नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: जब पुलिस ने महाराज जी को हवालात में किया बंद...

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: जब पुलिस ने महाराज जी को हवालात में किया बंद...

पुलिस दारोगा नासिर अली के सिपाहियों ने बाबा जी महाराज को लावारिस-सा घूमते पाकर उन्हें दफा १०६ में थाने में बन्द कर दिया । दारोगा के आने पर उन्हें भी सूचित कर दिया । रात में हवालात में पहरे पर तैनात सिपाहियों ने सुबह दारोगा जी से कहा, “हुजूर, वह दफा १०६ वाला मुजरिम तो कोई जिन्न मालूम देता है । रात भर वह हवालात के ताला बन्द दरवाजे से बाहर आता-जाता रहा, पेशाब करता था और फिर बन्द हो जाता था, और कभी हवालात की छत पर टहलने लगता था । हुजूर, हम तो रात भर खौफ से काँपते रहे और खैर मनाते रहे ।”

सुनकर नासिर अली समझ गये कि आप कोई बहुत पहुँचे हुए फकीर हैं । सो खुद जाकर हवालात का ताला खोल बाबा जी से बहुत प्रकार से क्षमा माँगी, अपने घर ले आये सम्मानपूर्वक और उन्हें स्नान आदि करवाकर प्रसाद पवाया । इरादा तो था कि अब बाबा जी को अपने ही यहाँ रोके रहेंगे, परन्तु शाम को दिशा-मैदान का बहाना कर बाबा जी बाहर गये तो वहीं से अदृश्य हो भाग निकले, यद्यपि नासिर अली ने उनके पीछे अपने दो लड़के लगा दिये थे कि फकीर साहब कहीं चले न जायें !!

बाबा जी डी० आई० जी० ओंकार सिंह जी की गाड़ी में बैठे । हजरतगंज लखनऊ से गुजर रहे थे कि मुख्य चौराहे के पास बाबा जी एकाएक पीछे मुँह कर बोल उठे ओंकार सिंह तूने अभी तक नासिर अली को बहाल नहीं किया ?- (नासिर अली उस समय मुअत्तल थे ।)

उक्त घटना श्री नासिर अली ने स्वयँ अपने मुँह से केहर सिंह जी व सूरज बाबू को लखनऊ में बाबा जी के बार बार मना करने पर भी सुनाई । प्रसंगवश इसके पूर्व तो नासिर अली ने बाबा जी के दर्शन कभी किये भी न थे । पर लगता है अली साहब बाबा जी के पूर्व जन्म के ही परिकर रहे होंगे. - क्योंकि

बाबा जी डी० आई० जी० ओंकार सिंह जी की गाड़ी में बैठे । हजरतगंज लखनऊ से गुजर रहे थे कि मुख्य चौराहे के पास बाबा जी एकाएक पीछे मुँह कर बोल उठे ओंकार सिंह तूने अभी तक नासिर अली को बहाल नहीं किया ?- (नासिर अली उस समय मुअत्तल थे ।) इस पर ओंकार सिंह जी बोले, “हो गया हुजूर! नासिर अली बहाल हो । गया ।" बाबा जी बोले, “कैसे हो गया ? तू तो अभी यहीं है ।" इस पर भी ओंकार सिंह जी बोल उठे, “हो गया बहाल । आपने हुक्म जो कर दिया है ।"

कुछ क्षणों बाद बाबा जी ने फिर पूछ दिया, “ओंकार सिंह ! बता, हमें नासिर अली की याद कैसे आ गई ?” ओंकार सिंह जी क्या उत्तर देते इस प्रश्न का ? चुप ही रहे । वे क्या जानते कि नासिर अली बाबा महाराज का पूर्व का परिकर है (ओर शायद तब अपने अल्लाह से कातर हो दुआ माँग रहा हो !!) बाबा जी अपने प्रश्न पर स्वयं ही हँसते रहे ।

(और अपने इस परिकर को बाबा जी ने पूर्व वर्णित लीला कर अपने को दफा १०६ में गिरफ्तार करवा - पुनः दर्शन दे दिये ।) अपनी आप बीती सुनाते मुरीद नासिर अली ने पुनः कहना प्रारम्भ कर दिया :

तब से मैं हुजूर की याद न भुला सका । और जब भी मेरे ऊपर कोई गर्दिश आती है तब मैं दिन भर फाका (व्रत) करता हूँ और शाम को वजू कर इबादत ( प्रार्थना) वाले कमरे में अपने को बन्द कर दरवाजे खिड़की सब बन्द कर लेता हूँ । फिर हुजूर की याद (ध्यान) करता हूँ तो आप बिना दरवाजा-खिड़की खुले सामने प्रकट (उपस्थित हो जाते हैं मेरी मुसीबत दूर करने और फिर वैसे ही चले भी जाते हैं ।

नासिर अली की अपने पर इस दया की गाथा बाबा जी भी सिर झुकाये सुनते रहे बिना किसी प्रतिवाद के !!

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