नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्त की मरणास्सन पत्नी को जीवित किया

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्त की मरणास्सन पत्नी को जीवित किया

करीब चालीस वर्ष पूर्व - मेरी पत्नी बहुत बीमार हो गई । बचने की कोई उम्मीद नहीं रह गई थी । मेरे पास एक ही आसरा रह गया था महाराज जी का निरन्तर स्मरण । पत्नी के लिए दवा लेने गया तो रास्ते में किसी से पता चला कि महाराज जी बरेली आये हैं।

मैंने दवाखाने में डाक्टर का नुस्खा दिया और कहा कि घर भिजवा देना दवायें। खुद मैं डाक्टर भण्डारी के घर भाग लिया, पर वहाँ महाराज जी नहीं मिले । आठ बजे रात तक एक पेड़ के नीचे बैठा उन्हीं की याद करता रहा। तब एक व्यक्ति से पता चला कि बाबा जी कमिश्नर, लाल साहेब के घर पर हैं। मैं भी रिक्शा से वहीं पहुँच गया। परन्तु चपरासी ने भीतर नहीं जाने दिया।

मैं बाहर ही महाराज जी को दीनता से पुकारता रहा अन्तर में और तभी महाराज जी बाहर निकल आये मेरी आर्त पुकार सुनकर और कहा, रिक्शा चला. तेरे घर चलते हैं ।" लाल साहब ने लाख कहा पर महाराज जी उनकी कार में नहीं बैठे । रिक्शे में ही हम घर आ गये। घर पहुँचकर महाराज जी सीधे मेरी पत्नी के कमरे में पहुंचे और उनके पलंग के पास ही एक कुर्सी पर बैठ गये ।

तभी उन्होंने अपने चरण उठाकर पलँग पर रख दिये । पत्नी ने प्रयास कर किसी तरह अपना सिर उठाकर चरणों में माथा छुवा दिया और इसके साथ ही उनकी रही-सही नब्ज भी छूट गई ।। मेरे पिता और बेटे हाहाकार कर रो उठे पर बाबा जी चिल्लाकर बोले. नहीं, मरी नहीं है - आनन्द में है।" और ऐसा कह पत्नी के गाल पर चपत मारी । आधे घंटे के भीतर नब्ज वापिस आ गई !!

तब साढ़े दस बजे रात बाबा जी ने हिमालया कम्बल माँगा। श्री दयानारायन खत्री जी की दुकान से कम्बल आ गया जिसे बाबा जी ने खुद ओढ़ लिया और अपना ओढ़ा हुआ कम्बल पत्नी के ऊपर डालकर चले गये। बाबा जी दूसरे दिन फिर आये और पत्नी की नब्ज उनके चरण छूते ही फिर छूट गई !! तब महाराज जी बोले, "माई हमें बहुत परेशान करती है । हमें बैठना पड़ जाता है ।"

इसके बाद तो पत्नी बिना इलाज-पानी के ही पूर्णतः स्वस्थ हा गईं। (प्यारेलाल गुप्ता | बरेली - १६६१)

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