नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्तों को सांसारिक जीवन से भागकर वैराग्य को कभी नहीं कहा

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्तों को सांसारिक जीवन से भागकर वैराग्य को कभी नहीं कहा

उन्होंने किसी को भी अपने सांसारिक दायित्वों से भागकर केवल भगवद्भजन हेतु विरागी जीवन बिताने को न तो कहा, न प्रेरित ही किया। अपितु, उस ओर ही सबको सचेत करते रहे. सदा यही सीख देकर कि इन दायित्वों को उसके निरन्तर स्मरण के साथ (राम राम कहते) मर्यादित आचरण के साथ निभायें ।

और न किसी को स्वधर्म छोड़कर अन्य मार्ग अपनाने हेतु प्रेरित ही किया। ईसाई आये तो ईसा की ओर उनकी लगन को दृढ़ किया, मुसलमान आये तो अल्लाह-मोहम्मद की ओर और सिख आये तो गुरुनानक और ग्रन्थ साहब के गुन गाये उनके समक्ष सीख दी तो यही कि मानव मानव में भेद न करो, सबको परमात्मा की संतान मानो, गरीब अपाहिजों की मदद करो, आर्त की सेवा करो, भूखे को भोजन दो सबकी सेवा ही आत्मज्ञान है ।

मदात्मा सर्वभूतात्मा के इसी सिद्धान्त को महाप्रभु स्वयँ ही अपनाये हुए थे। उनकी लीलाओं से पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि हम उनकी सेवा में नहीं वरन वे ही हम सबकी, अपने भक्तों-आश्रितों की सेवा में रत रहे सदा । और सच तो यह है कि स्वय-सिद्ध बाबा जी महाराज की, जो जाहि न चाहिय कबहुँ कछु के पूर्णावतार थे,सेवा ही क्या हो सकती थी अथवा कौन यह सेवा कर ही सकता था - बिना निरपेक्ष पूर्ण त्याग के-और बिना उन्हें जाने । महाराज जी तो किसी के भी द्वारा की गई अन्य की सेवा को अपनी ही सेवा मानते रहे-मानते हैं ।

तब महाराज जी ने केवल इतना भर कहा, "तुम्हें इन सब बातों से क्या लेना-देना । तुम अपने गुरु की आज्ञा मानते रहो । बाकी काम-परिणाम अपने गुरु पर छोड़ दो ।"

यद्यपि कभी कभी विनोद में गुरु एवं शिष्यों के मिथ्याचरण के उदाहरण देकर गुरु और शिष्य-दोनों को ही ऐसे आचरणों के प्रति सावधान भी करते रहते थे, तथापि साथ ही अपने निजी गुरु उनके निष्ठावान भक्तों को अत्यन्त मान-सम्मान देते रहते थे। इलाहाबाद के प्रति के एक गुरु-निष्ठ की बातें सुनाकर कहते थे (१६६८) कि, “उसके घर पिछले ४०-५० वर्षों से गुरु द्वारा प्रज्वलित धूनी अब भी जलती रहती है।"

स्वयं उसके घर जाकर उसके द्वारा अपने गुरु को अर्पित भोग को स-सम्मान स्वीकार किया ।इलाहाबाद में ही एक जिज्ञासु, श्री वाटल से उनके गुरु के बारे में खोद खोद कर प्रश्न पूछते पूछते महाराज जी ने उन्हीं के मुँह से कहलवा लिया कि अपने (दिवंगत) गुरु की आज्ञा से उनके आश्रम की सेवा हेतु जो द्रव्य वह भेजा करते थे, उसे अब, अन्य गुरु-भाइयों द्वारा आश्रम में अव्यवस्था उत्पन्न कर दिये जाने पर उन्होंने बन्द कर दिया है, परन्तु इसके कारण उनके मन में अन्तर द्वन्द भी था और अशान्ति भी ।

तब महाराज जी ने केवल इतना भर कहा, "तुम्हें इन सब बातों से क्या लेना-देना । तुम अपने गुरु की आज्ञा मानते रहो । बाकी काम-परिणाम अपने गुरु पर छोड़ दो ।" (मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम् ।) महाराज जी से अपने अन्तर्द्वन्द का ऐसा निराकरण प्राप्त कर वे पूर्णरूपेण संतुष्ट हो गये । यहां एक तो गुरु-तत्व के अमरत्व एवं उसकी निरन्तरता की ओर प्रभु का इशारा था, और दूसरा था गुरु-आज्ञा का अन्त तक निष्ठा-पूर्ण पालन का निर्देश बिना परिणाम की ओर ध्यान दिये, बिना स्वार्थ के गुरु के अन्तर्ध्यान होने पर भी ।

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