नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: अन्तिम स-शरीर दर्शन व उस दो रोटी-हरी सब्ज़ी का प्रसाद कैंची धाम में

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: अन्तिम स-शरीर दर्शन व उस दो रोटी-हरी सब्ज़ी का प्रसाद कैंची धाम में

तेरह जून १९७३ को मैं भी पहुँच गया लखनऊ से कैंची धाम १५ जून के भण्डारे का भोग पाने। तब पाया कि महाराज जी बाहर बरामदे की गद्दी पर समाधिस्थ-से बैठे रहते हैं आँखे मूँदे । बाकी तीन ओर भक्तों दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती । सामने का काफी क्षेत्र तो विदेशियों अमरीकरन, ग्रीक, कैनेडियन, जर्मन, अंग्रेज आदि से घिरा रहता था। - महाराज जी तभी आँखे खोलते जब प्रसाद-फल या मिठाई बाँटते होते फेंक फेंककर, या किसी आतुर की कोई फरियाद सुननी होती। हाँ, रामकुटी में सभी से खुलकर बात कर लेते ।

१५ जून निकल गया । १६ जून को मैं वापसी के लिए अपना सामान लेकर आश्रम से मंदिर प्रांगण में ले आया बाल भोग के बाद । मैं इन्तजार में बैठा रहा कि कहें कि “अब जाओ ।” (मेरे लिये विदाई-प्रसाद भी आ चुका था ।) उक्त आज्ञा हेतु ३-४ बार प्रणाम भी किया (उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने हेतु) जब भी महाराज जी राधा-कुटी या राम-कु बाहर निकले ।

पर मेरी तरफ देखकर भी उन्होंने जाओ नहीं कहा । मुझे क्या पता था कि यह उनका अन्तिम स-शरीर दर्शन होगा मेरे लिये, और कि इसी कारण वे मुझे अधिकतम अवधि के लिए अपने श्री चरणों में रोकना चाह रहे हैं । और इसी कारण भी इस बार जिस गम्भीरता से मुझसे बातें कर रहे थे उस तरह पूर्व में कभी नहीं की थीं । पर मैं तब क्या समझता उस समय उनके उस आचरण को ?

तीन बज गये अपरान्ह के, फिर चार और फिर पाँच भी । मैं अपना सामान समेट कर पुनः आश्रम-खंड में चला गया। करता भी क्या और ? फिर १७ जून आ गई । लखनऊ में काम की भी चिन्ता थी । मातहतों को ऐसे ही छोड़ आया था । अवकाश भी खत्म होने को आ गया था । महाराज जी अपने नियमित समय पर बाहर भी आ चुके थे । और फिर ११ बजे प्रसाद पाने राधाकुटी में चले भी गये थे । मैंने आज चले जाने का निश्चय कर लिया था ।

पर राधाकुटी में तो मेरे हेतु कुछ और ही वात्सल्य-लीला चल रही थी दीनदयाल की (जिसका मुझे बाद में पता चला श्री माँ से ।) जब बाबा जी प्रसाद पाकर पुनः बाहर आ गये तो मुझे कोई पीछे के दरवाजे से महाराज जी की राधाकुटी के सामने प्रांगण में बुला ले गया । वहाँ श्री माँ कुटी के बरामदे में खड़ी थी हाथ में दो रोटी और उसके ऊपर सूखी हरी सब्जी लिये ।

मुझे देखकर बोली, “ले मुकुन्दा, महाराज जी तेरे लिये दे गये हैं अपनी थाली से कि मुकुन्दा को बुलाकर दे देना । वे तो तुझे भीतर ही बुलवा रहे थे अपने ही हाथों से देने, परन्तु दादा – बाबा, हाँ बाबा, अभी बुलाते हैं --- ही कहते रह गये (कि कहीं तेरे आने से महाराज जी ठीक से भोजन न कर पायें | " महाराज जी का अपने प्रति ऐसा वात्सल्य देखकर मैंने प्रेमाश्रु बहाते वह अन्नपूर्णा प्रसाद श्री माँ के कर कमलों से ले माथे चढ़ा लिया । इस घटना की याद आते ही आज भी मेरी आँखें भर आती हैं ।

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