नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: तैने पैर दबाये हैं, मेरे पैर दबाये हैं, कुछ माँगेगी नहीं?

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: तैने पैर दबाये हैं, मेरे पैर दबाये हैं, कुछ माँगेगी नहीं?

मुझे श्री नीब करौरी बाबा जी के दर्शन सर्वप्रथम अपनी एक प्यारी सहेली श्रीमती ज्ञानो कोहली मेहरोत्रा के निवास स्थान पर अनायास, बिना किसी प्रयास के अकस्मात हुए थे। यह कोई सन् 1960 की घटना होगी, मैं इंटर में पढ़ती थी, परन्तु मेरे स्मृतिपटल पर वह आज भी किसी सुन्दर पुष्प की भाँति ताजा है। हम दोनों सहेलियाँ अक्सर एक दूसरे के घर साथ-साथ पढ़ने के लिए आया-जाया करते थे।

उस दिन भी ज्ञानो के लाटूश रोड स्थित घर पर साथ बैठकर पढ़ने के लिए गई थी, बाहर ही अपार जन-समूह और ढेर सारी गाड़ियाँ खड़ी थीं। ज्ञानों के आदरणीय पिता स्वर्गीय श्री सूरज नारायण मेहरोत्रा का पूरा परिवार ही बाबा जी की सेवा में लगा था। भीड़-भाड़ देखकर मैंने मन ही मन समझ लिया कि आज कोई पढ़ाई बढ़ाई नहीं होगी। तब क्या मैं जानती थी कि उस दिन मैं कितना सुन्दर और महत्त्वपूर्ण पाठ पढ़ने जा रही थी।

इतने वर्ष बीतने के पश्चात् मेरा मन जब भी उद्वेलित और अशान्त हुआ है, बाबा के स्मरण से ही अभूतपूर्व शान्ति हुई है, एवं उचित मार्ग भी मिला है। मेरा विश्वास ही नहीं दृढ़ विश्वास है कि बाबा हमें छोड़ कर कहीं नहीं गये हैं; वरन् निरन्तर हमारे साथ ही रहते हैं।

उस भीड़ में ज्ञानों को ढूँढकर छत पर जाकर पढ़ने का प्रयास कर रहे थे कि ज्ञानो को आदरणीय मम्मी जी ने कार्यवश नीचे बुला लिया। परीक्षा सिर पर थी और ज्ञानो और मेरी पढ़ाई में इस तरह की बाधा मुझे बहुत ही बुरी लग रही थी। काफी समय के बाद भी जब मेरे सहेली पलट कर नहीं आयी, तो उसे बुलाने हेतु मैं स्वयं नीचे पहुँच गयीं। ज्ञानो की माँ से पूछा तो कहने लगीं, "अरी पढ़ाई तो रोज करती है, जाकर उस कमरे में बाबा जी के दर्शन कर ले, ज्ञानो भी वहीं बैठी है।"

ज्ञानों को बुलाने हेतु उस कमरे के द्वारे पर मैं जा खड़ी हुई और उस अपार भीड़ में मेरी दृष्टि ज्ञानों को खोजने लगी। मैंने देखा कि अच्छे भले लोग जमीन पर, एकदम चुपचाप शांति भाव से बैठे हैं किसी प्रकार का न कोई प्रवचन न कोई भजन-कीर्तन उस वक्त हो रहा था। मेरा अल्हड़ मन उस उम्र में बड़े सन्तों के सत्संग का न कोई महत्त्व समझता था, और न ही समझने की कोई बुद्धि ही थी। मैं तो बाबा को पहचानती तक नहीं थी, परन्तु मैंने देखा कि एक तख्त पर श्वेत वस्त्रधारी, वह भी अस्त-व्यस्त, स्थूल काय वयोवृद्ध व्यक्ति अधलेटे से पड़े थे।

उनके तेजस्वी चेहरे पर हल्की-हल्की दाढ़ी और उनकी दृष्टि न जाने कहाँ शून्य में खोई हुई थी, वह कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे। कुछ व्यक्ति आँखें मूँदे समाधि की अवस्था में उनके निकट ही बैठे थे, कुछ एक उनकी चरण रज लेने की लालसा में आगे बढ़ रहे थे। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ी यह सारा दृश्य देख रही थी कि मुझे सुनाई दिया "शैलबाला, इधर आ!" मैं नहीं समझ सकी कि वह मुझे ही बुला रहे थे।

एक तो मेरा नाम केवल शैला है ऊपर से बाबा को किसी ने बताया भी नहीं, फिर भी वह किसे बुला रहे हैं। एक बार उन्होंने पुनः आवाज दी और न जाने कैसे मैं स्वयं उस भीड़ में राह बनाती बाबा के निकट जा पहुँची। ज्ञानो के पिता ने मुझे झिझोरते हुए बाबा के चरण छू कर आशीर्वाद लेने को कहा। इतने में बाबा ने मेरी हिचकिचाहट जानकर मुस्कराते हुए कहा, "यह पैर नहीं छुएगी, मेरे पास बैठ और पाँव दबा दे। और बाबा ने निकट ही पाँव दबाने के लिए बिठा लिया। बाबा के दिये उस विशेष शुभ अवसर की महत्ता न समझते हुए अनमने मन से मैं उनके पांव दबाने लगी और मन ही मन क्रोधित हो रही थी कि अच्छा पढ़ने को आए थे और यहाँ बैठकर पैर दबा रहे हैं।

इतने में बाबा ने सिर पर हाथ रखकर, कहा बड़ा गुस्सा है, थोड़ा समय भक्ति भजन में भी लगाया कर। जा तुझे मेरा आशीर्वाद है। तैने पैर दबाये हैं, मेरे पैर दबाये हैं, तू कुछ नहीं मांगेगी। मैं उनसे भला उस समय क्या मांगती। कच्ची उम्र में न तो मेरी कोई बड़ी इच्छा ही थी, न कोई चिन्ता, न कोई महत्त्वाकांक्षा। परन्तु बाबा के आशीर्वाद से मुझ में एक नयी आस्था जाग्रत हुई, और जाने और अनजाने एक छोटी-सी भगत बन गयीं।

उस घटना के पश्चात् अनेक बार मैंने अपनी सहेली के घर, कभी हनुमान सेतु के निकट पुराने और नये मन्दिर में कभी-कभी स्वप्न में भी बाबा के दर्शन किये। संकट की घड़ी में हर बार अपार शान्ति की अनुभूति हुई। मेरा विश्वास है कि आज मैं जो भी हूँ जैसी भी हूँ बाबा की कृपा से हूँ।

इतने वर्ष बीतने के पश्चात् मेरा मन जब भी उद्वेलित और अशान्त हुआ है, बाबा के स्मरण से ही अभूतपूर्व शान्ति हुई है, एवं उचित मार्ग भी मिला है। मेरा विश्वास ही नहीं दृढ़ विश्वास है कि बाबा हमें छोड़ कर कहीं नहीं गये हैं; वरन् निरन्तर हमारे साथ ही रहते हैं।

वह सदैव सांसारिक विपदा में हमारी रक्षा तथा उचित मार्गदर्शन करते हैं। मेरा सभी उन बड़े-बड़े भक्तों से अनुरोध है कि जिन-जिन पर बाबा की विशेष कृपा दृष्टि रही है, उस प्रसाद को दूसरों की भलाई और उद्धार में अपने तन-मन और धन से सेवा करें।

-श्रीमती शैलाचन्द्रा, लखनऊ

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