नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: शरीर छोड़ने के बाद बीमार भक्त को कैंची बुला रोगमुक्त किया

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: शरीर छोड़ने के बाद बीमार भक्त को कैंची बुला रोगमुक्त किया

हल्द्वानी के देसी घी के बड़े व्यापारी श्री नन्दलाल जी ने बाबा जी की शरीर लीला के बाद कैंचीधाम आना छोड़ दिया यह सोचकर कि अब तो बाबा जी नहीं रहे । वैसे भी उनके अपने गुरु समता सत्संग के प्रवर्तक श्री मंगतराम जी थे । परन्तु बाबा जी उन्हें कहाँ छोड़ने वाले थे ? वर्ष १९७४ में कई दिन के खाँसी, जुकाम और बुखार के कारण डाक्टरों ने उन्हें टी०बी० से पीड़ित घोषित कर दिया (यद्यपि देखने में बाह्य रूप से आप साधारण तौर पर ठीक ही लगते थे ।)

आपने इस रोग के निदान की पुष्टि हेतु भोवाली सेनेटोरियम में अपना परीक्षण करवाया । वहाँ भी डाक्टरों ने सभी प्रकार के परीक्षणों के बाद पूर्व के डाक्टरों द्वारा किये गये निदान की पुष्टि कर दी तब अत्यन्त दुःखी और हताश होकर जब ये भोवाली से लौटने को हुए तो (बाबा जी की प्रेरणावश) इनकी पत्नी ने कैंची धाम में मत्था टेकने की इच्छा प्रगट की । आप कैंची आ गये ।

मन को दुश्चिन्ताओं ने तो घेर ही लिया था । महाराज जी का कौतुक प्रारम्भ हो गया । जब बाबा जी के कक्ष में श्रीमती नन्दलाल भारी मन लिये बाबा जी के आसन में माथा टेक प्रणाम कर रही थीं तो महाराज जी की स्पष्ट वाणी में उन्हें आदेश सुनाई दिया “कैंची क्यों नहीं आते ? आया करो।” श्री माँ को जब यह घटना उन्होंने सुनाई तो माँ ने नन्दलाल जी की बीमारी का कारण कैंची न आना ही बताया, और साथ में कहा कि, “अब नन्द लाल जी बिल्कुल ठीक हो जायेंगे ।”

यही हुआ भी। बाबा जी ने तो नन्दलाल जी का टी० बी० उक्त वाणी के साथ ही खत्म कर दिया था। केवल औपचारिकता शेष रह गई थी। सो वह भी दिल्ली जाकर पूरी हो गई। वहाँ जब टी० बी० विशेषज्ञों को नन्दलाल जी ने हल्द्वानी तथा टी० बी० सेनेटोरियम की रिपोर्ट और एक्स-रे दिखाये तो उन्होंने पूर्व के सभी निदानों को पुनः परीक्षण के उपरान्त नकार दिया !! और केवल तीन दिन के लिये सर्दी-जुकाम की दवायें नन्दलाल जी को देकर विदा कर दिया । नन्दलाल जी पूर्णतया स्वस्थ हो गये !!

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