नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्त के भेजे प्रसाद के इंतज़ार में कड़कती ठंड में बाहर बैठना

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्त के भेजे प्रसाद के इंतज़ार में कड़कती ठंड में बाहर बैठना

वृन्दावन आश्रम में साँझ का अंधेरा होने लगा था । कुछ ठंड भी बढ़ जाती थी मार्च माह की सन्ध्या के समय । परन्तु तब भी बाबा जी महाराज, शरीर क्लान्त होने पर भी, बाहर खुले में तखत पर बैठे ही रहे । उधर इशारे से मोहिनी माई बाबा जी को कुटी में पहुँच जाने को कह रही थीं (कि ठंड हो चली है) पर बाबा जी बैठे ही रहे।

मेरा पहला अनुभव था यह उस शनिवार को आगरा से आने पर । सोचता रहा। - कौन आ रहा होगा ऐसा खास कि बाबाजी ठंड में भी बाहर बैठे हैं तभी एक छोटा लड़का आ गया हाथ में एक कटोरदान-नुमा डिब्बा एक कपड़े में बाँधकर लिये । आकर उसने प्रणाम किया और वह बँधा डिब्बा आगे बढ़ा दिया। बाबा जी ने उसे स्वयं ही अपने हाथों से खोला। मैंने देखा उसमें दो मिस्सी रोटियाँ हैं और कुछ हरी सब्जी ।

बाबा जी ने उन्हें वहीं बैठे बैठे पा लिया सबके सामने !! और फिर उसी डिब्बे में सेवानन्द जी से प्रसाद मँगवाकर भर दिया तथा अपने ही हाथों से बन्दकर उसी कपड़े से बाँध भी दिया। तब उसे लड़के के हाथ में देते हुए कहा, “अब जा बेटे, ठीक से जाना।” और मेरे अनुमान से बाहर तखत पर तब तक बैठे ही रहे जब तक लड़का दूर गाँव में अपने घर न पहुँच गया होगा।

यह लीला मैंने उसके बाद कई बार देखी जब जब मैं शनिवार-इतवार को अथवा अवकाश की अवधि में बाबा जी के श्री चरणों में वृन्दावन आश्रम में होता था। कभी कभी मुझे भी वह प्रसाद मिल जाता था, और कभी हाथ फैलाने पर भी मना हो जाती थी । कितने प्रेम-भाव से बनाकर भेजती होगी उस दानी नाम के लड़के की माँ वे रोटियाँ बाबा जी के लिये ? तभी तो !! (और अब जवान दानी मिस्सी रोटी श्री माँ की सेवा में भी अक्सर ले आता है उनके वृन्दावन प्रवास के मध्य )

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