नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: गुरु-शिष्य परम्परा निभाने की अनूठी पद्धति...

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: गुरु-शिष्य परम्परा निभाने की अनूठी पद्धति...

पूर्व में कहा जा चुका है अपने गुरु-रूप के निर्वाह हेतु बाबा जी महाराज की अपनी ही विधा, अपनी ही पद्धति, अपनी ही शैली थी । उनकी इस शैली की सबसे अधिक विचित्रता यह रही कि जहाँ परम्परागत गुरु-शिष्य पद्धति में गुरु और शिष्यों के बीच एक अप्रत्यक्ष-सी दूरी रहती है (गुरु का स्थान ऊँचा होने के कारण), वहीं श्री सद्गुरु बाबा जी महाराज के साथ इस दूरी का आभास होता ही न था शिष्य-भक्तों को ।

बाबा जी के साथ इन भक्त-शिष्यों का या तो युगल-प्रेमी का-सा भाव रहता था या श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच का-सा सखा-भाव । ऐसा प्रणय अथवा सख्य महाप्रभु की ओर से ही प्रेरित हो भक्तों में भी प्रतिबिम्बित हो जाता था । अन्तरंगता की कोई मिति न होती । जिसे चाहते अपने हृदय से लगा लेते, वक्ष में समेट लेते निःसंकोच । कोई दुराव नहीं, कोई छिपाव नहीं । केवल हम भक्तन के भक्त हमारे का भाव ।

सशरीर सद्गुरु बाबा जी महाराज का गुरु-शिष्य सम्बन्ध एक खिलवाड़ सा प्रतीत होता था । पूरी छूट थी भक्तों को अपने को खोल देने की । उनसे बहस कर लो, जिद कर लो, उनसे रूठ जाओ, मान कर लो, अपना क्रोध भी प्रदर्शित कर लो यहाँ तक कि उनके प्रति अपनी शंकाये भी उन्हीं के मुँह पर कह डालो ।।

वहाँ से भी यही लीला चलती कभी मान, कभी रोष, और कभी अनर्गल-सी लगने वाली (बच्चों की तरह) बहस, कभी (कृतिम) क्रोध, कभी हास-परिहास कोई सीमा न थी ऐसी लीलाओं की । फलस्वरूप जो परम्परागत दूरी होती है गुरु-शिष्य के मध्य, उसका स्वतः ही तिरोहण हो जाता ।

बाबा जी के साथ इन भक्त-शिष्यों का या तो युगल-प्रेमी का-सा भाव रहता था या श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच का-सा सखा-भाव । ऐसा प्रणय अथवा सख्य महाप्रभु की ओर से ही प्रेरित हो भक्तों में भी प्रतिबिम्बित हो जाता था । अन्तरंगता की कोई मिति न होती ।

बाबा महाराज के भक्तों का मान दिखाने की बात पर एक भक्त का संस्मरण याद हो आया । नैनीताल में बजरंगगढ़ की बात है । एक विशेष अवसर पर अपने घर चलने का आग्रह बाबा जी द्वारा टाल- सा देने पर भक्त के के० साह, जिन्हें उनके प्रति सहज स्नेह के वशीभूत बाबा जी किलास (कैलाश) कहकर सम्बोधित करते थे, बाबा जी से अत्यन्त क्षुब्ध-से हो गये और संकल्प ले बैठे कि, "अब जब तक फक्कड़ (अर्थात बाबा जी) स्वयं नहीं आयेंगे, मैं भी उनके पास न जाऊँगा ।"

परन्तु अन्तर में तो अनन्य प्रेम था (है) ही के० के० साह को बाबा जी के प्रति । फिर भी अपने प्रेम भरे आग्रह की अवहेलना ने उनके अन्तर के अहं को उकसा दिया, किन्तु भीतर ही भीतर वे बाबा जी के दर्शनों को भी तड़पते रहे साथ साथ । कई दिन बीत गये ऐसे ही । उधर अन्तर्यामी ने भी भक्त के अन्तर की टीस महसूस कर ली और अपने भक्तों द्वारा संदेश भी भिजवा दिया किलास को कि, "कल हम शहर आयेंगे । जिसे हमारा दर्शन करना हो कर ले । पर फिर भी के० के० मन ही मन अपनी बात पर अड़े ही रहे कि जब तक बाबा जी महाराज स्वयं मेरे पास नहीं आयेंगे, मैं भी नहीं जाऊँगा उनके दर्शन को ।

उस दिन बाबा जी शहर में कई घरों में घूमते रहे, आस-पास के घरों में भी । फिर भी के० के० जानते हुए भी अपने घर से बाहर न निकले दिल की धुकधुकी को दबाये । किन्तु अपने प्रियजन प्रेमी के प्रेम भरे मान ने अन्ततोगत्वा बाबा जी को भी हिला दिया और वे स्वयें के० के० साह के मकान के नीचे सड़क पर आकर जोर से पुकार उठे किलास, किलास ! लो हम आ गये !!

जिस किलास शब्द को श्री मुख से सुनने के लिये के० के० कई दिन से तडप रहे थे, आज उसे सुनकर, तथा बाबा जी की अपने प्रति ममत्व की पराकाष्ठा की ऐसी अभिव्यक्ति समझ कर उनके अन्तर का इतने दिनों से अवरुद्ध प्रेम-प्रवाह फूटकर बह निकला आँखों से और व धडाधड सीड़ियों से सड़क पर उतर कर बच्चे की तरह फफक कर रोते हुए बाबा जी के श्री चरणों में लिपट गये । मान-मनौवल लीला पूरी हो गई ऐसे ।

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