नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: एक बालिका के निश्छल प्रेम की भी तड़पन महाराज जी को विचलित कर गई

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: एक बालिका के निश्छल प्रेम की भी तड़पन महाराज जी को विचलित कर गई

बहुत छोटे थे तब मैं और मेरी बहिन । बाबा जी आते रहते थे हमारे घर/निवास भी करते थे वहीं कुछ दिन । एक बार ऐसे ही आये नैनीताल परन्तु फिर बजरंगगढ़ से सीधे चले गये पर कहाँ ? पता न था । जब मुझे मालूम हुआ कि महाराज जी चले गये तो मैं बिलख बिलख कर रोने लगी ।

माँ ने बहुत समझाया कि महाराज जी फिर आयेंगे । परन्तु पता नहीं क्यों, मेरे अन्तर में महाराज जी के ऐसे चले जाने पर कुछ ऐसी चोट लगी कि मैं अपने को संयत नहीं कर पाई और रोती रही। यहाँ तक कि रात को मैंने खाना भी नहीं खाया माँ-पिता के लाख समझाने पर भी । ऐसे ही सो गई ।

सुबह न हो पाई थी। रात्रि के तीसरे प्रहर में ही दरवाजे पर दस्तक पड़ी । माँ ने दरवाजा खोला तो महाराज जी खड़े थे वहाँ !! स्वयं भीतर आ गये यह कहते हुए, “कहाँ है हमारी लड़की ? वह भी भूखी हैं हम भी भूखे हैं । लाओ रोटी ।” मैं भी जाग गई और महाराज जी से लिपट गई । माँ ने मेरे लिए रखी चार रोटियाँ और आलू-टिमाटर की सब्जी गरम कर एक थाली में लाकर महाराज जी के सामने रख दीं दो मैंने खाईं और दो महाराज जी ने खा लीं !!

तभी बोले, “हमारी लड़की भूखी थी, ताई सों हमें बरेली से वापिस आना पड़ा ।” आज भी महाराज जी की मेरे प्रति (उस कच्ची अवस्था में) ऐसे वात्सल्य की याद मुझे विभोर कर देती है यद्यपि (तब) उनके इस भाव को मैं पूरी तरह न ग्रहण कर पाई थी। (रजनी जोशी)

(एक अज्ञान बालिका के निश्छल प्रेम की भी तड़पन बाबा जी को विचलित कर गई ।)

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