नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: लखनऊ में घर घर घूम कर भक्तों के घर प्रसाद पाना

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: लखनऊ में घर घर घूम कर भक्तों के घर प्रसाद पाना

महाराज जी की लीलायें तो सदा ही अपरम्पार हुआ करती थीं मन, बुद्धि, वाणी से परे – 'जो नहिं देखा, नहिं सुना, जो मनहूं न समाय !!' भक्त के भावपूर्ण अर्पण से कभी न अघाने वाले - हनुमान जी की तरह सुबह से रात तक चाहे कितने लड्डू समर्पित करते जाओ ।

लखनऊ, कानपुर, दिल्ली आदि में भक्तों का भी काफिला चलता था उनकी कार के पीछे– ७-८ कारों में लदे-फंदे । दिन भर में सुबह से रात तक न मालूम कितने आश्रितों-भक्तों के घरों में जाकर लीलायें करते होते । हर भक्त के घर भरपूर मात्रा में प्रसाद भी पाते ।

लखनऊ में श्री सूरज नारायण मेहरोत्रा के घर से प्रसाद पाकर चले बाबा जी और (कई कारों में भरकर) हम सब भी । प्रेमलाल जी के घर गये । वहाँ प्रसाद पाया । तदुपरान्त गौतम पल्ली गये किसी भक्त के घर, वहाँ भी प्रसाद पाया। फिर श्री आर० सी० सोनी के निवास पर पधारे। वहाँ भी प्रसाद पाया । दोपहर के करीब अपनी भक्त श्रीमती चिश्ती के घर पहुँचे ।

वहाँ श्रीमती चिश्ती ने अन्य लोगों के लिये तो हलवाई की दूकान से पूरी सब्जी मंगवाई, पर बाबा जी ने चिश्ती द्वारा अर्पित भोग प्रसाद ही पाया । अब आई बारी महानगर में पूरन चन्द्र पाण्डे जी के घर की । वहाँ भी भोग प्रसाद अर्पित हुआ । मैं तो सोनी साहब के घर से ही पूरन हो चुका था अन्य जगह केवल सरकार के तमाशे देखता रहा । अब पहुँचे श्री शिवापत राम के घर गोलागंज। वहाँ पुनः प्रसाद पाया बाबा जी ने, सभी जगह सब कुछ, भरपूर । भक्तगण भी साथ पाते रहे बहुत कुछ ।

दिन बीत चुका था । अब लौटने की बारी थी पुनः मेहरोत्रा निवास पर । दो-तीन जगह और घूम कर ६ बजे रात आप मेहरोत्रा जी के घर पहुँचे । कहीं चाय कहीं कुछ नमकीन आदि पाते मुझे तो लगा कि अब शायद उलट दूंगा सब कुछ । पर वहाँ भी भक्तों के लिये खिचड़ी-सब्जी के पूरे के पूरे थाल परोसकर पेश हो गये । बाबा जी ने वहाँ भी पूरा प्रसाद ग्रहण किया ।

जब मुझे थाली दिखाई गई तो मैंने अपनी लाचारी प्रगट कर दी । मेहरोत्रा साहब ने मेरी शिकायत कर दी बाबा जी से । उन्होंने मुझे बुलाकर डांट कर कहा, “खालो, प्रेम से खिला रहा है ।” मजबूर होकर मैंने सोचा चलो कुछ चख लो । परन्तु मैं भी पूरा थाल खा गया !! और इसके साथ ही जो कुछ पेट में हलचल-सी मची थी (न मालूम कैसे) वह भी एकदम शान्त हो गई !!

स्वयँ तो जो कुछ दिनभर पाया, उसे भस्म करते रहे अपने उदर में— साथ में मुझ जैसे योग-हीन का भी सब कुछ मेरे ही उदर में भस्म कर दिया !! (लेखक)

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