लोबान, पटाखे... बाबा ने दी मांगों की फेहरिस्त...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

लोबान, पटाखे... बाबा ने दी मांगों की फेहरिस्त...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

'बाबा की अनुकंपा मुझ पर बढ़ती रही और समय-समय पर वो आदेश, आग्रह व जबरदस्ती करते रहते और कई चीजों की अपेक्षा करते रहते। मेरे और पत्नी के बीच हमेशा यह बहस छिड़ी रहती कि क्या बाबा को किसी भेंट की दरकार रहती है या नहीं। अभी हाल तक वह मानने को तैयार नहीं थी कि बाबा अपने भक्त कुछ नहीं चाहते। परंतु एक घटना ने उनकी सोच को ही बदल डाला। ठंड पड़ने लगी थी । पत्नी कानपुर आई हुई थीं।

अक्टूबर माह के आखिरी दिन हमने बिठूर जाने का कार्यक्रम बना लिया। बृहस्पतिवार की सुबह धूप खिलने से मौसम काफी खुशगवार हो गया। लेकिन मंदिर के लिए निकलने के समय सागरिका ने अपनी तबीयत ठीक नहीं होने के बारे में बताया। सो, मैं अकेले ही साई मंदिर जाने को तैयार हो गया।

बाहर खड़ी कार में बैठने के लिए निकला ही था कि अचानक किसी अदृश्य शक्ति ने मेरे कदम रोक लिए। जैसे मुझे वापस लौट कर अगरबत्ती का पैकेट ले लेने को कहा हो। मैंने पैकेट ले लिया तो फिर मुझे लोबान का पैकेट भी ले लेने को कहा। यह लोबान, जिसे शिरडी से कोई लाकर दे गया था, पिछले दो महीनों से दराज में पड़ी थी।

मैंने तत्काल कुछ ज्यादा सोचे बिना ही यह पैकेट उठा लिया और काकड़ आरती के लिए निकल पड़ा। बिठूर मंदिर पहुंचने पर देखा कि गुरुजी कुछ लोबान जला कर बाबा की धोक लगा रहे थे और पूरी श्रद्धा से अगरबत्तियां लोह-पात्र पर लगी थी। गलियारे में लगभग दौड़ते हुए (मुझे बाद में समझ आया कि मैं इतना बेतहाशा क्यों दौड़ रहा था) मैं मंदिर के गर्भ- गृह में जा पहुंचा। देखा कि गुरुजी बाबा के समक्ष नतमस्तक खड़े थे। वहां एक और व्यक्ति खड़ा था। मैंने लोबान का पैकेट खोला, इसे चूरा किया और पीछे से इसे उस पात्र बिखेर दिया।

ताजा लोबान की गंध पाकर गुरुजी ने अपनी आंखें खोलीं और मुड़कर देखा तो पाया कि मैं करबद्ध खड़ा था । अचरज में पड़े गुरुजी ने मुझसे पूछा कि मैंने कैसे जाना कि मंदिर में लोबान समाप्त हो गया था। उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि उस दिन मंदिर में भी कोई न था, जिससे यह मंगवा ली जाती। इसलिए धूपबत्ती से ही अनंत कोटी को धोक लगाई जा रही थी।

मुझसे कुछ कहते नहीं बन रहा था। बस, साई के चरणों में नतमस्तक था, जो उनकी श्रीसेवा का अवसर पा सका। सारा कुहलका साफ हो रहा था और साई की लीला मुझे संतृप्त कर रही थी।

और मैं तभी पूछ बैठा कि उन्हें चलाऊंगा कहां ? आशीर्वाद की में उन्होंने जैसे हाथ से अपनी प्रतिमा के सामने वाले आंगन की तरफ इंगित किया। मैं बता नहीं सकता, मैं ही क्यों कोई भी बयां नहीं कर सकता कि ऐसे क्षण में खुशी का क्या ठिकाना होता है ? मुझे बाबा की अनुकंपा की अनुभूति क्या थी - बस, कोई जादू ही था।

ऐसा ही रविवार की एक सुबह जब मैं संयोग से मंदिर गया था। मैं काफी समय से रविवार के दिन मंदिर नहीं जा पाया था। सुबह के दस बज रहे थे। भजन चल रहे थे। सवेरे जल्दी उठकर तैयार हो गया ताकि मंदिर जाकर गौतम जी के गाए कर्णप्रिय मधुर भजन सुन सकूँ । भजनों के बीच ही यकायक मैंने देखा कि बाबा की प्रतिमा में जान पड़ गई। उसमें हरकत आ गई थी। मुझे वह हिलती-जुलती लगी । लगा कि बाबा मेरी ओर मुखातिब थे और मुझे अपने करीब बुला रहे थे।

सोचा कि मुझे भ्रम हुआ लेकिन फिर साफ दिखा कि बाबा मुझसे बात कर रहे थे। मुझे दीवाली के दिनों में अपने गृह नगर मैनपुरी जाने पर झिड़क रहे थे। हमारी रू-ब-रू बात शुरू ही थी कि भजन और संगीत से मेरा ध्यान हट गया। बाबा मुझसे कह रहे थे कि इस दुनिया में हर कोई बहुत चालू है।

उन्होंने आगे कहा कि रोशनियों के इस त्योहार पर वे कितना अकेले रह जाएंगे मैंने उत्तर दिया कि मेरा जाना जरूरी था, क्योंकि मेरे पिताजी का मानना था कि तीज-त्योहारों पर परिवार के सभी जनों का मिलना हो जाता है। हमारा वार्तालाप पूरा ही हुआ था कि दुविधा में फंसे मेरे मन को बाबा के जवाब से राहत मिली। मन की दुविधा छंट गई। बाबा कह रहे थे - ठीक है, आप शनिवार के रोज जा रहे हैं तो यहां मेरे पास शुक्रवार को छोटी दीवाली के दिन क्यों नहीं आ जाते ?

मुझे यह सुझाव ठीक लगा। (लगा कि मैंने भले ही कुछ और सोचा हो लेकिन बाबा ने शायद कुछ और सोच रखा था ?) तभी मैं उठ खड़ा हुआ और गुरुजी, जो पास ही खड़े थे, से कहा कि मैं शुक्रवार को पटाखे चलाने के लिए मंदिर आऊंगा । बाबा ने एक बार फिर ताकीद की कि ज्यादा शोर करने वाले पटाखे न लाऊं बल्कि फुलझड़ियां ठीक रहेंगी।

और मैं तभी पूछ बैठा कि उन्हें चलाऊंगा कहां ? आशीर्वाद की में उन्होंने जैसे हाथ से अपनी प्रतिमा के सामने वाले आंगन की तरफ इंगित किया। मैं बता नहीं सकता, मैं ही क्यों कोई भी बयां नहीं कर सकता कि ऐसे क्षण में खुशी का क्या ठिकाना होता है ? मुझे बाबा की अनुकंपा की अनुभूति क्या थी - बस, कोई जादू ही था।

बृहस्पतिवार के दिन मैंने अपना कार्यक्रम फिर से बनाया । तय किया कि बाद में समय मिले या न मिले । सो, मुझे शाम को ही मंदिर हो आना चाहिए। मैंने ढेरों पटाखे खरीदे लेकिन बाबा के मन कुछ और था। जब तक वह नहीं चाहें कुछ नहीं हो सकता। बाबा की इच्छा ही सर्वोपरि है। शुक्रवार का मतलब शुक्रवार होता है। जब मै बृहस्पतिवार को गाड़ी से बिठूर जा रहा था, तो एकाएक मुझे एक मित्र का फोन आया।

वह एक जरूरी चर्चा के लिए मुझसे तुरंत मिलना चाहता था। मैं न नहीं कह सका और ड्राइवर को वापस मुड़ने को कहा। बिठूर जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। शुक्रवार को ही वहां जाना हो पाया। मेरे साथ मेरे कार्यालय के फोटोग्राफर ओम चौहान भी थे। उन्हें में कुछ यादगार क्षणों को कैमरे में कैद करने के लिए अपने साथ ले गया था तकरीबन तीन घंटे तक हम वहां मौजूद मंदिर के स्टाफ के साथ पटाखे चलाते रहे। यकीनन हम सबने बाबा की ऐसी तस्वीरें खींची, जिनमें बाबा आकाश में छूटते पटाखों पर खिलखिलाते दिखलाई पड़ते हैं।

(मोहित दुबे की पुस्तक साईं से साभार)

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