बाबा नीब करौरी की अनंत कथाएँ: उँगली के स्पर्श मात्रा से उसकी रोशनी लौटायी जिसकी आँख में काँच के २२ टुकड़े घुस गए थे

बाबा नीब करौरी की अनंत कथाएँ: उँगली के स्पर्श मात्रा से उसकी रोशनी लौटायी जिसकी आँख में काँच के २२ टुकड़े घुस गए थे

केहर सिंह जी के सबसे छोटे लड़के, आनन्द की (जब वह १३-१४ वर्ष का रहा होगा) आँख में चश्मे के ऊपर अखरोट आकर इस तेजी से लगा कि चश्मे का कांच टूटकर बुरी तरह कई टुकड़ों में उसकी आँख में धंस गया । घटना २ जनवरी, १९५८ की है जब लड़का अपनी बहन, कुसुम साथ अखरोट की गेंद बनाकर टेनिस खेल रहा था ।

रक्त की धार बह चली । कुसुम ने घबराकर अपने पिता को फोन से सूचित किया कि आनन्द की आँख फूट गई । वे भागे आये । मेडिकल कालेज में आँख से कुछ बड़े काँच के टुकड़े निकाल लिये गये पर तब भी २५-३० छोटे टुकड़े पुतली तथा अन्य भागों में ऐसे घुसे थे कि उन्हें निकाल पाना संभव ही न था । लड़के की एक आँख पैदाइशी खराब थी, अब दूसरी भी एक प्रकार से जा चुकी थी । डा० मेहरा तथा अन्य सभी ने राय दी कि एक बार लड़के को सीतापुर ले जाकर आपरेशन करायें ।

दरअसल उनकी राय केवल सान्त्वना के लिये थी । एक दिन लड़के ने अपनी बहिन से कहा, "दीदी, तुम ससुराल चली जाओगी तो मुझे भी ले जाना । मैं तुम्हारा सब काम कर दिया करूँगा । तुम मुझे रोटी खिला देना ।॥" संध्या को कुसुम से यह बात सुनकर केहर सिंह जी टूट-से गये । इस मार्मिक बात की रात को पलंग पर लेटे याद आने पर वे बिलखकर रो उठे कि. भगवान मेरे पापों की सजा इस लड़के को क्यों दे रहे हो ?" इतने में फोन की घंटी बज उठी।

इन्होंने उसे बेमन से जो उठाया तो महाराज जी की आवाज आई, “केहर सिंह ?" "जी महाराज !" "क्या कर रहा है ?" "कुछ नहीं महाराज !" "नहीं, तू रो रहा है । तेरे लड़के की आँख फूट गई ? उसे सीतापुर मत ले जाना । वे लड़के की आँख फोड़ देंगे। अलीगढ़ मोहन लाल के पास ले जा।" और टेलीफोन बन्द हो गया (तब पूरनदा महाराज जी के ही साथ थे बरेली में बैंक मैनेजर मेहरोत्रा के घर।

उन्होंने बताया कि टेलीफोन करने के पूर्व बाबा जी ने कम्बल को ओढ़ लिया था और फिर चिल्लाकर कहा था, "केहर सिंह रो रहा है उसके लड़के की आंख फूट गई है ।" परन्तु केहर सिंह जी ने तो तब बाबा को याद भी नहीं किया था !)

टेलीफोन मिलने के बाद चौधरी साहब के मन-मानस में एक आशा की किरण-सी फूट गई ! क्या अब भी गुंजाइश है आँख ठीक हो जाने की? अतः दूसरे दिन उन्होंने अपने सहकर्मी शर्मा जी से, जो उस समय शिक्षा विभाग के सचिव थे, डा० मोहन लाल को अपने लड़के के लिए अस्पताल में प्राइवेट वार्ड में एक कमरा बुक करा देने का आग्रह किया । बाबा जी की लीला तो चल रही थी ।

और तभी बाबाजी ने खींच लिया लड़के को अपने पास । उसका हाथ पकड़ा और उसकी हथेली को अपनी तर्जनी (उंगली) से दबाकर छोड़ दिया !! और तब केहर सिंह जी से कहा, "अब तू जा । अपना काम कर ।” मन ही मन केहर सिंह जो को रोष व्याप्त हो गया कि इतनी दूर बुलाया और मिनटों में रुख्सत कर दिया । बुलाया ही क्यों था तब ? वे लखनऊ लौट आये । बात आई गई हों गई ।

शर्मा जी ने तत्काल डा० मोहन लाल को ट्रंक काल बुक करा दिया । बहुत प्रयास करने के बाद मिल पाने वाला ट्रंक काल पहली ही बार डायल करने में मिल गया | उधर फोन भी डा० मोहन लाल ने ही उठाया !! जब शर्मा जी ने उनसे सब बात कही तो मोहन लाल जी कुछ रोष में बोले, "कैसे लापरवाह है तुम्हारे ये केहर सिंह ? अभी तक लड़के को नहीं लाये जिसके लिये तीन दिन से कमरा बुक किया पड़ा है !!" केहर सिंह जी सुनकर अवाक रह गये कि किसने करा दी होगी कमरे की तीन दिन पूर्व ही बुकिंग ? बाबा जी के सिवा कौन हो सकता है !!

तब दूसरे दिन इन्होंने तैयारियाँ करके अपनी पत्नी तथा भतीजे के साथ लड़के को अलीगढ़ भेज दिया और अलीगढ़ पहुंचने पर स्टेशन में जिस व्यक्ति ने इन लोगों को रिसीव किया वे स्वयं डा० मोहन लाल थे जो इन्हें अपनी गाड़ी में बिठाकर पहले अपने घर ले गये, इन्हें स्नान इत्यादि से निवृत्त करा भरपेट नाश्ता कराया और तब अस्पताल ले गये ! (कौन प्रेरित कर रहा था अलीगढ़ के मशहूर, व्यस्त डा० मोहन लाल को कि अपने मरीज को स्वयं स्टेशन से घर ले जाकर, ख़ातिर तवज्जो कर अस्पताल ले जायें !)

एक हफ्ते तक लड़के की आँख पर सात अन्य विशेषज्ञों द्वारा रिसर्च होता रहा। अन्त में छः डाक्टरों ने आपरेशन के विरुद्ध परामर्श दिया पर एक डाक्टर, शुक्ला जी ने आपरेशन कर डालने की हिम्मत कर दी कि इस पार या उस पार लड़के की आँख तो वैसे भी जा चुकी थी । परन्तु आपरेशन करने पर केवल कुछ ही काँच के टुकड़े निकल पाये -२०-२२ बारीक टुकड़े तब भी बने रहे आँख के भीतर जो अब आँख की हिस्सा बन चुके थे । उन्हें निकालने का एक ही तरीका था। आँख को ही निकाल दिया जाये । लड़के की आँख में पट्टी बाँधकर घर भेज दिया गया । शर्मा जी को फोन में सूचित कर दिया गया - सौरी के साथ ।

जब आँख की पट्टी खुली तो लड़के को दिखाई तो देने लगा कुछ कुछ, पर हर चीज की २०-२२ आकृतियाँ ही नजर आती थीं । वह न किसी चीज को और न किसी व्यक्ति को ठीक से पहचान सकता था । घँसे ये २०-२२ काँच के टुकड़े आँख के ही २० २२ लेन्स बन चके ॥ केहर सिंह हताश होकर लड़के को एक और बाबा के पास ले गये अपने परिवार के सदस्यों की राय पर (जो सब के सब उन्ही बाबा के तो परम भक्त थे परन्तु महाराज जी से विरोध रखते थे ।) उन संत बाबा ने राय दी कि, "बच्चा, चाँद की किरणों में बड़े गुण हैं, बड़ी शक्ति है । लड़के से कहो कि रोज चाँद की तरफ देर तक देखा करे ।" यह भी किया गया । पर लडका २०-२२ चाँद, २०-२२ उँगलियाँ और २०-२२ आकृतियों देखता रहा । केहर सिंह जी मन मारकर बैठ गये ।

और तब एक दिन (माह फरवरी में) आफिस जाते वक्त उनके टेलीफोन की घंटी बज उठी। उधर से बाबा जी बोल रहे थे, "केहर सिंह। क्या कर रहा है ? यहाँ आजा लल्लू दादा (श्री देव कामता दीक्षित) के घर । मैं वही हूँ।" और लल्लू दादा के घर का पता भी बता दिया । घर से निकलते वक्त लड़का दिख गया । प्रभु प्रेरित लड़के को भी गाड़ी में बिठा लिया । लल्लू दादा के घर पहुँचे, महाराज जी को प्रणाम किया (पर लड़के ने नहीं किया - हाथ तक न जोड़े खड़ा रहा केवल ।)

और तभी बाबाजी ने खींच लिया लड़के को अपने पास । उसका हाथ पकड़ा और उसकी हथेली को अपनी तर्जनी (उंगली) से दबाकर छोड़ दिया !! और तब केहर सिंह जी से कहा, "अब तू जा । अपना काम कर ।” मन ही मन केहर सिंह जो को रोष व्याप्त हो गया कि इतनी दूर बुलाया और मिनटों में रुख्सत कर दिया । बुलाया ही क्यों था तब ? वे लखनऊ लौट आये । बात आई गई हों गई ।

तब ६-७ दिन बाद एक दिन उन्होंने बड़े विस्मय से देखा कि लड़का एक किताब लिये बड़े गौर से उसे देख रहा है !! पूछने पर कि

क्या कर रहे हो ? लड़के ने कहा, "पढ़ रहा हूँ", और किताब से पढ़कर उन्हें भी सुना दिया !!

कहाँ गई वे २०-२२ आकृतियाँ जब कि आज के दिन भी काँच के वे २०-२२ टुकड़े लड़के की आँख में ज्यों के त्यों बने हैं ? डा० मेहरा और डा० मोहन लाल दोनों ने ही यह अचम्भा सुनकर पुनः लड़के की आँख का परीक्षण किया और काँच के टुकड़ों को यथावत पाया वहाँ । डा० मेहरा ने तो लड़के की आँख का पूरा इतिहास लिखकर अन्त में कह दिया कि, यह तो केवल दैवी कृपा है । इसमें मेडिकल साइंस का कोई हाथ नहीं ।”

और डा० मोहन लाल ने शर्मा जी से कहा, "कौन हैं ये नीब करौरी बाबा ? मैंने तो कभी देखा नहीं उन्हें । पर मेरे पास वे जब-तब आँखों के मरीजों को भेजते रहते हैं !! लड़के ने बाद में अपने एम० ए० तक की पढ़ाई सदा ऊँची श्रेणी लाकर पूरी की !!

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