Photos By Rimjhim Verma
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यमुना की दुर्दशा, आगरा की जीवन रेखा 'कालिंदी' पर लग गयी है दीमक

TNA Contributor

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आगरा ।। आगरा में पूरे वर्ष यमुना नदी की दशा तलहटी में बहते एक नाले जैसी रहती है। वहीं बरसात के मौसम में बांधों से जल छोड़े जाने के कारण, ये पानी से लबालब हो जाती है। इससे कई जगहों पर बाढ़ तक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। और फिर वर्षा ऋतु के गुजरने के बाद यमुना मैय्या को दोबारा उन्हीं हालातों से वाकिफ़ होना पड़ता है। हमारे शहर की जीवन रेखा 'कालिंदी' पर ऐसे कौन से दीमक लगे हैं, जो इसे खोखला कर रहे हैं। और इसके अस्तित्व को संकट में डाल रहे हैं।

वर्तमान में शहर में यमुना नदी की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए हमनें एक सफर तय किया। जिसकी शुरुआत हुयी 'कैलाश मंदिर' से।

मथुरा से निकल कर कालिंदी जब आगरा में प्रवेश करती है तो सबसे पहले जो घाट आता है, वो है 'कैलाश मंदिर घाट'। इस घाट पर यमुना की स्थिति देखने लायक है। दूर तक नज़र दौड़ाइए, और बस पानी ही पानी। तरल अविरल तरंगों के साथ बहता स्वच्छ नीला पानी, जिसे देख कर आपको आगरावासी होने पर गर्व की अनुभूति प्राप्त हो सकती है।

वो भी अगले मौसम देखने को मिलेगा या नहीं, पता नहीं! इस क्षेत्र में नदी में गंदगी जाने का कोई बहुत बड़ा स्त्रोत नहीं है। इसलिए यहाँ पानी शुद्ध है। यहाँ से जैसे -जैसे यमुना शहर की तरफ बढ़ती है उसका पानी गन्दा होता जाता है।

सफर में कैलाश के बाद अगले पड़ाव पर हम पहुंचे 'पोइया घाट' पर। पोइया घाट, दयालबाग़ क्षेत्र में आता है। साल के बाकि दिनों में जहाँ अस्थि विसर्जन के भारी अवशेष, बड़े से छोटे जानवरों के अस्थि-कंकाल, प्लास्टिक की बोरियों में भरी पूजा सामग्री और मूर्तियों के अवशेष दिखाई देते थे। वहां अभी पानी की तेज़ धारा बहती नज़र आ रही है।

बहाव की सक्षमता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि वह सारी गन्दगी को साथ में बहा कर लिए जा रहा है। घाट कच्चा है, यानि मिट्टी का। इसलिए नदी का वेग कहीं- कहीं पर मिट्टी को काटता हुआ आगे बढ़ रहा है। किनारे पर उगी सारी जलकुम्भी भी बह चुकी हैं। कुछ समय पहले पोइया घाट के सौन्दर्यीकरण का जिम्मा स्वामी बाग टाउनशिप असोसिएशन ने लिया था। मगर अब तक कोई कार्यवाही देखने को नहीं मिली।

अगला घाट जहाँ हम पहुंचे। वो था, बल्केश्वर घाट। बल्केश्वर घाट पर भी पानी की बहुतायात मनमोहक थी। घाट पक्का है। लाल पत्थर लगे हुए हैं। जिसका निर्माण आगरा विकास प्राधिकरण(ADA ) की तरफ से 80 लाख के बजट पर हुआ है। यहाँ दीवारों पर आपको अच्छे सन्देश देते हुए कार्टून्स वाली पेंटिंग भी देखने को मिलेंगी। जैसे, "पानी बचाइए", "ग्रीन आगरा, क्लीन आगरा" इत्यादि। इस ग्रीन और क्लीन की जद्दोजहद में प्रकृति ने तो कोई शिकायत का मौका नहीं दिया।

लेकिन घाट पर पड़ा प्लास्टिक, थैलियां, जानवरों का मल इत्यादि यहाँ की नियमित स्वच्छता पर सवाल खड़े करता नज़र आया। यमुना की बात करें तो इस घाट तक आते-आते नदी के मिजाज़ थोड़े बदले हुए से लगे।

पानी के रंग में थोड़ा कालापन और गंदगी अलग से दिखायी दे रही है। पानी का बहाव अच्छा है, मात्रा भी भरपूर है तो फिर गंदगी क्यों? इसका कारण हमनें जानना चाहा तो पता लगा, पोइया घाट और बलकेश्श्वर घाट के बीच गांव के सभी घरों की गन्दगी और उनके जानवरों के बाड़ों की गंदगी का निस्तारण यमुना नदी में होता है। इतना ही नहीं, सौ फुटा रोड पर बनी तमाम 10 -20 इमारती मंज़िलों वाली सोसाइटी की गंदगी नालों द्वारा सब यमुना में जाकर मिलती है।

आगरा में यमुना नदी के अधिकारों के लिए शुरू की गयी मुहिम 'रिवर कनेक्ट कैंपेन' के संस्थापक सदस्य व पर्यावरणविद 'ब्रिज खंडेलवाल' ने बताया कि आधिकारिक रूप से शहर के लगभग 60 बड़े नाले नदी में गिरते हैं। इसके अलावा 20 -25 नाले गिरते हैं जिनका विभागीय रूप से कागज़ों में कोई ज़िक्र नहीं है। इन नालों से ढेरों प्लास्टिक, कतरन और पूरे शहर की अथाह गंदगी यमुना की हमसफ़र बन कर चलती है।

घाटों के सिलसिले में विघ्न डालते हुए, नदी आगे के सफर में नालों का बखान बयां करती दिखती है। बल्केश्वर घाट से निकल कर कालिंदी गुज़रती है घनी बस्तियों से। इन बस्तियों में रहने वाले काफी लोगों को इस बात की भनक तक नहीं है कि इनके घर का सीवेज यमुना में जाकर खुलता है। रास्ते में अगले पड़ाव पर मिलता है 'वाटर वर्क्स नाला', जिसे 'लंगड़े की चौकी ' नाला भी कहते हैं। ये नाला क्षेत्र के एक बड़े हिस्से की सभी गंदगी नदी में लाकर पटक देती है। नाले की सड़ी-गली, अनंत प्लास्टिक, बदबूदार भयावहता, ऐसी है, जो खुद के इंसान होने पर शर्म ला देगी। और यह दृश्य केवल यहीं नहीं, अन्य नाले भी यही दास्ताँ बयां करते दिखते हैं।

थोड़ा और आगे बढ़ने पर मिला, 'लाल घाट नाला'। ये नाला जीवनी मंडी, कृष्णा कॉलोनी और विजय नगर जैसी पॉश कॉलोनी की गंद को नदी में अर्पित करता नज़र आता है। और इसी के आगे अगला नाला दिखा, 'भैरों नाला'। भैरों नाला बाकि के नालों की तरह ही है। गंदगी, केमिकल, और प्लास्टिक से भरपूर। कुछ अलग है तो वो इसकी सीध में बना, नदी के उस पार, एत्माउद्दौला। यमुना नदी में अपना प्रतिबिम्ब बनाती ये ऐतिहासिक इमारत बहुत ख़ूबसूरत है। इसकी खूबसूरती में दाग लगाता है, तो वह है भैरों नाला!

रिवर कनेक्ट कैंपेन की टीम पिछले 7 सालों से एत्माउद्दौला व्यू पॉइंट से हर शाम यमुना आरती करवाती आ रही है। जिससे शहरवासी अपनी प्राकृतिक धरोहर के प्रति जागरूक हो सकें। और यमुना नदी के अस्तित्व को भावी पीढ़ियों के लिए सहेज सकें। पर्यावरणविद 'श्रवण कुमार' का कहना है कि इतने सालों में हम ये जान चुके हैं कि लोगों का यमुना माँ से जुड़ाव है और पूरा शहर इसका विकास चाहता है। आगरा के बड़े-बूढ़े, बच्चे सब चाहते हैं कि हमारे यहाँ भी विदेशों जैसी क्रूज़ शिप चले। इसके किनारे लोग पिकनिक मनाएं।

नदी के विकास को लेकर सरकार की तरफ से कई बार बजट पास हो चुके है। हमारे द्वारा इतनी कागज़ी कार्यवाही की गयी फिर भी कोई काम नहीं हुआ। सरकारें, प्रशासन, विभाग, पता नहीं किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं!

यमुना के इस सफर में जब हम आगे बढे तो देखा बेलनगंज और मोतीगंज के नालों का संगम भी यमुना को अपवित्र कर रहा है। पानी की मझधार के साथ बढ़े तो दिखाई दिया, उसी मैले कुचैले पानी में लोग कपडे धो रहे हैं। यह देख कर मन दुविधा में पड़ जाता है कि क्या साफ़ हो रहा है, और क्या गन्दा! इसी के साथ कालिंदी आगे बढ़ती जाती हैं, और तमाम बस्तियों-मुहल्लों से निकला मैला इसमें मिश्रित होता जाता है।

आखिरी में यमुना में गिरता है शहर का सबसे बड़ा नाला 'मंटोला नाला'। यह नाला आगरा के एक बहुत बड़े भाग को एक मकड़ी के जाल जैसा आपस में जोड़ते हुए जाता है सीधे ताजगंज। और गिरता है यमुना की तलहटी में।

रिवर कनेक्ट कैंपेन के सदस्य 'डॉ देवाशीष भट्टाचार्य' का कहना है कि सूचना के अधिकार के तहत विभाग की तरफ से जो जानकारी दी गयी है, उसमें शहर में केवल 8 नालों की टैपिंग हुई है बाकि के लगभग 80 नाले बगैर किसी ट्रीटमेंट के प्रत्यक्ष रूप से यमुना नदी में गिर रहे हैं। शहर में लगभग 6 -7 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) हैं, लेकिन कोई भी काम नहीं कर रहा है। ताजगंज की धांधूपुरा में एक बड़ा क्लीनिंग ट्रीटमेंट प्लांट है, लेकिन वहां भी काम होता है या नहीं इसका कोई प्रमाण नहीं है।

आगरा के प्रसिद्ध चमड़ा उद्योग का काम मुख्य रूप से मंटोला क्षेत्र में किया जाता है। नियम- कानून होने के बावजूद भी बड़ी मात्रा में कई प्रकार के रसायन और कतरन सब नदी में प्रवाहित होता है। और इस तरह शहर कि सारी गंदगी नालों से होती, यमुना में मिलती पहुँचती है मोहब्बत कि निशानी के पास। ताजमहल के पास। वर्तमान कि बात करें, तो अभी प्रवाह तेज होने के कारण ताज के साये में गंदगी उतना देर टिक नहीं रही है। आजकल ताज और मेहताब बाग़ के बीच में बहती कालिंदी किसी दिन अपने टापू दिखा देती है, तो किसी दिन एक सीधी रेखा में समतल नीली सी चादर। दूर से देखेंगे तो इससे आपको सिर्फ प्यार ही होगा।

पास में जाकर देखेंगे, तो महसूस होगी थोड़ी बदबू, ढेर सारी थैली ,अनगिनत बोरी, मटकते मटके और कुछ मरी हुई मछलियां! नदी से चिपके ताजमहल से सटा एक और घाट है, दशहरा घाट। जहाँ एक मंदिर बना हुआ है। आमतौर पर जहाँ पर्यटकों की भीड़ रहती थी और गाना-बजाना होता रहता था, वहाँ अभी गिनती के कुछ 10-12 लोग दिख रहे हैं। साथ ही प्रांतीय सशस्त्र बल (PAC) के कुछ जवान गश्त करते नज़र आ जाते हैं। जो पूरी शिद्दत के साथ लोगों को यमुना के मौजूदा विकट रूप से दूरी बनाए रखने के लिए टोकते रहते हैं। मौके पर कुछ लोग ऐसे भी दिखे जो बड़ी-बड़ी थैलियों में नारियल, मूर्तियां और घर की बेकार पूजन सामग्री को नदी में ठिकाने लगाते दिखे।

पर्यावरणविद 'ब्रिज खंडेलवाल' जोकि वर्षों से यमुना नदी के विकास के लिए प्रयत्नशील हैं व बारीकी से इसकी समस्यायों और समाधानों पर स्टडी करते आ रहे हैं। उनका कहना है कि यमुना की मुख्य परेशानी है गंदगी। गंदगी का समाधान हम अहमदाबाद की 'साबरमती नदी मॉडल' के तर्ज पर निकाल सकते हैं। जिसमें नदी से सटा कर नहर का निर्माण हो। जिसमें नदी की सारी गंदगी उसमें वैक्यूम कर ट्रान्सफर कर दी जाए। फिर शहर से बाहर निकलने पर कूड़े की नहर का दिशा परिवर्तन करके उसका ट्रीटमेंट कर उससे खाद या बायो गैस इत्यादि में परिवर्तित कर लिया जाये।

यमुना का उद्गम जिन पर्वतों से होता है, वहां कैल्सियम व कुछ अन्य तत्वों की मात्रा अधिक होती है जिस कारण नदी की तलहटी चट्टानी रूप ले लेती है। समय के साथ चट्टानों का आकर भी बढ़ता जाता है। जिससे नदी उथली होती जाती है और पानी रुकता नहीं है। वहीं अगर तलहटी में रेत होती तो वो पानी को ज़मीन के अंदर सोखती जाती और गहरायी को बरक़रार रखती। यही कारण है कि यमुना कि सफाई में एक अन्य प्रयत्न जिसकी ज़रुरत है वो है, डी-सिल्टिंग, यानि नदी कि तलहटी में जमी चट्टानी क्ले को खुदवा कर एक संतुलित गहरायी बना कर रखी जाये।

खंडेलवाल आगे बताते हैं कि दूसरी समस्या है, पानी को शहर की नदी में कैसे रोका जाए? इसके लिए सरकार से कड़ी जद्दोजहद के बाद ताजगंज क्षेत्र में नगला प्रेमा के पास 'रबर चेक डैम' के लिए एक ज़मीन निर्धारित की गयी। डैम बनने से शहर में यमुना नदी में पानी की मात्रा स्थिर रहेगी। हर जगह नदी में पानी दिखेगा तो शहरवासी ही क्यों, बल्कि दूसरी जगहों से भी लोग नज़ारे लेने आएंगे। डैम से सम्बंधित सभी औपचारिकताएं पूरी हो हो गयीं हैं। सवाल यहीं अटक जाता है कि अब काम क्यों नहीं हो रहा है!

इसके लिए सरकार को नदियों के संरक्षण के लिए एक नीति का गठन करना चाहिये। जिसका कार्य संचालन केन्द्र सरकार के हाथ में होना चाहिए।

अपनी प्राकृतिक धरोहरों को कैसे बचाना है और सहेजना है, इसका उदाहरण हमें मथुरा जैसे शहरों से लेना चाहिए। जहाँ संस्थाओं व सम्बंधित विभागों में बहुत अच्छा सामंजस्य है।

-- रिमझिम वर्मा/आगरा

(The author is a journalism student based in Agra and a guest contributor with TNA. Views Expressed Are Personal)

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