तेजी से बढ़ता स्तन कैंसर: भारतीय महिलाओं की जीवनशैली बन रही है सबसे बड़ा जोखिम
नई दिल्ली, फ़रवरी 1(TNA) भारत में स्तन कैंसर के मामले हर साल करीब 6 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं। आईसीएमआर की हालिया रिपोर्ट इस ओर साफ इशारा करती है कि यह केवल उम्र या पारिवारिक इतिहास की बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि बदलती जीवनशैली और चयापचय (मेटाबॉलिक) असंतुलन इसके प्रमुख कारण बनते जा रहे हैं। खास तौर पर खराब नींद, लगातार तनाव और पेट के आसपास बढ़ती चर्बी (सेंट्रल ओबेसिटी) महिलाओं के लिए गंभीर खतरे के रूप में उभर रहे हैं।
धरमशिला नारायणा अस्पताल, दिल्ली के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी निदेशक डॉ. शुभम गर्ग के अनुसार, नींद में गड़बड़ी और स्तन कैंसर के बीच संबंध को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण लगातार मजबूत हो रहे हैं। नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ इंफॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च के नए निष्कर्षों ने भारतीय संदर्भ में भी यह पुष्टि की है कि सर्कैडियन रिदम के बिगड़ने से कैंसर का खतरा बढ़ता है। खराब नींद मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है, जिससे एस्ट्रोजन संतुलन, इम्यून सिस्टम और डीएनए रिपेयर प्रक्रिया कमजोर पड़ती है।
हालांकि, खराब नींद उम्र या आनुवंशिक कारणों जितना बड़ा जोखिम नहीं है, लेकिन यह एक ऐसा कारक है जिसे बदला जा सकता है। डॉक्टरों का अनुभव बताता है कि कई महिलाएं, जिनका कोई पारिवारिक इतिहास नहीं होता, लंबे समय तक नींद की कमी, नाइट शिफ्ट, अत्यधिक तनाव और निष्क्रिय जीवनशैली के चलते स्तन कैंसर की चपेट में आ रही हैं। यही कारण है कि अब क्लीनिकल रिस्क असेसमेंट में नींद और तनाव को भी गंभीरता से शामिल किया जा रहा है।
विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि सामान्य मोटापे की तुलना में सेंट्रल ओबेसिटी अधिक खतरनाक है, खासकर रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के बाद। पेट के आसपास जमा विसरल फैट ज्यादा सक्रिय होता है, जो सूजन पैदा करने वाले तत्व, इंसुलिन रेजिस्टेंस और एस्ट्रोजन उत्पादन को बढ़ाता है। मेनोपॉज के बाद शरीर में एस्ट्रोजन का मुख्य स्रोत यही फैट बन जाता है, जिससे हार्मोन-संवेदनशील स्तन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
स्पष्ट है कि स्तन कैंसर से बचाव केवल जांच तक सीमित नहीं रह सकता। बेहतर नींद, तनाव प्रबंधन, नियमित व्यायाम और कमर की माप पर ध्यान देना आज की भारतीय महिलाओं के लिए उतना ही जरूरी है जितना समय पर स्क्रीनिंग कराना। बदलती जीवनशैली के इस दौर में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।
