नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी कब, किस पर, कैसी दया की वर्षा कर दें, कुछ कहा नहीं जा सकता था

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी कब, किस पर, कैसी दया की वर्षा कर दें, कुछ कहा नहीं जा सकता था

मेरे बड़े भाई (नानक स्वीट हाउस, हल्द्वानी के मालिक) अक्सर बाबा जी महाराज के दर्शन हेतु कैंची धाम जाया करते थे। एक बार कन्या के विवाह के उपलक्ष में प्रसाद चढ़ाने वे नैनीताल बजरंगगढ़ गये बाद में कैंचीधाम महाराज जी के दर्शनों के लिये भी पहुँच गये मैं भी बाबा जी के दर्शन हेतु जाना चाहता था परन्तु, चूँकि मैं बहुत बातूनी था, मेरे परिवार वालों को मुझे साथ ले जाना पसन्द न आया ।

जब ये बाबा जी के पास पहुँचे तो उन्होंने मेरे बड़े भाई से मेरे लिये कहा, “उसको क्यों नहीं लाये ?” तो मेरे परिवार वालों ने कहा कि मैं बहुत बात करता हूँ । पर बाबा जी बोले, “तो क्या हुआ ? अगले हफ्ते उसे जरूर लाना ।”

मेरी माली हालत बहुत खराब थी, काम धन्धा कुछ था नहीं । बड़े भाई की दुकान में उनके कर्मचारी की हैसियत से काम करता था । अगले हफ्ते बड़े भाई के साथ कैंचीधाम गया । अन्य बातों के अलावा महाराज जी ने मुझसे कहा, “मैं तुझसे जो माँगूगा, लायेगा ?” मैंने कहा, “अगर हिम्मत (मेरी शक्ति के भीतर) हुई तो जरूर लाऊँगा ।”

तब बाबा जी ने कहा, “देख, सवा मन देसी घी के लड्डू अपने हाथ से बनाकर लाना हुनमान जी के लिये । बोल, लायेगा ?” मैं मन ही मन बोल उठा, “अरे ये क्या कह दिया आपने। मेरे पास तो सवा किलो आटा भी अपना नहीं हैं” फिर भी मेरे मुँह से निकल गया, “अच्छा, महाराज जी ।” वापिस हल्द्वानी आ गया ।

कराया तो सब कुछ महाराज जी ने ही, मैं तो केवल मशीन बना रहा, पर जैसे तैसे मैंने दो तीन हफ्तों में सवा मन लड्डू अपने हाथ से तैयार कर लिये और उन्हें लेकर बाबा जी के पास हाजिर हुआ । किन्तु मेरे कैंची धाम पहुँचते ही आप भीतर कमरे में चले गये और पन्द्रह मिनट बाद ही बाहर आये । लड्डुओं का भोग लगवाकर मेरे ही हाथ से सबको प्रसाद पवाया ।

इसके बाद मैं एक बार फिर महाराज जी के दर्शनों को गया । उस समय भण्डारे का काम चल रहा था । मैंने भी सेवा की इच्छा की तो बाबा जी बोले, “यहाँ नहीं, तू अपनी दुकान खोल ।” मैंने महाराज जी से कहा, “महाराज जी, मैं तो पागल हूँ। दुकान कैसे करूँगा।” तब बाबा जी ने कहा, “देख, एक तू पागल है और एक मैं पागल हूँ। जा, अपना काम शुरू कर ।” और मुझे एक गीता की पुस्तक देकर कहा कि, “अपनी घरवाली को दे देना। कहना, पढ़ा करे।” न मालूम क्या अर्थ थे इसके ।

बाबा जी ही जानें कि कैसे कैसे, क्या क्या, कहाँ कहाँ से हो गया, पर उनके चमत्कार स्वरूप आज मेरे पास एक बड़ी दुकान (स्टैन्डर्ड स्वीट हाउस) है । और जिस हैसियत (फकत कर्मचारी) से मैं स्वयं काम करता था, उसी हैसियत के दस कर्मचारी आज मेरी दुकान में काम करते हैं !! बाबा जी की दया ही दया है ।

-- लाला राम किशन, हल्द्वानी

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