और बाबा घर आये...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

और बाबा घर आये...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

उनकी दिव्यता को महसूस करूं। मेरे मित्र को कुछ देर और सो लेने के लिए लौटने की जल्दी थी, लेकिन में था कि मैं बाबा के करिश्मे की ऊंचाइयों में विचरण कर रहा था, और उनकी महिमा के गहरे सागर में गोते लगा रहा था। मेरे मन में दुविधा थी कि वहीं बैठा रहूं या अपने उस मित्र की सुनूं जो वापस लौट कर कुछ देर झपकी ले लेने को कह रहा था। इस ऊहापोह के मध्य ही मेरी नजर मंदिर के चारों ओर उमड़े भक्तजन के समूह पर जा पड़ी।

इनमें सभी थे - गरीब, धनवान, छोटे, बड़े, जवान, बूढ़े ...। अचानक यह जानने की जिज्ञासा जाग चुकी थी - कितनी विशाल संख्या थी, इन गरीब और अमीर भक्तों की, जो बाबा के दर पर आ जुड़े थे। समाज के विभिन्न वर्गों में बाबा के लिए इस कदर श्रद्धा के क्या कारण हैं ? अमीर - गरीब, सभी के वह इतने प्रिय कैसे हैं ? मेरे मन में ऐसे कई सवाल कौंध रहे थे। बाबा के दर्शन करके लौटते श्रद्धालुओं के रेले को देख कर मेरे मन-मस्तिष्क में और भी जिज्ञासाओं व सवालों का सैलाब उमड़ आया था।

जैसा कि कहा जाता है - दिव्यता स्वयं अपने दर्शन करा देती है - अपने मन की दुविधा को मिटाने में मैंने अपने समूचे विवेक का उपयोग किया। मन- मस्तिष्क जैसे एकाएक आलोकित हो गए । लगा कि चाहे कुछ भी हो लेकिन सहजीवी संबंध का यह एक संपूर्ण सम्मिलन है । एक उत्कृष्ट व अनूठा मेल है, जिसमें दोनों ही परस्पर अवलंबित हैं। निर्धन को भीख व भोजन की दरकार है, जबकि धनी को आशीर्वाद व उद्धार की आकांक्षा है ।

अभी मन में यह सब उमड़-घुमड़ ही रहा था कि कोई अदृश्य शक्ति मुझे मंदिर के बाई ओर स्थित दुकानों की तरफ बलात् ले गई । वहां छोटी गुमटीनुमा दुकानों की एक पूरी कतार ही थी। फूलों, अगरबत्तियों, चित्र और अन्य पूजा सामग्री की इनमें बिक्री हो रही थी। यह अदृश्य शक्ति मुझ पर पूरी तरह हावी होती जा रही थी और मुझे दुकानों की कतार में आखिरी दुकान तलक ले गई। यह उजाड़-सी दुकान थी, जहां प्रतिमाएं व अन्य धार्मिक वस्तुएं बिक रही थीं। परंतु ग्राहक के नाम पर कोई नहीं था, सिवाय एक वृद्ध महिला के।

मैंने वहां रखी वस्तुओं पर सरसरी नजर डाली। ऊपर कोने पर एक प्रतिमा दिखाई दी। मैंने दुकानदार से वह प्रतिमा दिखाने को कहा। दुकानदार था कि मेरी तरफ ध्यान ही नहीं दे रहा था। शायद उसे लगा हो कि उस प्रतिमा को खरीद भी पाऊंगा कि नहीं ।

सो, मुझे नजरअंदाज करते हुए वह दुकान पर खड़ी महिला से बतियाता रहा । जब पैन उससे उस प्रतिमा के बारे में फिर पूछा तो उसने पिंड छुड़ाने के अंदाज में कहा, अरे भाई, बहुत महंगी है। सात सौ बीस रुपए की। उसका व्यवहार मुझे बहुत अखरा । इतना कि बटुए को टटोले बिना ही मैंने उससे इस प्रतिमा पर से धूल झाड़कर इसे पैक करने को कहा। मैं एक सांस में यह कह तो गया लेकिन तभी मुझे ख्याल आया कि शायद मेरी जेब में इतने पैसे न हों। अपने मित्र - जो सदा का कड़का था - से तो कुछ पैसा मिलने की उम्मीद थी ही नहीं।

तो भी मैंने दुकानदार को यह भनक नहीं लगने दी कि मेरे भीतर क्या द्वन्द चल रहा था। वैसे भी, वह इस सबसे अनजान इस प्रतिमा की साफ पोंछ करने में लगा था। उसका ध्यान मेरी तरफ था भी नहीं। मैं फैज को एक तरफ ले गया और अपना बटुआ देखा और पाया कि उसमें तो सिर्फ 419 रुपए ही थे। यह तो दुकानदार के बताए मूल्य से काफी कम थे। मैंने सोचा कि दुकानदार से प्रतिमा को पैक करने को कह देता हूं। फिर, यूपी भवन जाकर कमरे से पैसा ले आऊंगा।

यह सब सोच ही रहा था कि मेरा मित्र पूछ बैठा, परेशान क्यों हो ? मैंने जवाब दिया, पैसे कम पड़ गए हैं। हमारा वार्तालाप चल ही रहा था कि महसूस हुआ जैसे बाबा मेरे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं।

मुझे ही नहीं खुद फैज को भी अचंभा था कि उनकी जेव में 301 रुपए कैसे निकल आए उन्होंने मुझे बताया कि इत्तफाक से ये पैसे पेंट की जेब में पड़े रह गए थे । उन्होंने पेंट बदली नहीं थी और नई पेंट पहन नहीं पाए, थे। निश्चय ही बाबा की अनुकंपा से ही में वह प्रतिमा खरीद सका।

आज वह प्रतिमा मेरे घर में विराजी हुई है, और इस सत्य का ज्वलंत उदाहरण है कि बाबा अपने उन भक्तों की किस प्रकार से सहायता करते हैं, जिनकी किसी इच्छा के पीछे सच्ची भावना होती है। एक हिंदू और एक मुसलमान के इकट्ठे पैसों से खरीदी गई इस प्रतिमा से एक और संदेश भी मिलता है। उस तरफ हमने बाद में गौर किया। लगा कि जैसे बाबा ने हमें विश्व-बंधुत्व का संदेश दिया है। उनकी शिक्षाओं और संदेशों का अमिट सत्य भी यही है - सबका मालिक एक।

बाबा मेरे जीवन और घर में प्रवेश कर चुके थे और आज जब उस समूचे घटनाक्रम पर दृष्टिपात करता हूं, तो लगता है कि बाबा से जुड़ी विभिन्न चीजों और उनकी पूजा करने के लिए उपयोग में आने वाली छतर, मंदिर, चरण, परिधान आदि वस्तुओं को एकत्रित करने का समय आ गया था । मैं इन सभी चीजों की तलाश में जुट गया। जहां से भी ला सकता था, मैने ये तमाम वस्तुएं जुटा लीं | छतर और परिधान लोदी रोड की दुकानों से ही लाया जबकि चरण छतरपुर स्थित साई मंदिर से खरीदा।

क्रमश: कल...

(मोहित दुबे की पुस्तक साईं से साभार)

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