नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ : जब एक अनजान व्यक्ति कुम्भ में हनुमान आश्रम पहुँच गया

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ : जब एक अनजान व्यक्ति कुम्भ में हनुमान आश्रम पहुँच गया

वर्ष १९६६ के कुम्भ की बात है । मैं महाराज जी के साथ कार में से प्रयाग को जा रहा था । फतेहपुर से आगे निकल चुके थे हम। कानपुर सड़क पर यातायात पूरे जोर पर था और पैदल यात्रियों तथा सवारियों की भीड़ चल रही थी । तीन बज चुके थे अपरान्ह के । इतने में बाबा जी बोले “उस आदमी को (गाड़ी में) बिठा लो ।”

मैंने देखा कि आगे जाते सिर पर एक गठरी लिये आदमी को महाराज इंगित कर रहे हैं। गाड़ी उसके पास रुकवाकर मैंने उससे आग्रह किया कि वह भी गाड़ी में बैठ जाये । परन्तु उसने यह कहकर मना कर दिया तीर्थयात्रा पैदल ही की जाती है और वह भी कुम्भ यात्रा पैदल ही करेगा । तब बाबा जी ने उससे यूँ ही कह दिया कि, “हमारे अन्नक्षेत्र में आना ।”

(महाराज जी की इच्छानुरूप भक्तों द्वारा उन्हीं की शक्ति पा एक अन्न-क्षेत्र स्थापित कर दिया गया था गंगा-क्षेत्र में ।) हम आगे बढ़ गये । इलाहाबाद पहुँचकर दादा मुखर्जी के घर कुछ देर रुककर हम कुम्भ-क्षेत्र को चले गये । वहाँ पहुँचकर मुझे यह देखकर महान आश्चर्य हुआ कि वही व्यक्ति अपनी गठरी लेकर बाबा जी के हनुमान-आश्रम में मौजूद है !! न महाराज जी ने उसे बताया था कि हम कौन हैं और न अता-पता ही दिया था अपने अन्न-क्षेत्र का, न इस अन्न-क्षेत्र का नाम ही बताया था ।

और फिर महाराज जी का तो स्वयं उस अन्न-क्षेत्र में कहीं नाम तक नहीं था । क्षेत्र की पहिचान केवल एक झंडा था हनुमान जी की आकृति लिये । वह अन्न-क्षेत्र भी न तो बहुत बड़ा था न अन्य बीसियों अन्न क्षेत्रों की तरह ख्याति प्राप्त । उस बड़े कुम्भ-क्षेत्र में, जो मीलों तक गंगा जी के दोनों किनारों में फैला था, बिना किसी जानकारी के इस हनुमान क्षेत्र का पता लगाना साधारण बात न थी । अस्तु, उक्त परिस्थितियों में उसका हमसे भी पूर्व वहाँ पहुँच जाना एक चमत्कार ही था ।

पर हम न भी जानें, बाबा जी तो जानते ही थे वह व्यक्ति कौन था— साधारण मनुष्य था या कोई पहुँचा हुआ संत जो बिना किसी के बताये बाबा जी महाराज को स्वयं भी पहिचान गया और बाबा जी के साधारण-से निमन्त्रण पर ही पहुँच गया उनके पास !! (देवकामता दीक्षित)

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