शिव कृपा की रात्रि है शिवरात्रि

शिव कृपा की रात्रि है शिवरात्रि

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महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक गहन और सूक्ष्म प्रतीक है। यह रात्रि उस अनंत शून्यता की याद दिलाती है जिसमें से सृष्टि का उद्भव होता है और जिसमें अंततः सब कुछ विलीन भी हो जाता है।

शिवरात्रि का नाम ही इसका आध्यात्मिक सार बता देता है, "शिव की महान रात्रि।" यहाँ "रात्रि" अंधकार या अज्ञान की प्रतीक नहीं, अपितु उस गहन शांति और स्थिरता की प्रतीक है जहाँ बाहरी दुनिया की गति रुक जाती है और भीतरी जागृति प्रारंभ होती है। शिव न तो देवता, न व्यक्ति। वह शुद्ध चेतना हैं। शिव को समझने का सबसे गहरा आध्यात्मिक दृष्टिकोण यही है कि वे कोई व्यक्तिगत देवता नहीं हैं। वे वह निराकार, निर्गुण, अनादि सत्ता हैं जो संपूर्ण अस्तित्व का आधार है। शिव का अर्थ — "शिवं करोति इति शिवः" अर्थात् जो सदा कल्याण करता है। वे संहार ही नहीं करते, वे पुराने को विलीन कर नए निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। वे तांडव करते हैं न केवल विनाश का, अपितु अनंत गति और ऊर्जा का नृत्य भी करते हैं।

जब हम शिवरात्रि की रात जागते हैं, तो वास्तव में हम अपने भीतर के उस अहंकार, आसक्ति और विचारों के तांडव को शांत करने का प्रयास करते हैं, ताकि शुद्ध चेतना का अनुभव हो सके। इस रात्रि में जागरण के अंधेरे में ज्योति का अनुभव करते हैं। जबकि सामान्य रात्रि में अधिकांश प्राणी सो जाते हैं। लेकिन संयमी साधक इस रात्रि जागता है। गीता का यह श्लोक इस रात की महिमा बयान करता है, "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥"

(गीता 2.69: जो रात्रि समस्त प्राणियों के लिए नींद की होती है, उसी में संयमी जागता है। और जिस रात्रि में प्राणी जागते हैं (भौतिक विषयों में), वही मुनि के लिए निशा (अंधकार) होती है)

शिवरात्रि पर रात्रि जागरण इसी सूत्र का जीवंत अनुपालन है। हम बाहरी नींद से जागकर भीतरी नींद (अज्ञान) से जागने का संकल्प लेते हैं। योगिक दृष्टि से शिवरात्रि योगिक परंपरा के अनुसार फाल्गुन मास की यह कृष्ण चतुर्दशी वह रात है जब चंद्रमा की कलाएँ न्यूनतम होती हैं और मन की अस्थिरता स्वाभाविक रूप से कम होती है। पृथ्वी की ऊर्जा ऊर्ध्वगामी प्रवाह में अधिक सक्रिय होती है। जिससे इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों का संतुलन साधना आसान हो जाता है।

इसलिए इस रात ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप, ध्यान, मौन साधना और शिवलिंग पर दृष्टि स्थिर करना अत्यंत प्रभावी हो जाता है। शरीर सीधा, रीढ़ सीधी, आँखें बंद—और चेतना को शून्य में विलीन करने का सबसे अनुकूल समय होता है ये। शिवरात्रि के व्रत का आध्यात्मिक पक्ष में है कि इस, दिन केवल भोजन का त्याग नहीं, इंद्रियों और मन के व्यर्थ संग्रह का उपवास करना होता है।

जलाभिषेक के तौर पर बाहरी नहीं, भीतरी अहंकार पर अमृत-जल की धारा गिरानी होती है। बिल्व पत्र चढ़ाने का तात्पर्य की तीन पत्तियों में तीन गुणों (सत्-रज-तम) का संतुलन बनाना होता है।‌ जबकि 'शिवलिंग' वह बिंदु माना गया है जहाँ सृष्टि और संहार मिलते हैं अर्थात शून्य और पूर्ण का मिलन।

इस प्रकार महाशिवरात्रि हमें याद दिलाती है कि जीवन की हर "रात्रि", दुख, हताशा, अंधकार में भी शिव मौजूद हैं। रात्रि जितनी गहरी होगी, उतनी ही उसमें छिपी ज्योति तेज़ होगी। जो इस रात को केवल पूजा-पाठ तक सीमित रखता है, वह धार्मिक बनता है। जो इस रात में अपने भीतर उतरकर "शिवोऽहम्" का अनुभव करता है, वह आध्यात्मिक बन जाता है।

इस महान रात्रि में हम सब अपनी चेतना को उस अनंत शांति के साथ अनुभव करें यही महादेव से प्रार्थना है।

- राजीव तिवारी

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