मोदी का कद योगी पर बहुत भारी

मोदी का कद योगी पर बहुत भारी

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जो लोग मोदी से तुलना करके उनसे विवाद और लड़ने की बात कह रहे है वह निश्चित रूप से वह योगी आदित्यनाथ के शुभचिंतक नहीं है। आज भी देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, कद और पद दोनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बहुत बड़ा है।

योगी आदित्यनाथ को किसी प्रकार का मोदी से विवाद पैदा करने की गलती नहीं करना चाहिए क्योकि 2014, 2017 और 2019 सभी चुनाव मोदी के चेहरे पर ही लड़े गए और अप्रत्याशित सफलता मिली। उत्तर प्रदेश में जिसके वह मुखिया है यह चुनाव भी नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा गया था। योगी आदित्यनाथ 2017 में मात्र एक सांसद थे और मोदी के आशीर्वाद से ही वह सीएम की कुर्सी पर बैठे है।

योगी आदित्यनाथ भाजपा के जननी आरएसएस से नहीं जुड़े हैं और न ही उनके चेहरे पर चुनाव लड़ा गया है। उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पद पर रहते हुए भी वह अपनी लोकसभा की सीट उपचुनाव में हार चुके है। जहां तक चुनाव हिंदुत्व चेहरे का है।

यह हिंदुत्व चेहरा भी सत्ता के साथ चढ़ता उतरता रहता है। लाल कृष्ण आडवाणी जिन्होंने वी पी सिंह के मण्डल कमीशन लगने के बाद पिछड़ों में जनाधार घटने और मंडल के विवाद पर लाभ लेने के लिए कमंडल उठाया। सोमनाथ से अयोध्या तक यात्रा की।

जिस यात्रा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके सारथी के रूप में रहे। आडवाणी जी जैसे बड़ा हिंदुत्व का चेहरा सत्ता के मुख्य धारा में न होने के कारण गायब हो गया। कल्याण सिंह जिनके मुख्यमंत्री रहते हुए आयोध्या में विवादित ढांचा, जिसे राम मंदिर मानते हैं तोड़ा गया और एक बहुत बड़े हिंदुत्व चेहरे के रूप में उभरे।

संघ और विश्व हिन्दू परिषद सहित सभी राष्ट्रवादी फ्रंटल संगठन कल्याण सिंह को नायक के रूप में देख रहे थे लेकिन कल्याण सिंह ने एक गलती की कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई को मुख्यमंत्री के रूप में रहते हुए चुनौती दी। हश्र सब के सामने है।

पिछड़े वर्ग के बहुत बड़े नेता के रूप में स्थापित हिंदुत्व का चेहरा लेकर कल्याण सिंह को भाजपा से अलग किया गया तो विधानसभा चुनाव की 1 सीट जीतने के लिए उन्हें धुर विरोधी मुलायम सिंह की शरण में जाना पड़ा। आज कल्याण सिंह का हिंदुत्व चेहरा कहाँ है ? मोदी ने राज्यपाल बनाकर सम्मान दिया लेकिन आज आडवाणी और कल्याण सिंह जैसा हिंदुत्व चेहरा कहाँ है। लोग भूल गए।

उमा भारती, विनय कटिहार, गोविंदाचार्य, संजय जोशी जैसे अनगिनत नाम है जिनकी हिंदुत्व के लम्बरदार के रूप में पहचान बनी थी, आज कहाँ खड़े है। इन सब नेताओं से एक तुलना में योगी आदित्यनाथ बड़े हैं कि वह गोरखपीठ के महंत है। गो रक्षा पीठ बहुत बड़ी हिंदुत्व के संरक्षक के रूप में रही है और आज भी मानी जाती है।

गोरखपीठ के महंत के रूप में अपनी तीखी भाषा से जो हिंदुत्व का चेहरा मिला है वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में ही अधिक मिला है। योगी को मोदी से तुलना करने वालों और प्रधानमंत्री के दावेदार बताने वाले से सावधान रहना चाहिए और ज़मीनी हक़ीक़त उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरण को समझना चाहिए। जिस जाति का वह प्रतिनिधि करते हैं उसके सर्वमान्य नेता वह आज भी नही है योंकि उनसे बड़े कद्दावर नेता राजनाथ सिंह है। मुख्यमंत्री के रूप में चंद अफसर की तैनाती और कुछ सजाती नेता को लाभ दे देना बहुत बड़े जातीय नेता के रूप में स्थापित नहीं करता।

आज भी ब्राह्मणों और राजपूत में बहुत गरीबी और बेरोजगारी है। चंद विधायक या बाहुबली नेता के द्वारा योगी ज़िंदाबाद और मोदी से तुलना करना उचित नहीं कहा जा सकता है। हिंदुत्व के चेहरे पर पिछड़ों के नेता कल्याण सिंह से सबक लेनी चाहिए। इस बात को मैं दोहराना चाहता हूँ। हिन्दुस्तान की जाति धर्म की ऐसी सियासत हो गयी है कि किसी भी कम पढ़े लिखे व्यक्ति को भी पद देकर उसके माध्यम से दूसरे धर्म को अपशब्द कहलाना शुरू कर दे।

ताकत के बल पर दबाना शुरू कर दें तो वही रातो रात हिंदुत्व का चेहरा हो जायेगा और पद देकर अल्पसंख्यक नेता को बहुसंख्यक पर अपशब्द कहने की छूट दे दी जाये तो नेता अल्पसंख्यक का बड़ा नेता हो जायेगा। ऐसे नेता जिनका अपनी सोच, आधार नहीं होता, पद के साथ आते है और गायब हो जाये है। यह सब ऐसे तमाम उदाहरण है जिसमें योगी आदित्यनाथ को गंभीरता से सोचना चाहिए कि क्या उनकी काबिलियत मोदी जैसे है? और जब भी कुर्सी से हटेंगे तो हिंदुत्व का ब्रांड जो मुख्यमंत्री के कुर्सी पर है वह भी नहीं रहेंगे। ब्रांड बनने के लिए मीडिया चाहिए, संसाधन चाहिए यह सभी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए उपलब्ध है।

दिल्ली दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से क्या बात हुई इसके तरह तरह के कयास है लेकिन इतना तो निश्चित है कि प्रधानमंत्री के शिष्य गृह मंत्री अमित शाह के सामने जिस सावधान मुद्रा में योगी आदित्यनाथ बैठे थे, अमित शाह हरे परिधान में सोफे पर अर्धलेटे बैठे है उससे अंदाजा लग गया है कि केंद्रीय नेतृत्व का क्या रूप है। प्रधानमंत्री का पद बहुत ताकतवर, बहुत सम्मानित और संवैधानिक दर्जा प्राप्त होता है और नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय नेता हो तो उसकी ताकत और कई गुना बढ़ जाती है।

वैसे एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक की माने और इतिहास को देखे तो उत्तर प्रदेश की कुर्सी पर बैठने वाले का ख़्वाब पीम कुर्सी की तरफ चला ही जाता है। लेकिन जिस जिस ने यह गलती की उसे खामियाजा भुगतना पड़ा।

इसलिए घटनाक्रम में योगी आदित्यनाथ को एहसास हो गया होगा कि उनका समर्थन कितना है लेकिन इसके बाद भी अगर चंद लोग योगी की मोदी से तुलना कर रहे हैं तो योगी के लिए दुर्भाग्य पूर्ण ही है। क्योंकि RSS किसी भी तरह से मोदी की तुलना में योगी को उसी तरह महत्व नहीं देगा जैसे अटल बिहारी के समय में कल्याण सिंह तो तवज्जो नहीं दिया था। आज भी मोदी का कद RSS की निगाह में जनता की निगाह में, पार्टी की निगाह में बहुत भारी है उसके चेहरे पर सरकार बनेगी। योगी के चेहरे पर गोरखपुर सीट तक भी जीतना भी मुश्किल है।

(लेखक उत्तर प्रदेश के नामचीन राजनैतिक विश्लेषक हैं और पूर्व में सहारा समय उत्तर प्रदेश के स्टेट हेड रहे हैं, विचार उनके निजी हैं)

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