अध्यक्ष बने, प्रमुख भी बन जायेंगे लेकिन पंचायतों में लूट कैसे रोकेंगे योगी ?

अध्यक्ष बने, प्रमुख भी बन जायेंगे लेकिन पंचायतों में लूट कैसे रोकेंगे योगी ?

तमाम आरोपों, प्रत्यारोपों, सत्ता की हनक एवं जोड़-तोड़ से जिला पंचायतों पर कब्ज़ा हो गया और इसी प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत 10 जुलाई को होने वाले ब्लॉक प्रमुख पदों पर भी भाजपा का कब्ज़ा हो जायेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला पंचायत, ब्लॉक और ग्राम पंचायतों की लूट को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कैसे रोकेंगे ?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं नौकरशाहो और सभी राजनेता भली भांति जानते है कि त्रिस्तरीय पंचायतें लूट का अड्डा बन गयी हैं। नई पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के ढाई दशक बाद पंचायतों में लूट का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। बसपा, सपा और वर्तमान भाजपा सरकार में लूट का क्रम निरंतर जारी है। योगी आदित्यनाथ की छवि बेहद ईमानदार होने के बाद भी त्रिस्तरीय पंचायतों में लूट रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे है।

मौजूदा समय में जो भी विकास की प्रक्रिया में धनराशि खर्च की जा रही है उसमे बहुत अव्यवहारिक नियम है जिसे पारदर्शी और आवश्यकतानुसार बदलाव करने की भी जरुरत है लेकिन इसके लिए सरकार को राजनीतिक लाभ की तिलांजली देनी होगी जोकि ईमानदार मुख्यमंत्री होने के बाद भी योगी हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे।

ग्रामीण विकास में विकास के नाम पर मिट्टी और गिट्टी व निर्माण कार्य में अनियमितताओं का एक जाल सा बिछा हुआ है। इस जाल को हटाने की हिम्मत मायावती, अखिलेश की तरह योगी आदित्यनाथ में भी नहीं दिखाई दे रही है।

योगी सरकार बने 4 वर्ष पूरे हो गए, पांचवा वर्ष चल रहा और 6 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। इन चार वर्षों में पंचायतों को लेकर भाजपा सरकार ने किसी प्रकार की सार्थक पहल नहीं की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा और प्रयास गांव गरीब किसान का सर्वागीण विकास करना था।

इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष की 67 सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा हुआ है। इन्हीं अध्यक्ष पदों के माध्यम से प्रतिवर्ष प्रत्येक जनपद में औसत 100 करोड़ से अधिक धनराशि खर्च की जाती है। पंचम वित्त आयोग के 20-21 में जिला पंचायतों को 13 हज़ार करोड़ से अधिक का बजट 3 किस्तों में दिए गए हैं। बड़े जिलों में तो जिला पंचायत 100 करोड़ से अधिक धनराशि खर्च करती है। जिला पंचायतों से खर्च होने वाली धनराशि केवल सत्ता पक्ष जिले के प्रभावशाली नेताओं और अध्यक्ष के विकास के चश्मे से ही खर्च होती है।

प्रायः यही देखा जा रहा है कि विकास का चश्मा लूट देखता है। अधिकाँश धनराशि गिट्टी मिट्टी व ऐसे अनुपयोगी तथा पुराने किये हुए कार्यों पर ही खर्च दिखा कर लूट की जाती है। किसी भी जिला पंचायत की योगी आदित्यनाथ निष्पक्ष ऑडिट, तकनीकी और सोशल ऑडिट दोनों करा ले तो वास्तविक स्थिति का पता चल जायेगा कि किस तरह से पुरानी बनी हुई सड़कों, पुलिया, भवन व तमाम कार्य हो जो पंचायत के अधीन आते हैं उनमे सुनियोजित तरीके से लूट की जाती है।

योगी सरकार बने 4 वर्ष पूरे हो गए, पांचवा वर्ष चल रहा और 6 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। इन चार वर्षों में पंचायतों को लेकर भाजपा सरकार ने किसी प्रकार की सार्थक पहल नहीं की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा और प्रयास गांव गरीब किसान का सर्वागीण विकास करना था।

निश्चित रूप से मोदी ने गांव के गरीब, दलित एवं पिछड़ों के लिए विशेषकर महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए तीन दर्जन से अधिक महत्वाकांक्षी कल्याणकारी योजनाएं चलायी और इसका लाभ भी मिला। दुर्भाग्यवश उत्तर प्रदेश सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायतों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा के अनुसार योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पारदर्शी, समयबद्धता एवं गुणवत्ता के साथ मॉनिटरिंग की व्यवस्था नहीं कर पायी। जिसका परिणाम त्रिस्तरीय पंचायतों में लूट होती रही।

पंचायतों में जिला पंचायत अध्यक्ष एवं ब्लॉक प्रमुख सत्ता के साथ हो जाते है। क्योकि इन लोगों ने इतनी लूट की होती है कि जांच से बचने के लिए सत्ता के साथ जाना मजबूरी हो जाते है। योगी आदित्यनाथ के लिए अध्यक्ष के बाद, ब्लॉक प्रमुख के पदों पर कब्ज़ा करना राजनीतिक रूप से जितना लाभदायी है उससे ज्यादा जरुरी है कि पंचायतों में हो रही लूट को रोके।

योगी सरकार ऐसा कर पाएगी इसमें सन्देह है। विभिन्न स्रोतों से त्रिस्तरीय पंचायतों को 1 लाख करोड़ से अधिक धनराशि प्रतिवर्ष मिलती है। यह माना जा रहा है कि अगर पंचायतों को मिलने वाली धनराशि का सदुपयोग हुआ होता तो गांव की दशा में बदलाव और विकास हो जाता। वर्तमान में जो हालात हैं उसे देखते हुए जिला पंचायत अध्यक्ष के साथ साथ ब्लॉक प्रमुख पद पर भी काबिज होने में योगी सरकार सफल हो जाएगी लेकिन लूट को रोक पाना योगी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है।

(लेखक उत्तर प्रदेश के नामचीन राजनैतिक विश्लेषक हैं और पूर्व में सहारा समय उत्तर प्रदेश के स्टेट हेड रहे हैं, विचार उनके निजी हैं)

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