नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: कितना कोमल दण्ड था आज्ञा उल्लंघन का यह ?

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: कितना कोमल दण्ड था आज्ञा उल्लंघन का यह ?

रवीन्द्र कुमार जोशी (रब्बू) की मेरठ में शादी तय हुई थी । तब महाराज जी इलाहाबाद में ही थे । चूँकि रब्बू के पिता, हेमदा रेलवे में इन्सपेक्टर थे (तथा उनके लिये रेल का डिब्बा रिजर्व करा लेना कठिन न था) महाराज जी ने दो-तीन बार इन दोनों से कहा, "गाड़ी से जाओ ।" 66 पर ये दोनों ही बस द्वारा मेरठ जाने पर कटिबद्ध रहे । उसके बाद महाराज जी भी अन्यत्र चले गये थे । जाते वक्त भी कह गये थे, "दो बजे तक चले जाना ।"

परन्तु ६ मार्च १६७० (महाशिवरात्रि) के दिन ३.३० बजे बाद ही बारात प्रस्थान कर पाई । आधे मार्ग के बाद ड्राइवर ने लखनऊ पहुँचने की जल्दी में गाड़ी की रफ्तार ७०- ८० किमी० प्रति घण्टा कर दी । सूर्यास्त होने जा रहा था कि रायबरेली के करीब मुन्शीगन्ज (दरियापुर) के

पास एक पूरे मोड़ पर ड्राइवर ने बस की गति नियन्त्रित किये बिना ही स्टीयरिंग पूरा घुमा दिया । फलस्वरूप, बस ने पहिले दाई ओर स खाया फिर वेग के कारण सीधी खड़ी हुई और फिर बाईं ओर पलट कर लेटी हुई कुछ दूर तक घिसटती चली गई, पर आगे एक खड्ड के पूर्व ही एकाएक रुक गई ! बस में ३७ प्राणियों में १२ तो बच्चे ही थे ६ से वर्ष की आयु के, ११-१२ बुजुर्ग तथा बाकी युवा । १५

बस के साथ हम पहिले इधर पलटे, फिर उधर । अचानक है क्षणों में सब कुछ हो गया । नियति के इस अप्रत्याशित क्रूर प्रहार से सब सन्न रह गये सामने विंडस्क्रीन का शीशा तोड़ सब एक एक कर बाहर निकले । भीतर रखा सामान निकाला गया ।

बच्चों में एक-दो सयानों को - ही कुछ चोट आई हल्की-सी, पर दो युवक पूरनदा का लड़का सागर तथा रब्बू के मामा, प्रभास को गहरी चोटें आ गई । बस गिरने की भीषणता इसी से ऑकी जा सकती है कि बाकी टूट-फूट के साथ दो मोटे स्टील के बक्से पिच्ची हो गये | परन्तु महाप्रभु की कृपा से, जहाँ ५-६ बच्चे या सयाने काल-कवलित हो सकते थे, वहाँ केवल चोटें ही आई कुछ. को। साथ में बहू के जेवरों तथा कपड़ों के बक्सों को आँच तक न आई ॥

अंधकार बढ़ने लगा था। परन्तु ३५-४० मिनट के भीतर ही एक पुलिस की गाड़ी बन्दूकधारियों के साथ आ पहुँची ! देखकर गाँव वाले खिसक लिये । महाप्रभु की पहली कपा गजेन्द्र-मुक्ति हेतु पुनः १५-२० मिनट बाद एक वस भी आ पहुँची । हम लखनऊ पहुँच गये साढ़े नौ बजे अपनी पूर्व की निर्धारित धर्मशाला में ।

सामान एक जगह एकत्र करते करते हमें आसपास के लठैत गाँव वालों ने घेर लिया । रात बहुत दूर न थी । इलाका आज भी अपने आराजक तत्वों के कारण मशहूर है । अपनी इस लाचार स्थिति में हमारे पास महाप्रभु को सहायतार्थ याद करने के सिवा और कोई चारा न था, और तभी बाबा जी का रक्षा-कवच चल पड़ा हमें उबारने । एक जीप आकर उलटी हुई बस तथा भीड़ से अवरुद्ध मार्ग में रुक गई और उसम से उतरे मेरे मामा जी के पुत्र, डा० ए० डी० पंत तथा डा० गोवर्धन शर्मा (जो www.thenewsagency.in जा रहे थे यूनिवर्सिटी में साक्षात्कार-परीक्षा लेने, पर जिन्ह देर हो गई थी घर से निकलते निकलते डेढ़ बजे के स्थान पर साढ़ चार बजे ही निकल पाये !!)

उन्होंने जब हमें देखा तो उनके आश्चर्य के साथ कुछ पूछने के पूर्व मैंने उनसे कहा, "आप शीघ्र रायबरेली पहुँच कर पहले एक पुलिस दस्ता यहाँ भिजवा दीजिए, और फिर किसी तरह लखनऊ तक जाने हेतु एक बस । सागर और प्रभास को साथ ले जाकर इन्हें लखनऊ में अस्पताल में भर्ती करा दीजिए ।" वे दोनों चारों तरफ का वातावरण देखकर वस्तुस्थिति से अवगत होते ही बिना अधिक विलम्ब के रायबरेली चले गये सागर और प्रभास को लेकर ।

अंधकार बढ़ने लगा था। परन्तु ३५-४० मिनट के भीतर ही एक पुलिस की गाड़ी बन्दूकधारियों के साथ आ पहुँची ! देखकर गाँव वाले खिसक लिये । महाप्रभु की पहली कपा गजेन्द्र-मुक्ति हेतु पुनः १५-२० मिनट बाद एक वस भी आ पहुँची । हम लखनऊ पहुँच गये साढ़े नौ बजे अपनी पूर्व की निर्धारित धर्मशाला में ।

इधर उसी रात डेढ़ बजे रायबरेली के स्टेशन मास्टर ने प्रयाग स्टेशन को टेलीफोन से इस दुर्घटना की खबर भेज दी, और प्रयाग वालों ने स्टेशन कम्पाउंड में स्थित हेमदा के बंगले में रबू की माँ को भी सूचित कर दिया । घर में कुहराम मच गया सभी के लाडले एवं सुहाग बारात में गये थे । तब भाभी सुबह तड़के ही बहुत सारी मात्रा में प्रसाद लेकर श्री सिद्धी माँ के पास उनके प्रवास पर जा पहुंची और रोकर उनसे सब हाल बताया । मों ने आश्वासन दिया उन्हें कई प्रकार से कि. "रब्यू की माँ, चिन्ता न करो । महाराज जी सब कुछ ठीक करेंगे ।"

और उनके इस आश्वासन की पुष्टि हेतु ही तुरन्त ही नीचे से आवाज आई एक फकीर की भिक्षा हेतु । पहिले तो माँ ने कुछ द्रव्य भेज दिया ऊपर से ही डलवाकर, पर शीघ्र ही उनके मस्तिष्क में बाबा जी के शब्द कौंध गये "हनुमान जी गदा लेकर अपने ही रूप में थोड़े ही आयेंगे तुम्हारे पास ? वे या तो (दुरवेष में) भिखारी बनकर आयेंगे या कोडी बनकर ।" और तब माँ ने भाभी द्वारा लाया प्रसाद ढेर मात्रा में उस फकीर की सेवा में भिजवा दिया तभी बड़ी ऊँची आवाज में फकीर का अशीर्वाद आया नीचे से, "जिसका यह प्रसाद है उसका बाल बांका नहीं होगा ।"

और दूसरे ही दिन महाराज जी भी भाभी को संबल देने पहुँच गये। बोले, “हम देखकर आये हैं । सब ठीक है । अब वे गाड़ी से जायेंगे । हम दूसरे दिन रेलगाड़ी से ही मेरठ गये । स्टेशन स्टाफ के सौजन्य से मुसाफिरों से लदी गाड़ी में हमें एक पूरा डिब्बा आराम से सोते हुये जाने को मिल गया गाड़ी से जाओ कहा था बाबा जी ने । आज्ञा की अवहेलना का फल मिल चुका था । और तब लौटे भी हम ट्रेन से ही । रब्बू और उसकी बहू को स्टेशन से लिवाने बाबा जी ने अपनी जीप भेज दी थी । तब रब्बू और मैं उनके श्री चरणों में लिपट इस रक्षा-लीला से विभोर हुये खूब रोये । (मुकुन्दा)

कितना कोमल दण्ड था आज्ञा उल्लंघन का यह ?

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