नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्तों की भावनाओं के प्रति सदा सचेत

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्तों की भावनाओं के प्रति सदा सचेत

पुनः सन्ध्या समय मेरे बाँये पंजे में अपना दाहिना पंजा फँसा, और मेरे ऊपर एक प्रकार से लद कर आप आवासीय भवनों के चक्कर लगाने लगे कहते हुए कि, “शाम को घूमना अच्छा होता है स्वास्थ्य के लिए ।” तभी मैंने पुनः कह दिया, “महाराज, आपने विशम्भर जी से मुझे १०)रु० दिलवा दिये । वो तो मैं आपसे ले लेता वह दूसरी बात होती।” तो बोले, “तुझे बुरा लगा ? अच्छा, उसे वापिस कर देना ।” मैं आश्वस्त हुआ । परन्तु दूसरे ही चक्कर में पुनः बोल उठे, “नहीं उसे मत वापिस करना । वह बुरा मान जायेगा । हमें दे देना ।”

वाह प्रभु ! भक्त की भावनाओं के प्रति कितने सचेत, कितने चैतन्य, उनके प्रति कितना आदर—कि किसी के अन्तर में किसी प्रकार की चोट न लगने पावे !! अन्ततोगत्वा, सोमवार को मुझे ५००) रु० देकर एक लिस्ट दे दी गई कि अब आओगे तो आगरा से ये सामान भी लेते आना । साथ में हिदायत भी दी गई कि किस दुकान से कौन सी वस्तु खरीदनी होगी !!

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