उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022: मोदी के बनाये सियासी चक्रव्यूह में उलझता विपक्ष

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022: मोदी के बनाये सियासी चक्रव्यूह में उलझता विपक्ष

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तैयार किये गए सियासी चक्रव्यूह में विपक्ष उलझता जा रहा है। चुनाव आते-आते जातीय और कल्याणकारी योजनाओं का चक्रव्यूह मतदाताओं को लेकर ऐसा बन जायेगा जिसे भेद पाना विपक्ष के लिए बहुत ही कठिन होगा।

यह माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ या प्रदेश अध्यक्ष स्वतन्त्र देव व प्रभारी नेता कोई भी हो चाहे जितनी रणनीति व मुद्दे बनाये लेकिन अंतिम समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा समय काल परिस्थिति को देखते हुए 50 वर्षों के राजनीतिक अनुभव के साथ बनाये गए मुद्दे ही अंतिम रूप से 2022 विधानसभा चुनाव में विपक्ष के सामने होंगे।

मोदी ने पिछले 4 महीने से एक ऐसा खुला प्लेटफॉर्म भाजपा को लेकर विपक्ष को दे दिया है। जिसे लेकर विपक्ष भाजपा के अंदरूनी मामले में उठा पटक देखकर बड़ा प्रसन्न हो रहा है। स्थितियाँ ऐसी नहीं है। एक बात शत प्रतिशत सही और कड़वा सच है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के इशारे पर ही 2022 में चुनावी रणनीति, टिकट बटवारा व मुद्दे सब सेट होंगे। जो लोग मोदी और योगी के बीच तनाव और विवाद देख रहे है ऐसा कुछ नहीं है।

देश की सियासत में भाजपा के अंदर किसी भी भाजपा सूबे के मुख्यमंत्री की इतनी हैसियत नहीं कि वह प्रधानमंत्री से टकरा सके। उनमें योगी आदित्यनाथ भी शामिल है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में चुनाव लड़ने के लिए भाजपा मोटे अनुमान के अनुसार 5 हज़ार करोड़ से कम खर्च नहीं करेगी। यह पैसा केवल मोदी और शाह की जोड़ी ही चुनावी फंड में एकत्र कर सकती है।

पिछले 6 महीने से योगी और मोदी तथा भाजपा में ब्राह्मण, अतिपिछडों की योगी से नाराजगी और सरकार की खामियों और कोरोना संकट में ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं के कारण हुई मौते, बेरोजगारी, महगाई तमाम ऐसे मुद्दों पर प्रधानमंत्री और उनकी टीम की बहुत पैनी नज़र है।

पिछले 3 महीनों से उत्तर प्रदेश की सियासत को जातीय एवं धार्मिक चक्रव्यूह जो मोदी बना रहे हैं उनकी रूपरेखा सामने दिखाई दे रही है। सरकार की खामियों को विपक्ष ज्यादा तूल न दे सके इसके लिए जातीय एवं धर्म का ही एजेण्डा चुनाव में सामने दिखाई दे रहा है। जिस पर भाजपा हर स्तर से प्रयास कर रही है।

पिछड़ों को मेडिकल सेवा में आरक्षण, पिछड़ी जातियों को जोड़ने और घटाने का अधिकार प्रदेश को देने। कल्याण सिंह के निधन के बाद उनके पिछड़े और राम भक्त के रूप में प्रचारित आदि करने का लाभ लेने का प्रयास शुरू है।

ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने के लिए काँग्रेस के ब्राह्मण कद्दावर नेता जितिन प्रसाद को शामिल किया गया और भाजपा के ब्राह्मण नेता चाहे वह राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र हो या केंद्र में नए मंत्री बनाये गए अजय मिश्रा के साथ सभी सांसद, विधायकों व संगठन के ब्राह्मण चेहरों को लगा दिया है।

इसी तरह मायावती को भी जातीय एवं धर्म तथा ज़मीनी हकीकत के तथ्यों के साथ 2022 में मैदान में आना चाहिए। ब्राह्मण सम्मलेन से सत्ता का ख्याव पूरा नहीं होगा। क्योकि 2007 जैसी स्थितियां नहीं है और मुकाबला मोदी और अमित शाह जैसे ताकतवर नेता के देखरेख में योगी आदित्यनाथ के सामने चुनाव लड़ना है। कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी को वजूद बचाने के लिए दिन रात उत्तर प्रदेश की सीमा में रहकर मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

दलितों में भाजपा की पैठ बनाने के लिए दलित राष्ट्रपति के रूप में प्रचारित किये जा रहे कानपुर के निवासी रामनाथ कोविंद लगातार उत्तर प्रदेश में दौरा कर रहे है। गोरखपुर में विश्वविद्यालय का शिलान्यास कर रहे है। लखनऊ सहित अन्य कार्यक्रमों में भाग ले रहे है।

पिछड़े ब्राह्मण दलित के समीकरण के साथ प्रधानमंत्री का सबसे बड़ा सियासी चक्रव्यूह गांव, गरीब, किसान, महिला एवं दलित आदि सभी के 15 करोड़ से अधिक आबादी को सीधे-2 किन्हीं न किन्हीं योजनाओं छात्रवृत्ति, पेंशन, किसान सम्मान निधि से सीधे खातों में धनराशि, निशुल्क खाद्यान्न, गैस कनेक्शन आदि पंहुचा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आम जनता सभी आज जानते है कि मतदाता बहुत स्वार्थी व व्यक्तिगत लाभ पाने में भरोसा रखता है।

इसलिए सीधे लाभ देकर मतदाताओं का ऐसा मजबूत कतार भाजपा के समर्थन में मोदी तैयार करने में जुटे है। आने वाले समय में मोदी के एजेंडे में सीधे लाभ लेने वाले गांव, गरीब, किसान, महिला, दलित, पिछड़े इनकी संख्या होगी। पिछड़ों में अतिपिछड़े को जोड़ने घटाने के उत्तर प्रदेश सरकार के जातीय आधार के आकड़ें होंगे। पूर्वांचल, बुंदेलखंड सहित तमाम एक्सप्रेसवे और जनपदों में बनाये गए मेडिकल कॉलेज की श्रृंखला और कोविड की तैयारी व वैक्सीन में प्रदेश की अग्रणी भूमिका, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, बनारस में विश्वनाथ कॉरिडोर ऐसे तमाम धार्मिक एजेण्डे होंगे जिनके सामने विपक्ष की तैयारी बहुत मजबूत होनी चाहिए लेकिन ऐसा लग नहीं रहा है।

क्योकि विपक्ष को मोदी और योगी की आंकड़ेबाजी तथा योजनाओं के मायाजाल एवं सरकार की असफलताओं का गांव से लेकर शहरों तक भौतिक सत्यापन तथ्यात्मक आकड़ों में साथ सामना करना चाहिए लेकिन विपक्ष ऐसा करता हुआ दिख नहीं रहा है। विपक्ष के सबसे बड़े नेता अखिलेश यादव लोकप्रिय एवं साफ़ सुथरी छवि के नेता है और 2022 के प्रबल दावेदार हैं। योगी सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी भी उनके पक्ष में है।

अखिलेश की सबसे बड़ी ताकत बंद मुट्ठी की तरह एक साथ खड़े हुए 18% मुस्लिम और 6% यादव हैं। इस 24% ताकत के साथ अखिलेश यादव मोदी के चक्रव्यूह को तोड़ने के सवर्णों में ब्राह्मण और दलितों में गैर चमार को विशेष महत्व देकर 2022 में टिकट बँटवारे में भी भागीदार बनाना चाहिये। 85 सुरक्षित सीटें बहुमत की सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी ताकत है और यह रिकॉर्ड रहा है जिसका सुरक्षित सीटों पर कब्ज़ा था बहुमत की सरकार उसी की ही बनी है। पिछड़ों के चक्रव्यूह तोड़ने के लिए अखिलेश को यादवों को भरोसे में लेकर पिछड़ों के आरक्षण में अति पिछड़ों के भागीदारी के बटवारा करने की तत्काल रूप से घोषणा करना चाहिए।

इन जातीय एवं धार्मिक समीकरण साधने के बाद मोदी और योगी के सरकार के घोषणाओं और योजनाओं का भौतिक सत्यापन एवं तथ्यात्मक आकड़ें भी सामने लाकर व्यापक प्रचार प्रसार करना चाहिए।

लेकिन लग यही रहा है कि जनता की नाराजगी मुस्लिम, यादव समीकरण पर अखिलेश और उनके समर्थक बहुमत पाने की उम्मीद लगाए बैठे है लेकिन अगर मोदी का चक्रव्यूह नहीं तोड़ पाए तो 2022 की सत्ता आसान नहीं होगी क्योकि अब सरकार 30 से 31% पर नहीं 39 से 41% समर्थन पर बनेगी और 39 से 41% समर्थन पाने के लिए अखिलेश यादव को 62% मतदाताओं को जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। इनमे 18% मुस्लिम, 6% यादव, 10% सवर्ण, 10% दलित और 18% पिछड़े लक्ष्य होना चाहिए। इन सबके अलावा भाजपा के माउथ पब्लिसिटी जवाब देने के लिए और फ्लोटिंग मतदाताओं को जोड़ने के लिए माउथ पब्लिसिटी का एक बहुत बड़ा नेटवर्क गांव से लेकर शहरों तक बनाना चाहिए।

इसी तरह मायावती को भी जातीय एवं धर्म तथा ज़मीनी हकीकत के तथ्यों के साथ 2022 में मैदान में आना चाहिए। ब्राह्मण सम्मलेन से सत्ता का ख्याव पूरा नहीं होगा। क्योकि 2007 जैसी स्थितियां नहीं है और मुकाबला मोदी और अमित शाह जैसे ताकतवर नेता के देखरेख में योगी आदित्यनाथ के सामने चुनाव लड़ना है। कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी को वजूद बचाने के लिए दिन रात उत्तर प्रदेश की सीमा में रहकर मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

छोटे दल शिवपाल सिंह यादव, ओम प्रकाश राजभर व अन्य जो भाजपा का विरोध कर रहे हैं उन्हें सत्ता पाने के लिए विपक्ष विशेषकर अखिलेश यादव के साथ जमीनी हकीकत एवं जाति धर्म के आकड़ों के अनुसार समझौता करके चुनाव मैदान में उतरना चाहिए या फिर अनुप्रिया पटेल की तरह भाजपा के साथ समझौता करके सत्ता में भागीदार बनना चाहिए।

जहाँ तक मुस्लिम सियासत की बात है ओवैसी या अयूब कोई भी धर्म के आधार पर केवल मुस्लिम सियासत करके भाजपा को कमजोर नहीं कर पाएंगे और न ही अखिलेश यादव के खिलाफ भी मुस्लिम मतदाताओं को ज्यादा तोड़ पाएंगे। कहने का तात्पर्य यही है कि 2022 में धर्म और जाति की सियासत की प्रमुखता और योजनाओं का मायाजाल तथा कल्याण कारी और विकास योजना के आँकड़े बाजी प्रमुख एजेंडे होंगे।

(लेखक उत्तर प्रदेश के नामचीन राजनैतिक विश्लेषक हैं और पूर्व में सहारा समय उत्तर प्रदेश के स्टेट हेड रहे हैं, विचार उनके निजी हैं)

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