नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: इन आँखों को जो सुख मिला

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: इन आँखों को जो सुख मिला

प्रातः स्मरणीय पूज्य सन्त शिरोमणि बाबा नीबकरौरी महाराज के सान्निध्य में प्रत्यक्षतः तो कभी नहीं आ पायी । किन्तु पूर्व जन्मार्जित सुकृतों के परिणामस्वरूप जीव को जो सुख आनन्द और शान्ति मिलती है; उसी के अनुरूप संभवतया मुझे बाबा के नाम रूप लीला और धाम के दर्शन हुए। नाम और रूप में से कभी पहले रूप के दर्शन होते हैं तो कभी पहले नाम के ।

नाम सुना जाता है, रूप देखा जा सकता है, इसी तरह लीला और धाम के दर्शनों की स्थिति है बाबा नीब करौरी महाराज का हमने कभी नाम नहीं सुना था पता नहीं क्यों आज से 15 वर्ष पूर्व हम दम्पत्ति के मन में विचार जगा कि "मैरिज सेरेमनी" की वर्षगाँठ कुछ इष्ट मित्रों के साथ धूम-धाम से मना ली जाये, इस प्रसंग को हमको डाक्टर रामकृष्ण जी शर्मा के भी प्रथम बार दर्शन हुए, वे उस समय कासगंज में आये ही आये थे।

सुकवि विचारक होने के नाते हमने उनका स्वागत किया था तो वे हमें उपहार स्वरूप महाराज जी की छवि प्रदान करके गये। हमने उसे किसी धर्म ग्रन्थ में रख दिया। यहाँ रूप के दर्शनों का प्रभाव इतना विलक्षण रहा कि 15 वर्ष भाद महाराज जी ने हमें अपनी लीला दिखा दी। हमारे पतिदेव श्री हीरा लाल चोला के मित्र श्री प्रमोद चन्द्र गुप्त एडवोकेट जो महाराज जी के कैंची आश्रम से विगंत सात-आठ वर्षों से जुड़े हैं और जिनका माध्यम भी डाक्टर शर्मा जी रहे, उनके बिना पूर्व सम्पर्क किये हम दोनों प्रमोद जी के साथ चल दिये और बाबा की कृपा से कैंची (नैनीताल) की यात्रा बड़ी ही सुविधा से टैक्सी द्वारा सम्पन्न हुई।

इन आँखों को दर्शन का जो सुख मिला वह अपूर्व था। कितना सार्थक हो गया यह कबीर कथन मुझ जैसी अबोध के लिए- नैनों अन्तर आव तू, नैन झाँपि तोहि लेखेँ । ना मैं देखौं और कूँ ना तोहि देखन देखेँ ।

जिसकी हमें कोई परिकल्पना तक नहीं थी। हमने जाकर महाराज के पवित्र धाम कैंची आश्रम में प्रवेश किया तो लगा कि हम अपने अति परिचित परिवेश में आ गये हैं। अपनत्व की वर्षा ने हमें आपादमस्तक अभिषिक्त कर दिया। महाराज श्री के विग्रह के दर्शन करते समय ऐसा अनुभव हुआ कि मुझे बाबा दर्शन दे क्यों नहीं रहे, लगा कि आँखों के इस स्वरूप में स्पष्ट आकृति नहीं मिल पायी है।

मैंने नमन किया और आश्रम की सहज प्रवाहित क्रियाओं की ओर उन्मुख हुई। भण्डारे समाप्ति के बाद जब भक्तगण अपने-अपने घर जाने हेतु तत्पर होने लगे तो हम भी महाराज से विदा लेने हेतु आये। उस समय मैं क्या देखती हूँ कि महाराज जी के बड़ी-बड़ी आँखें स्नेह आपूरित भाव से मुझे देख रही हैं। मैं भाव विह्वल होकर रो पड़ी। लगा जैसे आते समय मुझे आँखों में बन्द कर लिया और विदा के समय छोड़ रहे हों, अपलक होकर, किन्तु मैं बाबा के स्वरूप को अपनी आँखों में बन्द कर चुकी थी।

!! राम !!

- जगदम्बा चोला, कासगंज

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