दीक्षा की बारी, अबकी पत्नी की: एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची घटनाएँ

दीक्षा की बारी, अबकी पत्नी की: एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची घटनाएँ

यदि जीवन में आए अनेक मोड़ों पर हुए चमत्कारों का उल्लेख करने लगूं तो लगता है कि इन्हें किसी महाकाव्य में भी नहीं समेटा जा सकेगा। यहां में उन विशेष क्षणों का ही उल्लेख कर रहा हूं, जिन पर साई की अमिट छाप है। ऐसी ही एक घटना 27 फरवरी, 2003 को घटी। मेरी पत्नी का ऑपरेशन हुआ था। उन्हें डिंब ग्रंथि में रसौली हो जाने से हम सब चिंता में पड़ गए।

सागरिका (चित्र संलग्न) एक सामान्य लेकिन भयातुर कर देने वाली व्याधि एंडोमिट्रोसिस से ग्रस्त थीं। यह एक ऐसी अवस्था है, जब माहवारी के समय खून लगातार बहकर डिंब तथा डिंबनलिकाओं (फेलोपियन ट्यूव्स) में थक्कों के रूप में आ जमता है। इन थक्कों को चॉकलेट सिस्ट्स कहा जाता है। यही कारण रहा जो विवाह के तीन वर्ष पश्चात् भी वह मां नहीं बन सकीं।

सागरिका जब तक बाबा से मेरे प्यार की दर्शक मात्र रही थीं और कभी-कभार ही सक्रियता से बाबा की पूजा-अर्चना में मेरा साथ देतीं। बस इत्ता ही। इससे ज्यादा कुछ नहीं। लेकिन जब हमने सर्जरी कराने का फैसला किया तो हालात बदले। इस समूचे घटनाक्रम के दौरान जैसे परदे के पीछे तेजी से बदलाव आ रहे थे। ये बदलाव पेशागत भी थे। मैं 19 दिसंबर को शिरडी से लौटा तो पाया कि मेरा स्थानांतरण जमशेदपुर कर दिया गया था। मेरे पास पद छोड़ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। में ज्यादा से ज्यादा समय घर पर ही बिताने लगा।

सागरिका एक रोज डॉक्टर, जिन्हें ऑपरेशन करना था, के क्लीनिक पर मुझे साथ ले चलने के लिए जिद करने लगीं। बीते कुछ समय से कार्यालय संबधी व्यस्तताओं के नलते मैं डॉक्टर से मिल नहीं सका था इसलिए मैं सागरिका के साथ चलना भी चाहता था। फिर, यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहता था कि वह डॉक्टर ऑपरेशन करने के लिए सक्षम भी थी या नहीं। जैसे ही क्लीनिक में प्रवेश किया तो देखा कि रोगियों के प्रतीक्षालय में बाबा का एक विशाल चित्र लगा था।

फैसला हो चुका था, मेरे नहीं बल्कि बाबा द्वारा । सर्जरी की तारीख तय हो गई । नियत दिन मैं थोड़ा चितित और बेकल था। अपने विवाहित जीवन के इस थोड़े से समय में हम काफी संकटपूर्ण समय झेल चुके थे और अब मैं कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था। कम-से-कम अपने प्रेममय जीवन पर कतई कोई संकट नहीं आने देना चाहता था।

लेकिन इससे तो ऑपरेशन नहीं टलना था। मै बेचैन और अधीर था लेकिन मेरी पत्नी धैर्य बनाए हुए थी बल्कि कहूं कि प्रसन्नचित थीं। इसलिए कि. उन्हें विश्वास था कि ऑपरेशन के बाद वह मां बन जाएंगी।

जैसे ही उन्हें व्हीलचेयर पर ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जाने लगा वैसे ही मैंने शिरडी में प्रमोद मोदी द्वारा दिए गए बाबा के सिर का साफा उन्हें दिया और ढाढस बंधाया कि सब ठीक ही होगा। यही ढाढस ही तो मैं था, जो में खुद को दे सकता था। पल-पल भारी इस समय में ओटी के बाहर कोरिडोर में अपने माता-पिता, जो इस सर्जरी के समय हमारे साथ आ गए थे, को उन तमाम घटनाओं के बारे में बताता रहा जो बाबा के प्रताप से हमारे जीवन में घटी और हमारा जीवन-पथ आलोकित कर गई।

थोड़ा स्वस्थ होने पर सागरिका ने विस्तार से बताया कि कैसे ऑपरेशन शुरू होने के समय बाबा ओटी में आए थे। उन्होंने सफेद कपड़े पहन रखे थे। थोड़ा थके हुए लग रहे थे। एक स्टूल खींच कर किस प्रकार सिरहाने की तरफ बैठ गए। उसके बाद वह सागरिका के पैरों को दबाने लगे।

मेरी बातों का सिलसिला अभी चल ही रहा था, कि तभी एक नर्स श्री दुबे, जो मैं ही था, को पूछती हुई ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकली। मैं घबरा गया (क्योंकि अनेक हिंदी फिल्मों में मैने सर्जरी के बीच इस तरह ओटी से बाहर आकर बुरी खबर सुनाते डॉक्टरों या नों को देखा था) । मैं एकदम से भीतर दौड़ पड़ा और नर्स से पूछा कि तबीयत तो ठीक है ? उन्होंने धीमें से बताया कि डाक्टर ने बुलवाया था। मैंने कोरिडोर की ओर देखा ताकि पारिवारिक मित्र व डॉक्टर मदालसा पांडे (हमारी एक डाक्टर आंटी) दिखलाई पड़ी। वह शीशे के उस पार थी।

भगवान का शुक्र है ! मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, उन्हें मुस्कराते देख कर। उन्होंने मुझे सूचित किया कि सर्जरी सफल रही। रसौली निकाल दी गई थी। उनसे मिली जानकारी से इस पुस्तक की महत्ता और सार्थकता सिद्ध हो जाती है। सुश्री पांडे ने बताया कि ऑपरेशन के पूरे समय ( करीब ढाई घंटे) अचेतावस्था में सागरिका बाबा से बतियाती रहीं। इतना ही नहीं टांके लगाए जाते समय (उन्हें पेट पर पच्चीस टांके लगाए गए) उन्होंने तीन भजन भी गाए।

थोड़ी देर बाद बेजान-सी निढाल सागरिका को स्ट्रेचर पर ऑपरेशन थिएटर से बाहर लाया गया। स्ट्रेचर के एक तरफ ड्रिप लगी थी। काफी खून बहने से वह पीली पड़ गई थीं और बेहोशी की हालत में थीं। इसी बेहोशी में उन्होंने मुझे पुकारा । उसकी पीड़ा और हालत को देखकर मैं व्यथित था। पहले तो मैं उसकी कमजोर हालत देख कर उसे पकड़ने में झिझका । फिर, आगे बढ़ा और उसे सहारा दिया।

उस हालत में भी वह कह रही थीं, टन्टू (इसी नाम से वह प्यार से मुझे बुलाती हैं ) मालूम है, आज बाबा आए थे। पूरी शल्य चिकित्सा मेरे साथ बैठे और ये भी कहा कि मैं शिरडी से चलकर आया हूं तुम्हारे लिए। थक गया हूँ, एक अच्छा-सा भजन सुनाओ।

अभी तक मैं ऐसे अनेकों किस्से सुन चुका था कि लोग बाबा के दर्शन होने पर भावुक हो उठे। लेकिन मुझे ऐसा कोई अनुभव अभी तक नहीं हुआ था। आज जब हुआ तो भावुकता में बोल भी नहीं पा रहा था। बाबा के प्रति कृतज्ञता आंसुओं के रूप में मेरे चेहरे पर बह निकली। मेरे मन में खुशी का कोई पारावार न था। इसके बाद से बाबा हमारे परिवार का हिस्सा बन गए। सागरिका के लिए भी उतने ही श्रद्धेय, जितने मेरे लिए।

थोड़ा स्वस्थ होने पर सागरिका ने विस्तार से बताया कि कैसे ऑपरेशन शुरू होने के समय बाबा ओटी में आए थे। उन्होंने सफेद कपड़े पहन रखे थे। थोड़ा थके हुए लग रहे थे। एक स्टूल खींच कर किस प्रकार सिरहाने की तरफ बैठ गए। उसके बाद वह सागरिका के पैरों को दबाने लगे। जब सागरिका ने उनसे पूछा और प्रतिरोध किया कि वह तो आयु में बड़े हैं, तो पैर क्यों दवा रहे. थे। बाबा ने उत्तर दिया, क्योंकि तुम समझती हो कि मैं मोहित से ही प्यार करता हूँ, तुमसे नहीं।

उसके बाद सागरिका ने बताया कि किस प्रकार बाबा ने उसके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली। अस्पताल में रहने के दौरान फिर आने का किस प्रकार से वादा किया। फिर, सागरिका ने जैसा बताया, बाबा ने वापस लौटने की बात कही। यह कहते हुए कि शिरडी में भक्तगण की भारी भीड़ जमा हो गई थी। कुछ लोगों के लिए यह हमारी मतिभ्रम की स्थिति हो सकती है, तो कुछ इसे मात्र संयोग कह सकते हैं। लेकिन मेरे, अब हमारे, लिए तो यह पूरी तरह बाबा की भव्यता और उदारता थी।

ऑपरेशन करने वाली डा. गीता द्विवेदी तक ने इस बात की पुष्टि की कि ऑपरेशन थिएटर में बिल्कुल जुदा और खास तरह का वातावरण था। उन्होंने यह भी बताया कि चॉकलेट सिस्ट्स में आमतौर पर लिसलिसापन होता है लेकिन यह सिस्ट् सूख कर गांठनुमा बन गई थी। कौन जानता है कि डाक्टरों के भी डाक्टर - साईनाथ - ने यह चमत्कार किया था ! जब हम घर लोटे तो अस्पताल में तीन परिचारक (अटेंडेंट्स) और नर्से थीं। एक सफाईकर्मी भी था। सभी के सब बाबा भक्त बन गए थे। उन्होंने हमसे बाबा की कुछ प्रतिमाएं उपहार में देने का आग्रह किया - उनकी श्रद्धा में पूरा आवेग और प्रवाह था।

(मोहित दुबे की पुस्तक साईं से साभार)

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