कांग्रेस के लिए भाई या बहन सबसे मुफ़ीद, माँ मौन, नेता बेचैन!

कांग्रेस के लिए भाई या बहन सबसे मुफ़ीद, माँ मौन, नेता बेचैन!

देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है। संशय का माहौल बना हुआ है। 2 वर्ष से अधिक समय से राहुल गाँधी के इस्तीफे के बाद नियमित अध्यक्ष नहीं चुना जा सका है। कामचलाऊ और औपचारिकता पूरी करने के लिए सोनिया गाँधी कार्यवाहक अध्यक्ष हैं।

2019 लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद राहुल गाँधी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और यह घोषणा की थी कि पार्टी का अगला अध्यक्ष नेहरू गाँधी परिवार से नहीं होगा। राहुल गाँधी ने नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर इस्तीफा दिया था और यह माना जा रहा था कि पार्टी के अन्य पदाधिकारी भी इस्तीफा देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सबसे चौंकाने वाली घटना लोकसभा चुनाव के दौरान सियासत में आयी प्रियंका वाड्रा के नेतृत्व में हुआ।

अमेठी जैसे पारिवारिक सीट से राहुल गाँधी चुनाव हार गए। प्रदेश में सोनिया गाँधी के कारण रायबरेली सीट बची और कहीं खाता नहीं खुल पाया। यह माना जा रहा था कि राहुल के इस्तीफा देने के बाद प्रियंका भी उत्तर प्रदेश के रिजल्ट को लेकर महासचिव पद से इस्तीफा देंगी लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। आज भी वह पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव पद पर हैं।

राहुल बेहद ईमानदार, प्रियंका में ऐसी ताकत व हिम्मत नहीं
राहुल एक बेहद ईमानदार और भाजपा के खिलाफ आक्रामक सियासत करने वाले देश के इकलौते नेता है। जबकि प्रियंका वाड्रा में ऐसी ताकत व हिम्मत नहीं है क्योकि वह एक भ्रष्टाचार के आरोपी पति की पत्नी है। अगर प्रियंका की सियासत राहुल की तर्ज पर आक्रामक हो जाये तो माना जा रहा है कि पति वाड्रा जेल के सलाखों के पीछे होंगे। इसलिए प्रियंका पति को बचाने के लिए ट्विटर सियासत कर रही हैं और महत्वाकांक्षा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की भी है।

राहुल नहीं चाहते कि परिवार का सदस्य अध्यक्ष बने जबकि प्रियंका अध्यक्ष पद छोड़ना नहीं चाहती और प्रियंका समर्थक चाटुकार नेताओं ने सोनिया को डरा दिया है कि अगर अध्यक्ष परिवार से बाहर का सदस्य बना दिया तो राहुल गाँधी का भविष्य खतरे में पड़ जायेगा। जो भी अध्यक्ष बनेगा उसकी अपनी एक लॉबी होगी और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरी करने की कोशिश करेगा। कहते है दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है।

सोनिया गाँधी पति राजीव गाँधी की हत्या के बाद नरसिंह राव सरकार में असहाय सी हो गयी थी क्योंकि अध्यक्ष का पद और प्रधानमंत्री दोनों की पद पर राव काबिज थे। सोनिया गाँधी सरकार और संगठन से इतनी अधिक आहत थी कि वह राजीव की विधवा के रूप में पहली बार अमेठी आयी और अपनी वेदना व्यक्त किया कि पति के हत्यारों पर सरकार प्रभावी कार्यवाही नहीं कर रही है। राजीव की हत्या और 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के पहले तक सोनिया गाँधी ने गाँधी परिवार से हट कर बने पार्टी अध्यक्ष से उपेक्षा देख चुकी है।

प्रियंका का दबाव सोनिया पर भारी है। सोनिया गाँधी मां के रूप चाहती है कि बेटा राहुल गाँधी पार्टी की कमान सम्भाले लेकिन राहुल तैयार नही है और राहुल के दवाब के कारण ही प्रियंका को अध्यक्ष बनाने की मुहिम कमजोर पड़ रही है। मां के रूप में सोनिया गाँधी अध्यक्ष पद पर राहुल को नहीं बैठा पा रही जबकि सोनिया यह चाहती है अध्यक्ष परिवार का हो और वह राहुल गाँधी ही हो। प्रियंका को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के पक्ष में सोनिया गाँधी नही है और न ही परिवार से हट कर किसी दूसरे को अध्यक्ष देखना चाहती है इसलिए बार बार अध्यक्ष पद का चुनाव टल रहा है।

सोनिया बेबस है। राहुल गाँधी अडिग है और प्रियंका की दबाव सियासत काम नहीं आ रही है। भाई बहन और मां की आपसी विवाद में और अनिर्णय की स्थिति के कारण कांग्रेस पार्टी के नेता परेशान दुखी और असमंजस की स्थिति में है। बेचैन हैं कि आखिर पार्टी कैसे मजबूत हो और मोदी का मुकाबला कैसे किया जाएगा ?

राज्य दर राज्य कांग्रेस कमजोर और समाप्त होती जा रही है। कार्यकर्ता में भी भगदड़ सी मची हुई है। सभी दुखी है और यह चाहते है कि राहुल गाँधी के नेतृत्व में मोदी से लड़ने के लिए कांग्रेस एकजुट होकर आक्रामक शैली अपनाये लेकिन यह कब होगा ? कैसे होगा ? कहना मुश्किल है क्क्योंकि जब तक भाई बहन के वर्चस्व की लड़ाई में विराम नही लगेगा तब तक कांग्रेस में सुधार आना संभव नहीं है।

(लेखक उत्तर प्रदेश के नामचीन राजनैतिक विश्लेषक हैं और पूर्व में सहारा समय उत्तर प्रदेश के स्टेट हेड रहे हैं, विचार उनके निजी हैं)

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