नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: नीब करौरी तीर्थ का पुनः जागरण

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: नीब करौरी तीर्थ का पुनः जागरण

महाराज जी के ग्राम नीब करौरी को छोड़ देने के बाद हनुमान मंदिर की व्यवस्था में ढील आ चुकी थी और मंदिर भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था को प्राप्त हो चला था, तथा सिंदूरी चोले के अभाव में हनुमान मूर्ति भी काली पड़ गयी थी । मंदिर में जनता का आना भी न्यूनतम स्थिति को पहुँच चुका था । मंदिर की न तो कोई आमदनी थी और न कोई नियमित रूप से पुजारी ही था सेवा हेतु ।

परन्तु वर्षों पूर्व महाराज जी ने जो हयाँई बैठन को संकल्प ले लिया था, उसके लिए उन्हें अपनी इस गंगोत्री को पुनः उजागर करना था (इस तीर्थ के बारे में बातें करते बाबा जी ने श्री माँ को अपनी कई लीलायें बताई थीं ।) अतएव, अपनी महासमाधि के बाद, मानो, उन्होंने यह काम श्री सिद्धी माँ को सौंप दिया ।

श्री माँ ने वर्ष १९७४ से ही बार-बार नीब करौरी की यात्रायें एवं वहाँ कुछ काल के लिए निवास करना प्रारम्भ दिया । तब न वहाँ रात्रि विश्राम हेतु कोई समुचित व्यवस्था एवं सुविधा ही थी, न भोजन-प्रसाद की और न शौच-स्नान की ही। मोटी-मोटी, अधपकी अथवा अधजली मक्का-चना या जवा-गेहू की रोटियाँ एवं अधपकी, स्वादहीन हरी सब्जी ही पाई हमने तब श्री माँ के साथ । फिर भी ये परिस्थितियाँ माँ के संकल्प को छू न सकीं और यात्रायें एवं निवास यथावत जारी रहे ।

मंदिर में हनुमान चालीसा, सुन्दर काण्ड और अखण्ड रामायण के पाठ के साथ खूब भजन-कीर्तन होने लगे। हनुमान जी का चबूतरा पुनः गुलजार हो गया घर-घर श्री माँ द्वारा वितरित महाराज जी के फोटो चित्र सज गये। प्रारम्भ में छोटे और शीघ्र ही बाद में बड़े बड़े भण्डारे भी आयोजित होने लगे।

इन्हीं यात्राओं और निवास के फल-स्वरूप स्थानीय एवं आसपास के गाँवों की जनता में बाबा जी महाराज तथा हनुमान जी के प्रति निष्ठा पुनः जागरूक हो चली। तब से श्री माँ द्वारा श्री विनोद जोशी के माध्यम से तीन चार बार चढ़ाये गये सिंदूरी चोले का भी पुनः पुनः नवीनीकरण होता गया जिसको सम्पन्न करने के लिए श्री माँ बड़ी मात्रा में सिन्दूर और चमेली का तेल देवी जी के पास छोड़ जाती थीं (प्रथम बार जाने पर तो सिंदूर के अभाव में विनोद जी हनुमान जी को स्नान करा, भली भाँति पोंछ कर केवल अबीर का ही चोला चढ़ा पाये थे !!)

मंदिर में हनुमान चालीसा, सुन्दर काण्ड और अखण्ड रामायण के पाठ के साथ खूब भजन-कीर्तन होने लगे। हनुमान जी का चबूतरा पुनः गुलजार हो गया घर-घर श्री माँ द्वारा वितरित महाराज जी के फोटो चित्र सज गये। प्रारम्भ में छोटे और शीघ्र ही बाद में बड़े बड़े भण्डारे भी आयोजित होने लगे।

सामूहिक रूप से हनुमान मंदिर की तन-मन-धन से सेवा भी होने लगी। श्री माँ के आगमन पर आस पास के पचीसों गाँवों तथा नैनीताल, फर्रुखाबाद, ऐटा, मैनपुरी आदि जिलों की भक्त जनता हजारों की संख्या में मंदिर में एकत्र हो महोत्सव-सा मनाने लगती। कोई टुकडी, भजन करती होती, कोई कीर्तन, कोई कव्वाली, कोई नृत्य तो कोई मंदिर में पाठ-अपने अपने रंग में, अपनी अपनी तरंग में। सारा क्षेत्र बड़ी रात तक इन्हीं तमाशों से गुंजायमान रहता ।

इन सबका एक ही विशेष कारण था कि प्रारम्भ से ही श्री माँ गाँव के पुराने लोगों से बाबा जी महाराज द्वारा की गई अनेक अलौकिक लीलाओं को स्वयं भी सुनतीं तथा नई पीढ़ी के लोगों को उन लीलाओं को सुनवा-सुनवा कर उनमें भी बाबा जी महाराज के प्रति निष्ठा-आस्था जागृत करती रहतीं । साथ में बाबा जी महाराज के नीब करौरी से चले जाने के बाद की अलौकिकताओं की भी अनेक कहानियाँ गाँव वालों को अपने साथ आये लोगों से सुनवाती रहतीं ।

बाबा जी महाराज की भी कुछ ऐसी लीला चल निकली कि सबके ही काम स्वतः होते चले गये और जनता की मनोकामनायें भी पूरी होती चली गईं । सोया-सा नीब करौरी गाँव भक्तों के कलरव से गूंज उठा। फलस्वरूप जनता में मंदिर एवं बाबा जी महाराज की सेवा के प्रति अदम्य उत्साह उत्पन्न हो गया। और धीरे धीरे मंदिर तथा मंदिर-क्षेत्र के (जिसे एक वृद्ध ब्राह्मण महिला ने बाबा जी से प्रेरित होकर उनकी सेवा में भेंट कर दिया था) विस्तार एवं उसकी सुचारु रूप से व्यवस्था के लिए नये नये सुझाव एवं सहयोग के आश्वासन स्वतः आने लगे श्री माँ ने तब स्थानीय भक्तों को ही इन सबका दायित्व सौंप दिया।

मंदिर क्षेत्र में बहुत समय से ही बाबा जी की द्वितीय गुफा तथा कुटी के स्थान पर कालान्तर में श्री गंगादीन महाजन ने लम्बे गुम्बद का आकार लिये एक भवन बना दिया था साधु-सन्यासियों के रात्रि विश्राम अथवा ठहरने के लिये । (यह भी तो महाराज जी की ही एक लीला थी भविष्य की घटनाओं की सम्पन्नता हेतु जैसा आगे वर्णित है !) गाँव वालों का विचार था कि इसके पहले खण्ड में शंकर-पार्वती तथा दूसरे खण्ड में श्री राम-जानकी की मूर्तियाँ प्रस्थापित कर दी जायें । परन्तु बाबा जी के हयाँ ही बैठने की मंशा-शक्ति ने इस प्रस्ताव को दूसरा ही मोड़ दे दिया ।

वर्ष १६८१ में कार्तिक पौर्णमासी के शुभ अवसर पर श्री माँ-महाराज जी द्वारा प्रेरित हो, बाबा जी की अलौकिक शक्ति से पुनर्जन्म प्राप्त शिकोहाबाद के भक्त, श्री बद्री विशाल जी द्वारा इसी भवन तथा इसकी परिक्रमा में श्री-माँ की सन्निधि में भागवत सप्ताह सम्पन्न हुआ जिसने नीब करौरी ग्राम में एक अत्यन्त भव्य एवं उत्कृष्ट समारोह का रूप ले लिया । और इस तरह महाराज जी के हयाँ हीँ वैठोंगो के संकल्प की पूर्ति हेतु उस स्थान का शुद्धीकरण पुनः स्वतः ही हो गया । और इसी के साथ नीब करौरी में महाराज-श्री के तत्व पीठ की स्थापना का भी सूत्रपात हो गया !!

तब वर्ष १९८४, १५ फरवरी के दिन श्री माँ-महाराज द्वारा प्रेरित हो ग्वालियर के उद्योगपति, भक्त श्री सीताराम गुप्ता द्वारा इस भवन को नया रूप-स्वरूप देते हुए मंदिर का रूप दे दिया गया जिसमें बाबा जी महाराज की संगमरमर की एक बड़ी मूर्ति का प्रतिष्ठापन उनके द्वारा श्री माँ की छत्रछाया में अत्यन्त धूमधाम के साथ हो गया। इस परम पावन महा कार्य गुप्ता जी की बड़ी बहन, जो भक्त समाज में जीजी नाम से जानी जाती है, तथा भाई अमरचन्द जी का भी बड़ा सहयोग रहा। इस पुनीत अवसर पर हजारों भक्तों ने महाराज जी के भण्डारे का भोग-प्रसाद पाया।

क्रमशः कल...

(अनंत कथामृत से साभार)

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