14 और 24 का फर्क समझे भाजपा नेतृत्व, हिन्दुत्व के अंगने में जाति का क्या काम !

14 और 24 का फर्क समझे भाजपा नेतृत्व, हिन्दुत्व के अंगने में जाति का क्या काम !

लखनऊ, सितंबर 12 (TNA) सुपर स्टार की फिल्म में सह कलाकारों को ज्यादा स्पेस देना दर्शकों को खटकता है। यूपी की सियासत की रियल रील में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिन्दुत्व का चेहरा हैं इसलिए यहां जाति के नेताओं की अहमियत बढ़ाना घातक साबित होती है। दलित और पिछड़ी जातियों के नेताओं के बजाय हर वंचित समाज की जनता को योजनाओं का लाभ देकर एहमियत देना भाजपा का हिट फार्मूला है।

विभिन्न जातियों के नेताओं को सियासी भागीदारी तक सीमित रख कर हिन्दुत्व के धागे में सनातनियों को एकसूत्र में एकजुट करने के पैटर्न को स्वीकार करने वाला बहुसंख्यक समाज भाजपा के जातिवादी नेताओं को अस्वीकार करता जा रहा है।

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यूपी में दोबारा जीतने का लगभग पौने चार दशक का रिकार्ड तोड़कर प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की थी परंतु इसी चुनाव में ओबीसी के नेता कहे जाने वाले डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य चुनाव हार गए थे। इसके बाद अभी हाल में घोसी की अपनी ही सीट पर दारा सिंह चौहान को पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस बहुचर्चित चुनाव की हार में ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद इत्यादि को भी पराजित माना गया, क्योंकि यहां ये नेता स्वजातीय मतदाताओं के समर्थन का वादा नहीं निभा सके।

यही चुनाव यदि जातियों के नेताओं की अहमियत के कॉकटेल के बजाय सिर्फ योगी के चेहरे, हिन्दुत्व के एजेंडे और बुल्डोजर मॉडल पर केंद्रित होता तो नतीजा शायद कुछ और ही होता। लेकिन पिछड़ी जातियों के मतदाताओं ने जातियों के नेताओं को स्वीकार नहीं किया। इन नेताओं के जातिवादी बड़बोलेपन से भाजपा के पारंपरिक समर्थक सवर्ण वर्गों की जनता ने भी भाजपा से नाराजगी के संकेत दे दिए। घोसी में जातिवाद की अति वाले इस चुनाव में भाजपा को उसकी गलती की चेतावनी मिल गई है।

हांलांकि उत्तर प्रदेश नेतृत्व नहीं चाहता कि आइनदा जातिवाद की अति हिन्दुत्व के वैभव के आगे आड़े आए। यूपी के भाजपाई खेमे के लोगों का मानना है कि हिन्दुत्व का रथ विकास और कानून व्यवस्था के घोड़ों से लोकसभा की सफलता का लक्ष्य हासिल कर लेगा। इस रथ पर अगड़े-पिछड़ों की समस्त जातियों का विश्वास बहुत पहले ही क़ायम हो चुका है। दलितों,पिछड़ों, सवर्णों..सबको योगी आदित्यनाथ का हिन्दुत्व का चेहरा स्वीकार है। ऐसे में जातिवाद की कटुता पैदा करने वाले अलग-अलग जातियों के नेताओं को अहमियत देना कई बार घातक साबित होती है।

मुलायम सिंह यादव मुसलमान नहीं थे लेकिन मुस्लिम समाज के सबसे बड़े नेता साबित हुए थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह की मंडल की राजनीति ने उन्हें पिछड़ों का विश्वसनीय नेता बनाया था। इसी तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अगड़े-पिछड़े सभी जातियों के लोगों ने सार्वाधिक लोकप्रिय और जननेता के तौर पर स्वीकार किया।

यूपी के भाजपा समर्थक, कार्यकर्ता मानते हैं कि उत्तर प्रदेश का नेतृत्व अपनी सफल रणनीति के जरिए लोकसभा चुनाव में इंडिया गंठबंधन की हर चुनौती का मुकाबला कर पचहत्तर प्लस सीटें जीतने के लिए सक्षम है। बशर्ते केंद्रीय नेतृत्व मार्गदर्शन ज़रूर करे पर दखलअंदाजी ना करे। यहां क्षेत्रीय दलों की जाति की राजनीति का मुकाबला सनातन धर्म के प्रहरी मुख्यमंत्री योगी के हिन्दुत्व के चेहरे, विकास और माफियाओं के विनाश के बल पर किया जा सकता है। दंगा मुक्त हो चुके उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था लोकसभा चुनाव जिताने में सक्षम है। यहां ओबीसी का विश्वास जीतने के अगड़े-पिछड़ों का बिखराव खत्म करने वाले योगी का चेहरा ही काफी है।

जरुरी नहीं कि किसी जाति के लोग अपनी जाति के नेता पर विश्वास करें।‌ पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुलायम सिंह यादव और फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ये साबित कर चुके हैं कि नेता में दम हो तो विभिन्न धर्म और जाति की आवाम उस नेता के नेतृत्व को दिल से स्वीकार कर लेते हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी की जातिगत राजनीति को हाशिए पर लाकर सनातनियों की जातियों की दूरियों को मिटाकर उन्हें हिन्दुत्व के गुलदस्ते में सजाया। हिन्दू समाज एकजुट हुआ भाजपा ने यूपी में सफलता का एक नया रिकॉर्ड कायम किया। ऐसे में दलित, ओबीसी, अगड़े-पिछड़े.. सभी ने बिना जाति देखे योगी आदित्यनाथ को सत्ता देना बेहतर समझा। तो फिर हिन्दुत्व के आंगन में जातिवाद को क्यों बढ़ाया जाए ?

2014 और 2024 में फर्क है। 2014 से पहले उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की जातिगत राजनीति हावी थी। दलित,पिछड़ा, सवर्ण बंटे हुए थे। यहां योगी आदित्यनाथ जैसा चेहरा नहीं चमका था। तब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यूपी में डेरा डालकर यहां पिछड़े-दलितों के नेताओं की बगिया सजाकर इसे हिन्दुत्व का खाद्य-पानी दिया। सभी की भागीदारी से उस पुरानी धारणा को मिटाया जिसके तहत कहा जाता था कि भाजपा सवर्णों की पार्टी है।

उसके बाद जाति की राजनीति के बंधन टूटे। दूरियां मिट गईं, सरहदें टूट गई और हिन्दुओं के सभी वर्गों में एकता स्थापित हो गईं। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और फिर उन्होंने सर्व समाज, सर्व जातियों, दलितों, पिछड़ों,कायस्थों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, भूमिहारों, जाटों... सभी का विश्वास जीत लिया। फ्री आवास, फ्री राशन, फ्री शौचालय इत्यादि सरकारी योजनाओं ने गरीबों,वंचितों का भरोसा कायम करने में सोने पे सुहागा जैसा काम किया।

यूपी के कुछ भाजपाइयों के ऐसे तर्क ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि ओमप्रकाश राजभर, संजय निषाद और दारा सिंह चौहान जैसे दलबदलुओं की जातिवादी राजनीति के नाज़- नखरे उठाने और बड़बोलापन बर्दाश्त करने की क्या जरूरत है ! इत्तेफाक ये भी है कि भाजपा की राजनीति परिवारवाद के खिलाफ है और यूपी में एनडीए के घटक ओम प्रकाश राजभर हों, अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद हों, बिहार में जीतनराम मांझी, चिराग पासवान, महाराष्ट्र में अजीत पवार हों, इन सबके दलों की राजनीति परिवारवाद पर केंद्रित है।

विशुद्ध राजनीति तो यही कहती है कि बेहतर यही है कि जातियों के नेताओं का राजनीतिक परिवारवाद, दलबदलु आचरण और बड़बोलेपन को अहमियत देने के बजाय इन नेताओं की जातियों की आम जनता को अहमियत दे और जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ तब तक जारी रखा जाए जब तक ये वंचित समाज विकास पथ पर आगे बढ़कर अपना पिछड़ापन दूर ना कर लें।

— नवेद शिकोह

logo
The News Agency
www.thenewsagency.in