नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: कम्बल के अंदर से दो संतरे निकाल मुझको दिए

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: कम्बल के अंदर से दो संतरे निकाल मुझको दिए

श्री वृन्दावन धाम की बात है। बाबा जी अपनी कुटी के सामने वाले बरामदे में बैठे थे । मैं भी एक गोल खम्भे से टेक लिये बैठा था । इतने में एक समृद्ध महिला दर्शनों को आ गई । साथ में एक टोकरी संतरों का भी लाई थी । संतरे इतने बड़े और सुन्दर थे कि किसी का भी मन उन्हें पाने को ललचा उठे । स्वाभाविक था कि मेरा मन भी डोल गया उनमें । पर मैं आश्वस्त था कि अभी बाबा जी, सदा की भाँति, उन्हें फेंक-फेंक कर वितरित करेंगे और मुझे भी कम से कम एक संतरा तो मिलेगा ही ।

परन्तु बाबा जी तो उन संतरों को अपने हाथ से सहलाते भर रहे और बाँटे किसी को भी नहीं । और फिर पूरी टोकरी उसी महिला को थमा दी !! मैं देखता रह गया कि महिला ने भी उस टोकरी को पुनः उसी प्रकार पूरी तरह कस कर एक कपड़े से बाँध लिया । फिर वह चली भी गई । (शायद बाबा जी महिला की संकुचित वृत्ति पढ़ चुके थे ।)

थोड़ी देर में बाबा जी उठे और अपनी कुटी के आगे रखे तखत-आसन पर बैठ गये । याद नहीं कि मुझे उन्होंने बुलाया था या मैं खुद ही पुनः श्री चरणों में पहुँच गया । पर क्षणों बाद बाबा जी ने अपने कम्बल के भीतर हाथ डाला और वहाँ से दो सुन्दर बड़े सन्तरे निकाल कर मेरे हाथ में रख कर बोले, “लो” । (हेमदा)

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