूर्ण है। कोलकाता से प्रसिद्ध ध्वज -शास्त्री श्री शेखर चक्रवर्ती ने झंडे की विभिन्न स्थितियों एवं समय ब बोध पर चर्चा करते हुए बताया कि जब झंडा आधा झुका हो या किसी दुर्गम चोटी पर फतेह करने के बाद लहराया जाए तो इसका सार्वभौमिक भाष्य है, इसके बाद कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है। प्रोफेसर सदन झा ने झंडे की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐसे प्रतीक की जरूरत महसूस की गई जो राष्ट्रीय स्तर पर, क्षेत्रीय पहचान के ऊपर, जनमानस को एक सूत्र में बांधने वाला हो।

स्वतंत्रता -ध्वज की 1906 से अपनी पहचान बनती बिगड़ती रही है। इसके बावजूद इसके प्रतीक चिन्ह के वजूद के बारे में सामान्य सहमति बनी रही और इसी के फलस्वरूप, इसे 1931 में एक पहचान मिली। 1947 में इसे संविधान सभा द्वारा कुछ सुधारों के पश्चात राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। सभी देशों के अपने प्रतीक चिन्ह हैं और उसी के साथ उनका राष्ट्रीय ध्वज भी है। यही ध्वज हमारे समाज और राष्ट्र के लिए जीने मरने का कारण बनता है।

राष्ट्रीय सम्मान का इससे बड़ा प्रतीक चिन्ह और कोई नहीं है ı इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि भारत के राष्ट्रपति को 1947 में महिलाओं के समूह ने नारी शक्ति का समर्थन करते हुए पहला राष्ट्रीय ध्वज भेंट किया था। साहित्य एवं सांस्कृतिक समारोह लखनऊ का यह वर्चुअल आयोजन आगामी नवंबर माह तक चलेगा ।सितंबर के अतिरिक्त सभी महीने में पढ़ने वाले सप्ताहांत पर, विभिन्न विषयों पर पर चर्चाएं आयोजित करने का कार्यक्रम है, जिसमें जाने-माने लेखक एवं विद्वान भाग लेंगे।

उद्घाटन समारोह का प्रारंभ इस आयोजन के जनक एवं परिकल्पना को साकार रूप देने वाले मेजर जनरल हेमंत कुमार सिंह (सेवानिवृत्त) के स्वागत अभिव्यक्ति से हुआ उन्होंने इस अनूठे प्रयास को लखनऊ शहर की विरासत में समृद्धि का एक और पायदान बताया। कार्यक्रम का संचालन लेफ्टिनेंट जनरल रामेश्वर यादव (सेवानिवृत्त) ने किया। कार्यक्रम का प्रसारण झूम एवं फेसबुक पर सजीव रूप से किया गया।

-- बसंत नारायण

(सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी)

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