नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: शिमला में सपने में मंत्र दान

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: शिमला में सपने में मंत्र दान

सदगुरु रूप में बाबा जी महाराज अत्यन्त आतुर भक्त अथवा जिज्ञासु को मंत्र-दान भी दे देते थे जाप हेतु (मुझे भी दिया श्री राम नवमी-१९७३ को वृन्दावन में ।) परन्तु इस मंत्र-दान के लिये न तो किसी विशेष व्यवस्था अथवा विधि-विधान की अनिवार्यता होती थी और न किसी । पर्व, लग्न अथवा समय (यथा ब्राह्म बेला, प्रातः, सायं आदि) किसी गुरु-दक्षिणा की, और न अपने प्रति गुरु-भाव की ही !! केवल मन्त्र प्राप्तकर्ता का कल्याण ही सर्वोपरि रहता था ऐसे मंत्र दान की क्रिया में ।

बाबा जी महाराज का मंत्रों के बारे में एक महा-कथन यह भी था, जैसा कि उन्होंने माँ से कहा था - "समय न मिले, सावकाश न हो, तो भी चलते फिरते भी मंत्र जपते रहना चाहिए ।"

और कभी कभी ये मन्त्र किसी व्यक्ति विशेष को अथवा (उसके माध्यम से) किसी अन्य के कल्याणार्थ भी उसके स्वप्न में या अर्धचेतन अवस्था में प्रगट होकर दे देते थे बाबा जी । ऐसे मन्त्र-दान का एक अनुभव श्रीमती गिरिजा देवी, रानी साहेबा (भद्री) ने मुझे कैंची धाम में सुनाया । (यहाँ यह कह देना अप्रासंगिक न होगा कि तब (१९५५) रानी साहेबा स्वयं में श्री आनन्दमयी माँ की अनुगामिनी, भक्त एवं शिष्या थीं यद्यपि राजा साहेब, श्री बजरंग बहादुर जी के बाबा महाराज का भक्त होने के कारण वे बाबा जी को भी बहुत मानती थीं ।)

अतः कुछ समय बाद मैने ये दोनों मन्त्र माँ आनन्दमयी के दर्शन होने पर उन्हें दिखाये तो उन्होंने इनकी शुद्धता की पुष्टि कर दी।

जनवरी १९५५ की बात है । मेरे पति, राजा साहेब जो उस समय लेफ्टिनेन्ट गर्वनर के पद पर शिमला में थे। ४ जनवरी को भीषण रूप से बीमार पड़ गये - बहुत तेज ज्वर हो गया उन्हें । डाक्टरी इलाज बेअसर हो रहा था । शिमला में तब एक सप्ताह से बर्फ गिर रही थी ठंड थी । उधर पं० नेहरू ने भी उन्हें कुछ गम्भीर परामर्श हेतु दिल्ली आने को कह दिया । हम दोनों चिन्ताग्रस्त थे कि कैसे क्या होगा। राजा साहेब जिद बाँधे थे कि ऐसे में ही दिल्ली जायेंगे !!

५ जनवरी की रात वे तेज बुखार में बेहोश-से पड़े थे । हमारा शयन कक्ष बहुत बड़ा था और दोनों की पलंगों के बीच एक मेज पर टेबुल लैप, कापी (पैड) और कलम रखे थे । बाहर निकलने को एक बहुत बड़ा दरवाजा था जिसके आधे भाग में मोटा शीशा लगा था । दरवाजा भीतर से बंद था ।

तब आधी रात के लगभग अपनी अर्धसुप्तावस्था में मैंने देखा कि एक छाया उस बन्द दरवाजे के भीतर प्रवेश कर रही है और धीरे धीरे मेरे पलंग के पास आ गई । तभी मुझे सुनाई दिया कि वह छाया कोई मंत्र-सा कह रही है जिसे सात बार दुहराया गया । मैं स्वप्न की-सी अवस्था में, अर्धचेतना में लेटे-लेटे ही सब सुन रही थी। छाया ने स्पष्ट शब्दों में कहा, भुलना मत, एक माला सुबह, एक माला शाम को अवश्य जपना, तेरा पती (पति) ठीक हो जायेगा ।"

परन्तु मुझे अर्धचेतना में लेटे देख शायद उस छाया को विश्वास नहीं हुआ कि मुझे यह सब याद रहेगा । तब उसने मुझे उठाकर बैठा दिया । मैं पुनः लेट गयी । छाया ने मुझे पीठ के सहारे फिर उठा कर बैठा दिया पर मैं फिर से लेट गई । अबकी छाया ने मुझे तीसरी बार उठाकर बैठा दिया तथा दो मन्त्र कहे, और पास के टेबुल से मुझे कलम और कापी देते हुए कहा कि लिख लो ।

किंकर्तव्यविभूढतावश मैने लाचार होकर कलम और पैड लिया और छाया की आज्ञानुसार मन्त्र लिख लिये और पुनः रजाई ओढ़कर लेट गई छाया की ओर देखती । छाया धीरे धीरे बन्द दरवाजे तक पहुँची, मुड़कर मुस्कराते हुए मेरी तरफ देखा और दरवाजे के पार जाकर अन्तर्ध्यान हो गई !!

मैंने शीशों के पार से छनती हल्की रोशनी में स्पष्ट रूप से देखा कि मुस्कराती हुई छाया-रूप में स्वयं बाबा जी महाराज थे जो अक्सर भद्री तथा शिमला आकर राजा साहेब को दर्शन देते रहते थे !! मैं पुनः घोर निद्रा में डूब गई बिना किसी मानसिक हलचल के ॥

सुबह उठकर मैंने पाया कि मेरी कापी में दो मन्त्र लिखे हैं । धीरे धीरे मुझे बीती रात की घटना याद हो आई । परन्तु अर्ध-चेतना में लिखे इन मन्त्रों की शुद्धता पर मुझे शंका हो आई । अतः कुछ समय बाद मैने ये दोनों मन्त्र माँ आनन्दमयी के दर्शन होने पर उन्हें दिखाये तो उन्होंने इनकी शुद्धता की पुष्टि कर दी ।

मन्त्र तो मैंने बाद ही में ग्रहण किये थे, परन्तु महाराज जी की उस प्रकार से उपस्थिति-मात्र के ही फलस्वरूप राजा साहेब दूसरे दिन से ही अप्रत्याशित रूप से स्वस्थ होने लगे !! उसके बाद तो हम दिल्ली भी गये ।। (रानी गिरिजा देवी ।)(बाबा महाराज की सद्गुरु रूप में की गई लीलाएं यत्र-तत्र एवं दशम पुष्पाञ्जलि में भी उपलब्ध हैं । महासमाधि के बाद भी स्वप्न में मंत्र-दान की गाथायें तृतीय सर्ग में दी गई हैं ।)

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