नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: जब महाराज जी ने ग़ुस्साए भक्ति की मक्का बारिश से बचायी

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: जब महाराज जी ने ग़ुस्साए भक्ति की मक्का बारिश से बचायी

(स्व०) श्री ओंकार सिंह, डी० आई० जी० कुछ माली नुकसान पूर्व में उठा चुके थे। बहराइच के अपने फार्म में उन्होंने बड़ी आशा से मक्का बोई थी कि कुछ क्षति-पूर्ति हो जाये। मक्का कट कर सूखने को खलिहानों में पड़ी थी जिसका वे गोरखपुर से आकर निरीक्षण कर रहे थे । तभी एकाएक बादल घिर आये और बूँदा-बाँदी भी शुरू हो गई ।

ओंकार सिंह जी हताश हो गये कि अब मक्का काली पड़ जायेगी जानवरों के काम की भी न रहेगी । वर्षा का प्रकोप बढ़ता देख वे एकाएक खड़े हो गये और मक्के की तरफ (समेट कर फेंकने की मुद्रा में) हाथ हिलाते रोषपूर्ण शब्दों में जोर से बोल उठे, “ले जा, ले जा, इस साले को भी ले जा ।” उनका यह रोष बाबा जी के प्रति ही था जिन्हें वे ऐसे कठिन अवसरों पर सदा याद करते थे ।

रोष व्यक्त करते ही उनके खलिहान में तो वर्षा बिल्कुल बन्द हो गई (और मक्का बच गई) यद्यपि आस-पास के क्षेत्रों में होती रही । मानो उनके खलिहान के ऊपर बाबा जी ने एक अदृश्य छतरी तान दी हो !! अपने मित्र श्री केहर सिंह जी को ओंकार जी ने यह लीला अश्रुप्लावित होकर सुनाई ।

बहुत बाद में श्री केहर सिंह जी ने जब बाबा जी से कहा कि, “महाराज, आपने ओंकार सिंह की मक्का बचा दी”, तो वे बोले, "हम क्या करते ?” (और फिर स्वयँ खड़े होकर ओंकार सिंह जी की तरह हाथ हिलाते बोले,) “वह गुस्से में बोला ले जा, ले जा, इस साले को भी लेजा ।” (बाबा जी ने कब और कैसे देखा ओंकार सिंह जी को यह सब करते ?)

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