आस्था अब देश के कानून और संविधान दोनों से ऊपर !

वरिष्ठ पत्रकार कमल जयंत की कलम से
आस्था अब देश के कानून और संविधान दोनों से ऊपर !

लखनऊ ।। बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आया सीबीआई कोर्ट का फैसला सवालों और विवादों के घेरे में आ गया है। अदालत के इस फैसले को लेकर तमाम बुद्धिजीवियों व पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने सवाल उठाए हैं। यह पहला मामला है जब अदालत के फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया आ रही है। अधिकांश लोगों का यही कहना है कि यदि मस्जिद ढहाई गई तो इसके लिए कोई तो जिम्मेदार जरूर होगा।

मस्जिद गिरी यह तो साफ है, इस मामले में लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय का दो बार आब्जर्वेशन आया, जिसमें कहा गया कि मस्जिद गिराई गई। बावजूद इसके सीबीआई कोर्ट का इस मामले में सारे आरोपियों को बरी किया जाना समझ से परे है। जबकि कुछ का कहना है कि इस देश में आस्था कानून से ऊपर है। यहां सारे फैसले आईपीसी के तहत आधार पर नहीं बल्कि आस्था के आधार पर होते हैं।

इस मामले पूर्व आईएएस कुंवर फतेह बहादुर का कहना है कि बाबरी विध्वंस मामले में सीबीआई कोर्ट का फैसला न केवल असंतोषजनक है, बल्कि यह हास्यास्पद भी है। सीबीआई कोर्ट २८ साल में यही नहीं पता कर पायी कि मस्जिद किसने गिराई। जबकि मस्जिद को गिराते हुए टीवी पर सारी दुनिया ने देखा। बल्कि यूपी के लोगों को तो इस संबंध में ठीक से जानकारी है। मस्जिद गिरी यह साफ स्पष्टï है और इस मामले में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को एक दिन की सजा भी हुई।

कुंवर फतेह बहादुर का कहना है कि इस मामले की निगरानी के लिए संभवत: सुप्रीम कोर्ट ने एक जिला जज को पर्यवेक्षक नियुक्त किया था, जिला जज की क्या रिपोर्ट है। ढांचा गिराये जाने के दौरान भारी भीड़ थी, जबकि उस दिन कोई धार्मिक पर्व नहीं था। फिर वहां नारे लगाये जा रहे थे एक धक्का और दो।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष २०१७ और २०१९ में अपने आब्जर्वेशन में कहा है कि मस्जिद गिराई गई। इन सारे साक्ष्यों से साफ है कि मस्जिद गिरी और इसे किन लोगों ने गिराई। अब देखना यह होगा कि सीबीआई इस मामले में हाईकोर्ट में अपील करेगी या फिर किसी दबाव में आकर इस मामले में शांत बैठ जाएगी।

पूर्व सांसद उदित राज का कहना है कि यह पहला मौका है जब आरोपी कह रहा है कि उसने गुनाह किया, लेकिन जज साहब कह रहे हैं कि तुम गुनाह कैसे कर सकते हो, तुमने गुनाह नहीं किया। उदित राज ने कहा कि फैसला सुनाए जाने के एक दिन पहले उमा भारती का बयान है कि वह जेल जाने के लिए तैयार हैं।

बाबरी विध्वंस मामले में भाजपा नेताओं के खुले बयान हैं कि उन्होंने मस्जिद गिराई और सारे साक्ष्य भी उनके खिलाफ हैं, बावजूद इसके ट्रायल कोर्ट उन्हें साक्ष्य के आधार पर नहीं बल्कि आस्था के आधार पर बेकसूर बता रहा है। उन्होंने कहा कि इस देश में न्याय व्यवस्था कानून के आधार पर नहीं बल्कि आस्था के आधार पर चल रही है। मानव इतिहास में पहली बार कानून बना है जिसका नाम है आस्था। आस्था अब कानून से ऊपर है। जज साहब आस्था के आधार पर फैसला दे रहे हैं। आईपीसी के तहत नहीं।

पूर्व आईएएस एसपी आर्या का कहना है कि बाबरी विध्वंस मामले में जब अदालत को कोई साक्ष्य ही नहीं मिले तो अदालत उन्हें सजा कैसे दे सकता है। ढांचा गिरा अवश्य है, लेकिन किसने गिराया है, इसके साक्ष्य नहीं हैं तो क्या किसी को भी सजा दे दी जाए। फैसला उचित है। सीबीआई अदालत में कोई भी साक्ष्य नहीं दे सकी। ३५१ लोगों की गवाही के बाद भी यह स्पष्टï नहीं हो पाया कि किन लोगों ने मस्जिद गिराई। लिहाजा अदालत का फैसला बिल्कुल सही है। इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं बचती।

  • बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर सीबीआई कोर्ट के आए फैसले पर उठे सवाल

  • -आरोपी गुनाह कबूल रहा और जज साहब कह रहे तुम बेगुनाह हो

  • इस फैसले को वह ही मान सकता है जो आंख का अंधा और कान का बहरा ही मान सकता

पूर्व आईपीएस रामेश्वर दयाल का कहना है कि ढांचा तो गिरा है। इसके लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं यह कैसे संभव है। तीन हजार पेज का फैसला आया, उसमें अदालत ने किसी को भी दोषी नहीं ठहराया। अदालत का यह फैसला बुद्धिजीवियों के लिए समझ से परे है क्योंकि इस पूरे मामले में मस्जिद गिराने का वीडियो-आडियो सब मौजूद है। बावजूद इसके सभी को क्लीनचिट दिया जाना गले से नहीं उतरता।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र के विभागाध्यक्ष डा. विवेक कुमार का कहना है कि सत्रह वर्ष लिब्राहन आयोग ने मामले की जांच की और अपनी रिपोर्ट दी। उस रिपोर्ट के विपरीत आये फैसले से साफ है कि अदालत का फैसला पूर्व नियोजित है। अदालत के फैसले से यह बात साफ हो गई है कि लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट गलत थी। फैसले से साफ है कि सत्यता दब गई है। मस्जिद सोची-समझी साजिश के तहत गिराई गई थी। उसे कैसे झुठला सकते हैं। फैसला सत्य से परे है।

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का कहना है कि फैसला साक्ष्यों के विपरीत है। सीबीआई को हाईकोर्ट जाना चाहिए। ताकि देश की जनता का कानून और अदालत पर विश्वास पुख्ता रहे। अदालत में लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट ठीक से नहीं पेश की गई। इससे सीबीआई की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। ये फैसला कानून-व्यवस्था के साथ मजाक है। इस फैसले को वह ही मान सकता है जो आंख से अंधा और कान से बहरा हो। मैं घटनास्थल पर मौजूद था। भाजपा के वरिष्ठï नेताओं ने मस्जिद पर चढ़े लोगों को उतरने के लिए माइक से एनाउंस किया और कहा कि ढांचा गिराया जाने वाला है, इसके बाद गैंती से दीवार काटकर उसमें मोटा रस्सा डालकर दीवारों को गिराया गया।

पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी का कहना है कि अदालत का फैसला गलत है। सीबीआई ने जानबूझकर साक्ष्य नहीं पेश किये। मस्जिद गिराने की पूरी साजिश में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव और पूर्व के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह शामिल थे। उन्होंने कहा कि जो फैसला आया है, जमीनी सच्चाई उसके विपरीत है। सीबीआई को इस मामले में हाईकोर्ट जाना चाहिए, ताकि लोगों का कानून और अदालत पर विश्वास पुख्ता रहे।

कानपुर मेडिकल कालेज के पूर्व प्रिंसपल डा. आनंद स्वरूप का कहना है कि सीबीआई कोर्ट का फैसला न्यायिक न होकर भावनात्मक है। यह फैसला न्याय के सिद्धांतों और कानूनी प्रक्रिया के विपरीत है। बाबरी विध्वंस मामले में आया फैसला आपराधिक प्रक्रिया की पूरी तरह से धज्जियां उड़ा रहा है। उन्होंने कहा कि यह फैसला पूरी तरह से संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत है।

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं जिन्होंने बरसो बरस से उत्तर प्रदेश को बहुत नज़दीक से देखा व समझा है, विचार निजी हैं )

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