साईं ने दिया बाबू रणजीत सिंह में एक भाई...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

साईं ने दिया बाबू रणजीत सिंह में एक भाई...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

कानपुर आने के समय से ही मैं अच्छी तरह जानता था कि इस शहर में में ज्यादा दिन नहीं रहूंगा। इस कारण और बिठूर में बाबा के पास ज्यादा से ज्यादा समय गुजारने के लिए मैंने मंदिर के गुरुजी से मंदिर के आसपास ही कोई जगह तलाश देने को कहा। मैं तो उनसे कहकर भूल भी गया मै था कि एक दिन उनका संदेश मिला - संपर्क करें।

मिलने पर उन्होंने पूछा कि क्या मैं बाबूजी यानी सरदार रणजीत सिंह जी को जानता था, जो बाबा को बिठूर लाए थे। उनका प्रश्न सुनकर मैं अचरज में पड़ गया। मैंने अनभिज्ञता जताई। अब उनके अचंभित होने की बारी थी उन्हें विश्वास नहीं हो पा रहा था कि बाबूजी ने ही उन्हें फोन करके मेरे बारे में पूछा था उन्होंने गुरुजी को मुझसे जमीन के लिए इधर-उधर न भटकने के लिए कहा था।

बाबूजी ने कहलाया था कि बाबा के पास ही मुझे अच्छे मौके वाला अच्छा भूखंड आवंटित हो चुका था। परेशान होना ठीक नहीं। मैं 14 दिसंबर, 2003 को बाबूजी को मुंबई में मिला । पहली ही बैठक में उन्होंने मुझसे परेशान नहीं होने को कहा और आश्वासन दिया कि मुझे मंदिर परिसर में ही जमीन का टुकड़ा जाएगा।

जब मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास यह भूखंड खरीदने लायक पैसा नहीं था, तो उन्होंने चिंता नहीं करने को कहा। बाबूजी ने कहा कि यह तो बाबा की ही इच्छा थी और उन्होंने ही यह जमीन मेरे नाम कर दी थी। यह था मेरे बाबा का अपने भक्त की चिंता करने का रूप। हालांकि मुझे बाद में सूचित किया गया कि यह भूखंड कानूनी पेचीदगियों में फंस गया था। बाबा की अनुकंपा और बाबुज़ी के प्रयासों से अब इस भूखंड पर कोई विवाद नहीं रहा। उम्मीद है कि जल्द ही मुझे मेरे साई के निकट आशियाना मिल जाएगा। इसी यात्रा के दौरान बाबूजी पर बाबा की विशेष अनुकंपा का भी एहसास हुआ।

कुछ ही दिन बाद एक सपना आया। देखा बाबा कह रहे हैं कि मुंबई स्थित सिद्धि विनायक मंदिर परिसर में अन्दर एक दुकान है, जहां पर दत्तात्रेय भगवान की एक प्रतिमा है। बाबा ने आगे आज्ञा दी कि मैं उस मूर्ति को बाबूजी के हाथों ही ग्रहण करूं । इस स्वप्न को एक स्वप्न ही मान मैं इसे भूल गया। यहां गलती हुई। क्योंकि शायद यह बाबा का बुना कोई नया ताना- बाना था न कि कोई स्वप्न।

जब यह स्वप्न हावी हो गया तो सकुचाते हुए बाबूजी के मोबाइल फोन ए फोन किया, उठाया उनकी पत्नी ने। बाबूजी के बारे में पूछने पर पता चला कि हृदयाघात के कारण वो अस्पताल में भर्ती थे। सुनकर घक्का लगा। चिंता हुई पर फिर भाभी को कई बार आए सपने को बताया। एक छोटी-सी चुप्पी के बाद उन्होंने कहा, मैं इस सपने का यथार्थ समझ गई हूं। हम जल्द ही आपको फोन करेंगे। यह कह हमारा संवाद समाप्त हुआ।

यह हुआ भी और बाबा ने अपने स्नेहपूर्ण तरीके से अपने गुरु की प्रतिमा मेरे पूजा घर में स्थापित की। और वह भी एक सद्पुरुष के हाथों ।

कुछ समय बाद उनका फोन आया जिसमें उन्होंने सूचित किया कि वह उस मूर्ति को जल्द ही खरीद कर भिजवा देगी। यह हुआ भी और बाबा ने अपने स्नेहपूर्ण तरीके से अपने गुरु की प्रतिमा मेरे पूजा घर में स्थापित की। और वह भी एक सद्पुरुष के हाथों । इधर, बाबूजी से मेरा स्नेह बढ़ता गया और उनका आशीष भी मुझे बहुतायत में मिलने लगा।

दो साल बाद बातों-बातों में पता चला कि हम दोनों का जन्मदिन भी एक ही था - सात अप्रैल। अलबत्ता, फर्क था तो ठीक बीस साल का वो जन्में थे 1953 में और मैं 1973 में। आने वाले समय में बाबा ने हम दोनों को एक अनूठे बंधन में बांध दिया। गाहे-बगाहे मेरे कष्ट में वो मुझे बिना जाने स्वतः फोन कर हाल चाल पूछते और समस्या बताए जाने पर ढाढ़स बंधाते और मार्गदर्शन करते ।

अब वो दुनियाँ में नहीं रहे पर जब भी बिठूर जाता हूँ तो साईं दरबार के कोने में बने उनके कक्ष में ज़रूर जाता हूँ व उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन यादों को फिर से टटोलता हूँ जो पल उनके साथ बिताए थे!

(मोहित दुबे की पुस्तक साईं से साभार)

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