नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएं: जब शिरडी से आये महाराज जी, कही कुछ रहस्य्मयी बातें !

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएं: जब शिरडी से आये महाराज जी, कही कुछ रहस्य्मयी बातें !

वर्ष 1960 की बात है, दिसम्बर आधा बीत चुका था । मैं सुबह साढ़े नौ-दस बजे के करीब गमलों में पौधों की देखभाल में लगा था । इतने में फाटक के बाहर श्वेत-काषाय वस्त्र पहने ३०-३५ वर्ष का एक व्यक्ति आकर खड़ा हो गया जिसके कन्धे से एक झोला लटका था और हाथ में एक पुस्तक-सी थी जिसे मैंने चन्दे की रसीद बुक समझा ।

उसने मुझे इशारे से बुलाया । स्वाभाविक था मेरा सोचना कि चन्दा माँगने आया है । सो एक-दो रुपये देकर उसे टालना चाहा तो वह बोल उठा, “मुझे पैसे नहीं चाहिए । पानी पिला दो ।” (इतनी ठंड में पानी ?) तभी वह बोल पड़ा कि वह शिरडी-आश्रम से आया है ।

शिरडी आश्रम का सुन मैंने फाटक खोला और बाहर ही कम्पाउण्ड में एक आराम कुर्सी लाकर उसे बिठा दिया और अन्दर चला गया पानी लाने । रसोईघर में जाकर पत्नी से ये बात कही तो उन्होंने कहा, “शिरडी-आश्रम से आया है, केवल पानी क्यों दे रहे हो ? द्वादशी है आज, कुछ प्रसाद भी ले जाओ ।” मैंने कहा, “तो तुम्हीं जाओ यह सब लेकर ।"

तब उन्होंने एक स्टील की तश्तरी में कुछ फल और मिठाई रखकर और साथ में पानी का गिलास ले जाकर उसे दिया । प्रसाद पाते पाते वह पत्नी से बातें करने लगा कि वह शिरडी से आया है आप लोग भी वहाँ अवश्य आयें आपके सब मनोरथ पूरे हो जायेंगे आप धर्मात्मा लोग हैं आदि आदि ।

तब पत्नी ने कहा, "बाबा, हम तो पूर्व में ही दीक्षित हो चुके हैं और अब हमें अपने गुरु जी के सिवा और किसी से भी कोई अपेक्षा नहीं है । हमारे गुरुदेव के तो कई आश्रम हैं । हम लोग वहीं जाते हैं। हमारे गुरु जी बाबा नीब करौरी हैं” आदि आदि ।

परन्तु देर हो चुकी थी- हम अवसर चूक गये थे। यही सोचकर संतोष कर लिया कि आये तो किसी रूप में ही सही

तब वह व्यक्ति पुनः बोला, “यह तो बड़ी अच्छी बात है। गुरु-भक्ति से ही सब प्राप्त हो जाता है ।” पुनः बोला, “तुम्हारे तीन बेटे हैं। दो तो ठीक हैं। पर एक कुछ चंचल है। एक और भी बेटा है तुम्हारा जो दूर से तुम्हारी सेवा करता है ।” (उस वक्त इस चौथे बेटे की बात से मेरा तो ध्यान अपने भतीजे रब्बू की ही तरफ गया था।) “अपने तीसरे बेटे से कह देना कि अप्रैल में उसे नया काम मिल जायेगा। पर उसे चेता देना कि साझे में कुछ भी काम न करे, न व्यापार।”

तब पत्नी ने सोचा कि ऐसी बातें कर यह हमें मोहित करना चाहता है, तो बोलीं, “तुम भी तो मेरे बेटे के समान हो। हमें तो अब अपने बाबा जी का ही भरोसा है, वे ही सब संभालेंगे। ये थोड़ी सी तुच्छ भेंट स्वीकार करो।” और उसके झोले में ११) रु० और कुछ फल डाल दिये। जाते जाते वह व्यक्ति हमें पुनः शिरडी आने का निमन्त्रण दे गया और अपना नाम जगन्नाथ कुलकर्णी बता गया (कि मेरा नाम लेने से वहाँ तुम्हारी सब व्यवस्था हो जायेगी ।)

रसोईघर में लौटकर उस व्यक्ति की कही बातों के विवेचन में एकाएक दोनों के दिमाग में उसके शब्द कि, “एक और भी है जो दूर से तुम्हारी सेवा करता है” कौंध गये !! ये महाराज जी तो नहीं थे ? 'तेरे तीन तो थे ही एक मैं भी हो गया ।' कहा था उन्होंने !! मैं दौड़कर पुनः फाटक के बाहर गया, पत्नी भी पीछे पीछे आईं कहीं भी न दिखा वह व्यक्ति, न आसपास के घरों में था और न मेरे घर से मुख्य सड़क के सम्पर्क मार्ग में (जिसे पार करने में ४-५ मिनट लग जाते हैं) और न उसकी वह बस दिखी जिसके बारे में उसने कहा था, “हमारी बस बाहर सड़क में खड़ी है । "

परन्तु देर हो चुकी थी- हम अवसर चूक गये थे। यही सोचकर संतोष कर लिया कि आये तो किसी रूप में ही सही, (यद्यपि अपने ऐसे अहोभाग्य पर फिर भी शंका बनी रही- मन शंकित वंचित भक्ति धने ।) परन्तु (१) तीसरे लड़के ने फरवरी माह में अपनी पूर्व की हैक्स्ट कम्पनी हमारे अज्ञान में छोड़ दी थी, (२) उसे अप्रैल में सदर्न -पेट्रोकेमिकल्स में एक्जीक्यूटिव पोस्ट मिल गई, (३) इसके पूर्व का अपना साझा व्यापार करने का इरादा भी स्वतः छोड़ दिया उसने !!

- मुकुन्दा

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