नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: दशहरी आम, महाराज जी और भक्त

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: दशहरी आम, महाराज जी और भक्त

कानपुर के दो (तथाकथित) भगत मुझे लखनऊ स्टेशन में मिल गये मेरी कैंची-यात्रा के समय । काठगोदाम में मैंने उन्हें भी अपनी टैक्सी में बिठा लिया । उनके साथ दो झाबे दशहरी आम के भी थे । मैंने सोचा बाबा जी को अर्पण करने ले जा रहे होंगे, मुझे भी मिलेंगे ।

कैंची पहुँचकर बाबा जी को प्रणाम कर तथा रात का भी प्रसाद पाकर हम तीनों पास के फॉरेस्ट रेस्ट हाउस के दो कमरों में रहने चले गये । एक में मैं और दूसरे में वे दोनों । दोनों कमरों के बीच एक दरवाजा था जिससे आरपार की बातें स्पष्ट सुनी जा सकती थीं ।

रात को मैं सोने जा ही रहा था कि उन दोनों की बातों और हँसी से मेरी नींद उचट गई । उनकी बातों से पता चला कि लखनऊ से दशहरी आम के दो झाबे वे दोनों डाइरेक्टर (मेडिकल), डा० डी० एन० शर्मा के लिये सेवार्थ लाये थे पर लखनऊ स्टेशन ही में उन्हें पता चल गया कि डा० शर्मा नैनीताल से अन्यत्र चले गये हैं ।

अस्तु, आम खराब चले जाने के भय से अब वे उन आमों को हँस हँस कर स्वयँ पा रहे थे कहते हुए कि ये तो हमारे ही भाग्य के थे । (उन्होंने यह भी ठीक न समझा कि इन आमों को अब बाबा जी को ही अपर्ण कर दें – करते भी कैसे ? बाबा जी तो उन आमों को तत्काल बाँट देते !) परन्तु इस पूरी क्रिया में उन्होंने यह भी उचित न समझा कि दो-चार आमों के लिये मुझे भी पूछते । मैं कसमसा कर रह गया इस पर ।

सुबह हम तीनों जब बाबा जी को प्रणाम करने पहुँचे तो उन्हें देखते ही बाबा जी उबल पड़े । गाली देते हुये उन्हें निकाल दिया कि, “सारे आम खा गये और केहर सिंह को पूछा तक नहीं ।” और फिर क्षणों बाद मुझे लेकर (तब) नदी के ऊपर बल्लियों वाले पुल पर ले चले और दूसरे छोर पर जाकर बैठ गये ।

मैं भी घूमकर ज्यों ही उनके पीछे बैठने को हुआ तो देखा कि वहाँ एक बड़ी बाल्टी में पानी में डूबे ३०-४० दशहरी आम पड़े हैं !! बस क्या था मैंने एक आम की चैंपी निकाल उसे बाबा जी की तरफ बढ़ा दिया । उन्होंने उसे १/४ चूसा और मेरी तरफ बढ़ा दिया ।

तब तक मैंने दूसरा आम तैयार कर उन्हें दे दिया और उनका चूसा आम स्वयं साफ कर लिया । यह क्रिया तब तक चलती रही। जब तक सारे आम खत्म न हो गये । मुझे होश ही न रहा कि मेरे हाथ जूठे हो चुके हैं और न महाराज जी ने ही इस तथ्य से वास्ता रखा !! (केहर सिंह)

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