नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: सोने की वो अंगूठी...बरसों बाद कर्मकाण्ड भी पूरा करा दिया महाराज जी ने

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: सोने की वो अंगूठी...बरसों बाद कर्मकाण्ड भी पूरा करा दिया महाराज जी ने

एक बार किसी के कहने पर मैंने एक अच्छे वजन की सोने की अंगूठी बनवाई और शुभ दिन कर पहन ली । कुछ ही दिनों में मेरे लिये वह साधारण-सी बात हो गई । कुछ काल बाद महाराज जी पधारे हमारे घर । एकाएक उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और अंगूठी को देखकर बोले, “ओहो ! तुमने तो बड़ी अच्छी अंगूठी पहनी है।” महाराज जी का यह आचरण मेरी समझ में नहीं आया । पर वे उस अंगूठी को पकड़कर मेरी उंगली में घुमाते रहे कुछ देर तक और बीच बीच में कह देते, “बड़ी अच्छी है ।”

मेरे मन में भाव आया कि महाराज जी को ही अर्पण कर दूँ इसे, और इसी भाव से मैंने अंगूठी उतारने की मुद्रा में कहा, "क्या महाराज..... ।” परन्तु महाराज जी ने मुझे मेरा वाक्य पूरा नहीं करने दिया, और न मन में उठे भाव को ही व्यक्त करने दिया, तत्काल यह कहकर कि, “अभी नहीं ।” अंगूठी मेरे ही हाथ में रह गई। परन्तु बाबा महाराज के शब्द अभी नहीं तो उस घटनाचक्र से सम्बन्धित थे जो उनकी महासमाधी के उपरान्त घटित होने वाला था !!

सितम्बर १९७३ में महाराज जी ने शरीर त्याग दिया था। परन्तु इसके पूर्व श्री धाम कैंची में श्री वैष्णवी देवी के प्रतिष्ठापन की पूरी योजना बना गये थे। १५ जून, १६७४ के दिन वैष्णवी देवी की प्रतिमा का प्रतिष्ठापन आयोजित हुआ। मैं भी वहाँ इस हेतु तथा ट्रस्ट की मीटिंग में शामिल होने पहुँच गया था।

मेरे मन में भाव आया कि महाराज जी को ही अर्पण कर दूँ इसे, और इसी भाव से मैंने अंगूठी उतारने की मुद्रा में कहा, "क्या महाराज..... ।” परन्तु महाराज जी ने मुझे मेरा वाक्य पूरा नहीं करने दिया, और न मन में उठे भाव को ही व्यक्त करने दिया, तत्काल यह कहकर कि, “अभी नहीं ।

प्रतिष्ठा के पूर्व श्री सिद्धी माँ ने अन्य बातों के मध्य यह भी कहा कि, “कैसी समस्यायें आ जाती हैं आश्रम में कभी कभी। अब प्रतिष्ठा कराने वाले पंडित जी कहते हैं कि प्रतिष्ठा हेतु अन्य चढ़ावों के अलावा देवी के लिए कुछ न कुछ स्वर्णाभूषण एवं दान के लिये सोना परमावश्यक है।

आश्रम में सोने का क्या काम ? और यदि कर्मकाण्ड पूर्ति हेतु जरूरी भी है तो कहाँ से आये सोना ?” आदि आदि । मैं भी सुनकर उदास-सा हो चला आया ।

उस रात एकाएक मुझे महाराज जी का वह छोटा-सा वाक्य “अभी नहीं”—याद आ गया। इतना ही नहीं, सुबह जब मैं सोकर उठा तो पाया कि अंगूठी मेरी उंगली में नहीं है— ढूंढने पर तकिये के नीचे मिली !!

स्नान के समय भी उंगली से न खिसक पाने वाली यह अंगूठी स्वतः उतर गयी उस रात !! अभी नहीं का पूरा अर्थ मेरी समझ में आ गया तब। सुबह के स्नान-ध्यान के बाद मैंने वह अंगूठी लाकर श्री माँ के हाथ में रख दी उन्हें पूरा प्रकरण सुनाते हुए।

-- देवकामता दीक्षित

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