गंगा किनारे, कानपुर में बाबा मिले और दिखाया अपना दर...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

गंगा किनारे, कानपुर में बाबा मिले और दिखाया अपना दर...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

फरवरी, 2003 का महीना था। मेरे तत्कालीन बॉस ने मुझे कानपुर में नया पद सम्भालने का न्यौता दिया। मैंने इस ऑफर पर अपनी पत्नी मे विचार करने के लिए कुछ समय मांगा। घर लौटते में छन्नी लाल चौराहे पर ही पहुंचा था कि लगा जैसे बाबा ने मेरे कान में धीमे से कुछ कहा घबराते कयों हो? मत भूलो आज बृहस्पतिवार है।

मैंने स्कूटर थामा । अपनी घड़ी देखी । बृहस्पतिवार ही तो था उस दिन । इतना जानना था कि मेरा इरादा बदल गया। घर जाने और पत्नी से राय मिलाने की बजाय मैं वापस ऑफिस पहुंचा। संपादक को संस्तुति देने के पश्चात् कानपुर में दायित्व संभालने के बारे में पत्नी को सूचित भर किया।

मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि कानपुर में स्थितियां मेरे लिए क़तई भी आसान न थीं, पेशागत लिहाज से तो कतई नहीं। तो भी मैं उस दौर को अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा समय कहूंगा। ऐसा इसलिए कि एक पेशेवर के रूप में उस समय में भले ही उतना व्यवस्थित नहीं रहा, लेकिन चाबा में मेरी आस्था आकाश छू गई।

पल-भर को तो मैं हकबका गया। बाबा ही तो नहीं थे कहीं वहां ? मुझे अनुभूति हुई कि बाबा वहीं कहीं आसपास थे। मेरे विचार का प्रवाह श्री सिंह के पुजारी से वार्तालाप को सुनकर ही टूटा। तभी मुझे यकीन हो सका कि ऐसा मुझे ख्यालों में महसूस हो रहा था। श्री सिंह चाह रहे थे कि उन्हें भी पुजारी वैसा हो करने को कहें जैसा कि मुझसे कहा था।

कानपुर पहुंचने पर वरिष्ठ सहयोगी चंद्रशेखर सिंह से मिला तो शुरुआती बातचीत में ही उनसे पूछ लिया था कि क्या कानपुर में साई मंदिर है ? आत्मनिरीक्षण करूं तो उस समय यह प्रश्न किया जाना मुझे आज भी सिरे से बेवजह और बेमानी लगता है। ज्यादा इसलिए कि लखनऊ में में कभी साई मंदिर नहीं गया था। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि लखनऊ में कोई मंदिर था भी, कि नहीं। और था तो कहां था !

श्री सिंह ने मेरे प्रश्न का जवाब 'हां' में दिया। उन्होंने बताया कि कानपुर के बाहर बिदर नामक स्थान में साई मंदिर होने के बारे में उन्होंने सुना था, लेकिन वह वहां कभी गए नहीं थे। गंगा किनारे बाबा के उस दयार को खोजने के लिए कार्यालय द्वारा दी गई टैक्सी से निकल पड़े। महानगर की धूल भरी और प्रदूषण से अटी सड़कों पर कोई घंटे भर के सफर के बाद पता चला कि हमें रावतपुर की तरफ जाना होगा।

अपने रास्ते के बारे में पक्के तौर पर जानकार हो लेने के लिए हम चलते - चलते फिर रुके । दो ग्रामीण गोलगप्पे खा रहे थे। हमने उनसे रास्ता पूछा । इन दोनों में एक बूढ़ा था चेहरे पर झुर्रियां घिर आई थीं और शरीर पर कमजोरी का साया आ पड़ा था। दूसरा ग्रामीण चालीस के आसपास रहा होगा । दोनों ने बिल्कुल दुनियावी अंदाज में कहा : हम भी उधर ही जा रहे हैं, आप हमें वहां छोड़ दें तो हम रास्ता बताएं।

मैंने उनकी तरफ ध्यान न देते हुए ड्राइवर की पीठ पर हल्का-सा होल जमा उसे आगे बढ़ निकलने का इशारा दिया। लेकिन तभी मन में आया कि इनको बिठूर तक साथ ले ही लिया जाए। आखिर, इसमें हर्ज ही क्या था ! रास्ते भर चुप्पी साधे रहे ग्रामीण को ज्यों ही पता चला कि मैं पत्रकार हूँ, तो उसने तत्काल बातों का सिलसिला जमा लिया। अनुनय-विनती करने लग पड़ा कि उसकी समस्याओं के बारे में जिलाधिकारी से बात करूं ।

बिठूर आ गया था और वह अपनी समस्याओं का पुलिंदा मुझे थमा कर निश्चित-सा अपनी राह चलने को हुआ। मैंने रास्ता बताने के लिए उसका शुक्रिया किया। साथ ही, उसे उम्मीद बंधाई कि उसकी समस्या के समाधान के लिए यथासंभव कोशिश करूंगा। मैं कार से उतर आया। वहां नीरवता पसरी हुई थी, जो बीच-बीच में मंदिर की घंटियों से ही टूटती । आगे बढ़ा तो पाया कि बाबा की प्रतिमा आशीर्वाद की मुद्रा में विराजी है ।

सफर की थकान व पत्नी को लखनऊ अकेले छोड़ आने की चिंता से चूर शरीर अचानक स्फूर्तिमय हो गया। लगा कि इस मूर्ति से तो एक बहुत पुराना रिश्ता है। मन किया और मैं वहीं फर्श पर बैठ गया। और बाबा की प्रतिमा को एकटक निहारने लगा। मंदिर के हृदय स्थल में माहौल पुरसुकून था।

पुजारी को लगा कि बाबा का मैं ऐसा भक्त हूं, जिस पर कहे का असर पड़ा ही हो । उसने मुझे आगे बढ़ने के लिए इंगित किया ताकि मेरे पीछे खड़े भक्त (श्री सिंह) को प्रतिमा के सम्मुख आने का अवसर मिल सके। मैं आगे तो बढ़ा लेकिन इसके लिए पुजारी को मुझे फिर से कहना पड़ा। पुजारी ने मुझसे साथ लाया नारियल मांगा। मुझे पुजारी पहली नजर में द्वेषी और नियमों की अवहेलना करने वाला लगा मैं ठहरा एक पत्रकार, सो, हर चीज को शक की नजर से देखना आदत में शुमार था।

मुझे लगा था कि वह नारियल को एक तरफ रख लेगा लेकिन नहीं, उसने ऐसा नहीं किया। कुछ क्षण बाद ही में जान गया कि वह नियमों की अनदेखी करने वाला रूखा व्यक्ति नहीं था और उसने नारियल बाबा के चरणों में चढ़ाने के बाद वापस लौटा दिया, यह कहते हुए सीढ़ियों पर बैठे बूढ़े बाबा को यह नारियल दे दूँ, जो शिर्डी जाने वाले थे।

पल-भर को तो मैं हकबका गया। बाबा ही तो नहीं थे कहीं वहां ? मुझे अनुभूति हुई कि बाबा वहीं कहीं आसपास थे। मेरे विचार का प्रवाह श्री सिंह के पुजारी से वार्तालाप को सुनकर ही टूटा। तभी मुझे यकीन हो सका कि ऐसा मुझे ख्यालों में महसूस हो रहा था। श्री सिंह चाह रहे थे कि उन्हें भी पुजारी वैसा हो करने को कहें जैसा कि मुझसे कहा था।

लेकिन पुजारी ने ऐसा नहीं कहा। मैं सीढ़ियों पर गया और अस्सी पार के उन कृशकाय बाबाजी के चरणों में नारियल अर्पित कर दिया। उनके चेहरे पर धवल दाढ़ी लहरा रही थी। आज जब में विस्मित कर देने वाली उस शाम के बारे में लिखने बैठा हूँ, तो तय नहीं कर पा रहा हूँ कि क्या वह बाबा ही थे, जो अपनी लीला से अपने इस बालक को अपनी और आने वाली राह पर उंगली पकड़ चन्द पहले कदम चला रहे थे। ऐसी राह जो बाबा ने ज्ञान, शुद्धता और आध्यात्मिकता के अपने उच्च आसन से दिखाई।

-- क्रमशः कल

(मोहित दुबे की पुस्तक 'साईं' से साभार)

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