नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: जब भक्त को सबक़ देने के लिए आठ घंटे गाड़ी के पीछे-पीछे दौड़ाया

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: जब भक्त को सबक़ देने के लिए आठ घंटे गाड़ी के पीछे-पीछे दौड़ाया

गुरु-वचनों की अवहेलना पर बाबा जी द्वारा सीख की एक और इलाहाबाद में श्री केहर सिंह जी को बाबा जी ने अगले दिन सुबह सात बजे दादा के घर बुलाया था कि संगम चलेंगे । चौधरी साहब को अपने नित्य कर्मों को निबटाने में १०-१२ मिनट का विलम्ब हो गया । विलम्ब की तो कोई ऐसी महत्ता न थी परन्तु केहर सिंह जी ने साथ में यह भी सोच डाला कि बाबा जी ही कौन ऐसे वक्त के पाबन्द हैं स्वयँ भी तो वादा करके आते नहीं ।

(चौधरी साहब को ऐसे अपने निजी २-३ अनुभव पूर्व में हो चुके थे) परन्तु गुरु स्वयँ जो करते हैं उसके आधार पर शिष्य या शरणांगत को भी वैसा ही करना, या उस आधार पर वसा ह स्वतंत्र आचरण सर्वथा वर्जित है जो असि हिसिसा करई नर, जड़-विवेक अभिमान । परई कल्प भरि नरक महुँ, जीव कि ईस समान ।।

अस्तु, महाराज जी ने, लगता है, चौधरी साहब के ऐसे विचारों को मिटा देने हेतु कुछ सीख देने की सोच ली थी । सो वे एक अन्य भक्त की कार में सवार हो दादा को साथ लिये संगम की ओर सात बजने के तुरन्त बाद चल दिये । जब केहर सिंह जी सात बजकर बारह मिनट में दादा के घर पहुंचे तो उक्त समाचार पाकर तुरन्त अपनी कार में बाबा जी का पीछा करते फोर्ट रोड पर दौड पडे । पर उनकी कार और बाबा जी की कार के बीच हमेशा कुछ न कुछ फासला बना ही रहा !! कभी २० गज तो कभी ५ गज और कभी २ ही गज ।

एक बार तो एक बंगले के फाटक से बाबा जी की कार निकली तो उसी क्षण केहर सिंह जी की कार भी फाटक में घुसने को हो गई, और बाबा जी एवं केहर सिंह जी का आमना-सामना भी हो गया बाबा जी हँस रहे थे उनकी तरफ देखकर !! इसी तरह बाबा जी उन्हें इलाहाबाद की विभिन्न सड़कों में अपना पीछा कराते दौड़ाते रहे तथा बीच बीच में पीछे के शीशे से इनकी तरफ देख देख कर हँसते भी रहे । इस तरह ७.१५ बजे सुबह से ३.३० बजे दोपहर बाद तक यह दौड़ चलती रही !!

और फिर अपने घर की सड़क के चौराहे पर पहुँचते पहुँचते (३.३० बजे) केहर सिंह जी यह सोचकर कि बाबा जी इन ८ घंटों के बीच मेरे कारण भूखे ही हैं (और साथ में लीला का तथ्य समझ कर भी) पीछा करना छोड़ कर अपने घर चले गये, क्योंकि इस शिक्षा-अवधि के बीच उधर तो बाबा जी, दादा और उनका ड्राइवर और इधर चौधरी साहब और उनका ड्राइवर भी भूखे-प्यासे रहे उस १३ मई, सन १९५६ की तपती धूप में पूरे सवा आठ घंटे ||

परन्तु सबक तो पूरा पढ़ाना ही था बाबा दूसरी सुबह दर्शन होने पर न तो बाबा जी ने इस विषय में कुछ कहा, और न केहर सिंह जी ने ही। परन्तु दादा ने केहर सिंह जी को बताया कि महाराज जी हँस हँस कर कह रहे थे कि, “सात बजे बुलाया था, नहीं आया । अब देखो, कैसे दौड़ रहा है पीछे-पीछे ?"

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