नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: प्रतापगढ़ के भद्री स्टेट के अधूरे मंदिर, शासकों की असमय मौत और महाराज जी का आश्वासन!

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: प्रतापगढ़ के भद्री स्टेट के अधूरे मंदिर, शासकों की असमय मौत और महाराज जी का आश्वासन!

भद्री स्टेट (प्रतापगढ़, उ०प्र०) के पूर्व के शासकों ने अपने अपने समय अपनी भावनाओं एवं संस्कारों के अनुरूप स्टेट में भगवान शंकर एवं देवी जी के मंदिर बनाने के प्रयास किये । मंदिर भी बन गये, परन्तु उनमें विग्रह प्रतिष्ठापन के पूर्व ही ऐसे महानुभावों का असमय ही देहावसान हो जाता था । न मालूम कौन सा ऐसा प्रचण्ड दैवी कोप था यह । ऐसे तीन मंदिर बनकर अधूरे ही पड़े रह गये ।

भावी शासकों को भय हो गया अन्तर में आगे ऐसे प्रयास करने के प्रति । अन्तिम राजा साहेब (भद्री), श्री बजरंग बहादुर जी बाबा जी के अनन्य भक्तों में से थे । महाराज जी भी कई बार उनकी स्टेट तथा महल में पधारे थे । इन मंदिरों के बारे में पूछने पर जब बाबा जी को इस दैवी प्रकोप के बारे में बताया गया तो उन्होंने राजा साहेब से कहा, “तुम बनाओ मंदिर। तुम्हें कुछ न होगा । हमने कह दी ।” पर भय तो भय, वह भी प्राणों का । आगे कोई मंदिर न बना ।

बाबा जी के आशीर्वचनों तथा श्री माँ द्वारा पुनः आश्वस्त किये जाने के फलस्वरूप पूर्व में हुए किसी भी अनर्थ की पुनरावृत्ति न हो सकी इस बार और सारे कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो गये ।

कालान्तर में राजा साहेब का देहावसान भी हो गया । बाद में इन अधूरे मंदिरों के बारे में बताते हुए रानी गिरिजा देवी ने बाबा जी की यह बात श्री माँ से कही तो माँ ने कहा, “आप बाबा जी की बात पर विश्वास लाइये । इच्छा हो तो बनाइये मंदिर । आपको कुछ न होगा ।” रानी साहेबा की इच्छा तो थी मंदिर पूर्णतया स्थापित कर उक्त दैवी प्रकोप से रियासत को मुक्त कर दिया जाये ।

अस्तु, उन्होंने श्री माँ के आश्वासन पर विश्वास कर वर्ष १६८६-८७ में एक नहीं, दो नहीं, बल्कि पाँच मंदिर खड़े कर दिये, जिसमें धूम-धाम के साथ क्रमशः अन्नपूर्णा- दुर्गा-सरस्वती, सीताराम-लक्ष्मीनारायण-राधाकृष्ण, शंकर-पार्वती-गणेशजी एवं हनुमान जी के विग्रहों की स्थापना कर दी गई, और वर्ष १६८८ की कार्तिक पौर्णमासी को श्री माँ तथा बाबा जी महाराज के अनेक परिकरों की उपस्थिति में पाँचवें मंदिर में एक भव्य समारोह के साथ बाबा जी महाराज भी विराज गये !!

इसके पूर्व तीन दिन तक पूजा-हवन तथा रुद्राभिषेक सम्पन्न हुआ । नाम कीर्तन, सुन्दरकाण्ड, अखण्ड रामायण, हनुमान चालीसा एवं भजनों की एक सप्ताह तक धूम मची रही । हजारों लोगों ने भण्डारा प्रसाद पाया और फिर वर्ष १६६० में वार्षिकोत्सव के अवसर पर भागवत सप्तहोपरान्त पुनः वृहद् भण्डारा आयोजित हुआ ।

बाबा जी के आशीर्वचनों तथा श्री माँ द्वारा पुनः आश्वस्त किये जाने के फलस्वरूप पूर्व में हुए किसी भी अनर्थ की पुनरावृत्ति न हो सकी इस बार और सारे कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो गये ।

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