UGC का नया इक्विटी रेगुलेशन बना सामाजिक टकराव का केंद्र: भेदभाव खत्म करने के नाम पर क्या नए अन्याय की नींव पड़ रही है?

UGC का नया इक्विटी रेगुलेशन बना सामाजिक टकराव का केंद्र: भेदभाव खत्म करने के नाम पर क्या नए अन्याय की नींव पड़ रही है?

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नई दिल्ली, Jan 27 (TNA) देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में एक नया सामाजिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा घोषित प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 के खिलाफ देशभर में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। खासकर उच्च जाति के छात्र इस नियम को भेदभावपूर्ण और एकतरफा बता रहे हैं।

इस विवाद की शुरुआत 15 जनवरी 2026 को हुई, जब UGC ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के “समानता और समावेशन” के उद्देश्य के तहत इस नए विनियमन की घोषणा की। इसका उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव से निपटने के लिए संस्थागत तंत्र को मजबूत करना बताया गया। हालांकि, इसके प्रावधानों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह विनियमन छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों और प्रशासन—सभी पर लागू होता है। इसमें भेदभाव की परिभाषा को व्यापक रखा गया है, जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के कृत्य शामिल हैं। लेकिन इसका विशेष फोकस केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और दिव्यांगों पर है। यही बात उच्च जाति के छात्रों को असहज कर रही है, क्योंकि नियमों में उन्हें जातिगत भेदभाव का संभावित शिकार मानने से ही इनकार किया गया है।

UGC का तर्क है कि शैक्षणिक संस्थानों में अब भी उच्च जातीय वर्चस्व मौजूद है। उसके अनुसार, संवैधानिक आरक्षण और दशकों की नीतियों के बावजूद वंचित वर्गों की भागीदारी 15 प्रतिशत से कम है। UGC द्वारा संसद और सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव के मामलों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

विरोध करने वाले छात्रों का कहना है कि यह नियम प्रक्रियात्मक संतुलन और निष्पक्षता को कमजोर करता है। इसमें त्वरित कार्रवाई और अनुपालन पर तो जोर है, लेकिन झूठी शिकायतों से निपटने के लिए ठोस दंडात्मक प्रावधान नहीं हैं। अपील की व्यवस्था तो है, लेकिन गलत आरोपों से प्रभावित निर्दोष छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई है।

इसके अलावा, जहां कानून लैंगिक रूप से तटस्थ होने की बात करता है, वहीं जाति के संदर्भ में यह तटस्थता पूरी तरह गायब है। यही अस्पष्टता और एकतरफापन आज देशभर में छात्रों, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के विरोध का कारण बन गया है।

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