नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: लीलाओं के माध्यम से भक्तों का मार्ग दर्शन

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: लीलाओं के माध्यम से भक्तों का मार्ग दर्शन

दृष्टान्त युक्त सीखो द्वारा अथवा अपनी लीलाओं के माध्यम से बाबा जी महाराज अपने परिकरों का मार्गदर्शन करते रहते थे । एक दिन दरबार में अपने एक भक्त की बात सुनाने लगे । (संदर्भ था एक वृद्धा माँ द्वारा अपनी बहू-बेटे की शिकायत !) हमारा एक भगत था, रिटायर हो गया था । पत्नी थी नहीं । उधर तेज स्वभाव की बहू आ गई थी । सो उसने लड़के को भी खिलाफ कर दिया अपने बाघ के । एक बुड्ढा एक कमरे में अलग रहकर खुद पकाने. खाने लगा, पर दुःखी रहता था ।

हमसे अपनी सब कह देता था । महीनों बाद हम फिर गये उसके पास तो देखा बड़ा खुश है बुड्ढा । हमने पूछा तो बोला, "महाराज ! हमने सोचा कि बेटा-बहू तो अपने ही हैं । हमें ही इनकी-सी करनी चाहिए । सो एक दिन हमने एक साड़ी लाकर बहू को दे दी । कहा - बहू, पेंशन के पैसे बचे थे, मैं क्या करता इनसे । सो तुम्हारे लिये यही ले आया । सो बाबा, शाम को बहू दरवाजे पर आई बोली लाइये बाबूजी, सब्जी मैं काट दिया करूंगी ।

हमने भी उसे सब्जी की टोकरी-चाकू दे दिये। एक दो महीने बाद हमने एक साड़ी लाकर और दे दी । अब तो हमारी चाय भी भीतर से आने लगी और फिर बहू हमारा खाना भी पकाने लगी। लड़का भी कमरे में आकर बातें करने लगा । फिर एक दिन बोला दो-दो जगह खाना बनाकर क्या फायदा। आप हमारे ही साथ खा लिया कीजिए। सो महाराज, अब हम बहुत सुखी है। पर हम भीतर ज्यादा आते-जाते नहीं । जो मिलता है, खा लेते हैं कमरे में ही ।"

इसके बाद महाराज जी ने मतलब-भरी मुस्कराहट के साथ दरबार में उपस्थित कुछ बुड्ढे-बुढियों की तरफ देखा और कहा, "बुड्ढा बहुत चल्लाक (चालाक) निकला ।" सास-ससुर को लड़के-बहू के साथ कैसे रहना चाहिए, इशारे से बता दिया। परन्तु तभी उपस्थित युवक युवतियों की तरफ देखकर यह भी कह दिया, “बुड्ढे बिना तनख़्वाह के चौकीदार होते है घर के ।" और भी कि, “घर में बुड्ढों के होने से मर्यादा बना रहती है।"

और यदा-कदा बुड्ढों को नौन-मौन-कौन रहना चहिए भी कहते रहे – (जो मिले संतोष से खायें, लड़के-बहू की गृहस्थी में हस्तक्षेप न करें, और अधिकतर सबसे दूर कोने में पड़े रहें ।)

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